देश में ब्लड प्रेशर के मरीजों की तादाद लगातार बढ़ रही है और यही वजह है कि अब हर किसी को यह पता होना चाहिए कि सामान्य ब्लड प्रेशर की सही रेंज क्या है और कब यह रीडिंग खतरे की घंटी बन जाती है. बीपी अगर सामान्य से कम या ज्यादा हो जाए, तो सेहत को गंभीर नुकसान हो सकता है. हाई बीपी सीधा असर हार्ट, ब्रेन, किडनी और आंखों पर डालता है, और जिन लोगों को पहले से दिल की बीमारी है, उनके लिए यह जानलेवा साबित हो सकता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अनहेल्दी खानपान, बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल और ज्यादा स्ट्रेस बीपी को गड़बड़ाने की सबसे बड़ी वजहें हैं. अगर समय रहते इन आदतों पर काबू पा लिया जाए, तो बीपी को कंट्रोल में रखना मुश्किल नहीं है. लेकिन अगर बीपी लंबे समय तक ज्यादा बना रहे, तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है और ऐसे में डॉक्टर से मिलना जरूरी हो जाता है.
सामान्य ब्लड प्रेशर की सही रेंज क्या है?
नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के प्रिवेंटिव हेल्थ एंड वेलनेस डिपार्टमेंट की डायरेक्टर डॉक्टर सोनिया रावत के मुताबिक वयस्कों के लिए सामान्य ब्लड प्रेशर 120/80 mmHg माना जाता है. इसमें ऊपर की रीडिंग यानी सिस्टोलिक प्रेशर का 120 mmHg से कम होना और नीचे की रीडिंग यानी डायस्टोलिक प्रेशर का 80 mmHg से कम होना सबसे परफेक्ट स्थिति मानी जाती है. डॉक्टर रावत के अनुसार यह आंकड़ा हर किसी के लिए बिल्कुल एक जैसा नहीं होता, उम्र, पहले से चल रही क्रोनिक बीमारियों और मरीज की मेडिकल कंडीशन के हिसाब से इसमें थोड़ा-बहुत अंतर आ सकता है.
हाई और लो बीपी को कैसे पहचानें?
डॉक्टर रावत बताती हैं कि अगर किसी की ब्लड प्रेशर रीडिंग लगातार 130/80 mmHg या उससे ज्यादा आने लगे, तो इसे हाई ब्लड प्रेशर की शुरुआत माना जाता है. वहीं अगर 140/90 mmHg या उससे अधिक की रीडिंग लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह एक साफ वॉर्निंग साइन है, जिससे हार्ट डिजीज, स्ट्रोक और किडनी की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है. दूसरी तरफ अगर ब्लड प्रेशर 90/60 mmHg से नीचे चला जाए और साथ में चक्कर आना, कमजोरी महसूस होना, बेहोशी या धुंधला दिखाई देने जैसी दिक्कतें हों, तो यह लो ब्लड प्रेशर का संकेत हो सकता है. डॉक्टर की सलाह है कि दोनों ही हालात को हल्के में नहीं लेना चाहिए और वक्त रहते इलाज कराना चाहिए.
कब बन जाता है यह मेडिकल इमरजेंसी?
एक्सपर्ट के मुताबिक अगर ब्लड प्रेशर 180/120 mmHg या इससे ज्यादा तक पहुंच जाए और दोबारा नापने पर भी यही रीडिंग बनी रहे, तो इसे मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है. ऐसे में अगर सीने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ, अचानक तेज सिरदर्द, धुंधला दिखना, बोलने में परेशानी या शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन और कमजोरी जैसे लक्षण भी दिखें, तो बिना देर किए तुरंत अस्पताल पहुंचना चाहिए, क्योंकि यह हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्या का इशारा हो सकता है.
हाई बीपी को साइलेंट किलर क्यों कहा जाता है?
हाई ब्लड प्रेशर को अक्सर साइलेंट किलर इसलिए कहा जाता है क्योंकि ज्यादातर मरीजों में इसके शुरुआती लक्षण नजर ही नहीं आते. यही वजह है कि बीमारी चुपचाप बढ़ती रहती है और मरीज को इसका पता तब तक नहीं चलता, जब तक हालात गंभीर नहीं हो जाते. कई बार यह सालों तक बिना किसी संकेत के शरीर में मौजूद रहता है और फिर अचानक ही बड़ी मुसीबत खड़ी कर देता है. इसीलिए सिर्फ लक्षणों के भरोसे इसका अंदाजा लगाना मुमकिन नहीं है, बल्कि नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराना ही इससे बचने का सबसे भरोसेमंद तरीका है.
बीपी बढ़ने की सबसे बड़ी वजहें और बचाव के तरीके
डॉक्टर के मुताबिक ज्यादा नमक वाला खाना, मोटापा, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, स्मोकिंग, शराब का अधिक सेवन, तनाव, पूरी नींद न लेना, डायबिटीज, किडनी की बीमारी और परिवार में पहले से बीपी की हिस्ट्री होना, इन सबको हाई ब्लड प्रेशर के सबसे बड़े रिस्क फैक्टर्स में गिना जाता है. इसे कंट्रोल में रखने के लिए बैलेंस्ड डाइट लेना, खाने में नमक की मात्रा कम करना, रोजाना कम से कम 30 मिनट एक्सरसाइज करना, वजन को कंट्रोल में रखना और स्मोकिंग-तंबाकू से पूरी तरह दूरी बनाना जरूरी है. इसके अलावा तनाव को कम करने के लिए योग, ध्यान या दूसरी रिलैक्सेशन तकनीकों को अपनाना फायदेमंद रहता है. अगर डॉक्टर ने पहले से कोई दवा लिख रखी है, तो उसे नियमित रूप से लेना भी उतना ही जरूरी है.
डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?
अगर किसी की ब्लड प्रेशर रीडिंग लगातार 140/90 mmHg या उससे ज्यादा आ रही है, दवा लेने के बावजूद बीपी कंट्रोल नहीं हो पा रहा है, या बार-बार बहुत कम ब्लड प्रेशर के साथ चक्कर और बेहोशी जैसी शिकायत हो रही है, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी हो जाता है. जो लोग प्रेग्नेंसी, डायबिटीज, हार्ट डिजीज या किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं, उन्हें अपने ब्लड प्रेशर की रेगुलर मॉनिटरिंग करते रहना चाहिए. नियमित बीपी जांच और हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी की गंभीर बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है.













