दुनिया भर में प्यार और जीवनसाथी की तलाश एक बहुत बड़ा कारोबार बन चुकी है, जिसमें अरबों डॉलर का निवेश हो रहा है। हाल के समय में पारंपरिक डेटिंग प्लेटफॉर्म्स ने अपने यूज़र्स के लिए सही पार्टनर चुनने का काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को सौंपना शुरू कर दिया है। स्वाइप करने की पुरानी प्रक्रिया और जवाब न मिलने की हताशा को खत्म करने के लिए कई नए प्लेटफॉर्म सामने आ रहे हैं। इनमें हिंज के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा शुरू की गई एआई मैचमेकिंग सेवा ओवरटोन से लेकर साइमैच जैसा ऐप शामिल है, जो केवल एक सेल्फी के ज़रिए कंपैटिबिलिटी यानी अनुकूलता का पता लगाने का दावा करता है। हालांकि, तकनीकी कंपनियों के इन बड़े दावों के बीच एक बुनियादी सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाकई दो इंसानों को आपस में प्यार करवाने या सही जीवनसाथी ढूंढने में मदद कर सकता है?
ऑनलाइन मैचमेकिंग का नया दौर और एआई का प्रवेश
पारंपरिक डेटिंग ऐप्स में यूज़र्स को अनगिनत प्रोफ़ाइल्स को दाएं या बाएं स्वाइप करना पड़ता था, जिसके बाद भी सार्थक बातचीत की गारंटी नहीं होती थी। एआई संचालित नए ऐप्स इस पूरी प्रक्रिया को बदलने का वादा कर रहे हैं। अब यूज़र्स एआई चैटबॉट के साथ अपनी इच्छाओं, सपनों, जीवन के लक्ष्यों और अपने सपनों के पार्टनर की प्राथमिकताओं पर खुलकर बात कर सकते हैं। इसके बाद एआई सिस्टम यूज़र डेटाबेस को स्कैन करता है और उन उम्मीदवारों को खोज निकालता है जो दिए गए मापदंडों पर पूरी तरह खरे उतरते हैं।
इसके अलावा, ये आधुनिक एआई सिस्टम ऐप के भीतर यूज़र के वास्तविक व्यवहार पर भी लगातार नज़र रखते हैं। व्यावहारिक विज्ञान में इसे प्रकट प्राथमिकताएं या रीवील्ड प्रेफरेंसेस कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति शब्दों में क्या कहता है और असल में वह किन प्रोफ़ाइल्स पर प्रतिक्रिया देता है, एआई इन दोनों का विश्लेषण करके यूज़र की असली पसंद का खाका तैयार करने की कोशिश करता है।
संबध विज्ञान और एल्गोरिदम का सच
डेटिंग ऐप बनाने वाली कंपनियां लंबे समय से यह दावा करती रही हैं कि उनके एल्गोरिदम संबंध विज्ञान यानी रिलेशनशिप साइंस पर आधारित हैं। हालांकि, संबंध वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि इस दावे के पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक आधार मौजूद नहीं है। विज्ञान के पास अभी तक ऐसा कोई सर्वमान्य फॉर्मूला नहीं है जो यह सटीक भविष्यवाणी कर सके कि कौन से दो व्यक्ति आपस में पूरी तरह अनुकूल या कंपैटिबल होंगे।
वैज्ञानिक शोधों से यह बात ज़रूर स्पष्ट हुई है कि कुछ सामान्य कारक दो लोगों के बीच जुड़ाव को बढ़ावा देते हैं। इनमें शारीरिक आकर्षण, सकारात्मक व्यक्तित्व गुण, विचारों और आदतों की समानता, जान-पहचान और आपसी प्रतिक्रिया शामिल हैं। लेकिन इन सामान्य कारकों के बावजूद, दो अनजान लोगों के आमने-सामने मिलने से पहले यह कह पाना असंभव है कि उनके बीच रोमांटिक केमिस्ट्री बनेगी या नहीं।
समानता और व्यक्तित्व के पूरक होने का भ्रम
शुरुआती एआई डेटिंग ऐप्स में से एक, फेट, व्यक्तित्व की समानता और पारस्परिकता को अपना मुख्य आधार बताता है। पहली नज़र में यह सिद्धांत काफी तर्कसंगत लगता है। अमांडा मोंटोया और उनके साथियों द्वारा 313 अध्ययनों पर किए गए विश्लेषण से यह बात सामने आती है कि मिलने से पहले लोगों के बीच समानता आकर्षण पैदा कर सकती है। लेकिन जैसे ही दो लोग व्यक्तिगत रूप से एक-दूसरे से मिलते हैं या संक्षिप्त बातचीत करते हैं, समानता की भूमिका बहुत कम या न के बराबर रह जाती है।
इस तथ्य की पुष्टि सारा हमबर्ग और उनकी टीम के शोध से भी होती है, जिसमें संभावित पार्टनर्स के व्यक्तित्व लक्षणों की वास्तविक और महसूस की गई समानता का गहराई से अध्ययन किया गया था। इसी तरह, अनिका फ्रॉम के नेतृत्व में किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में भी ऐसे कोई मजबूत प्रमाण नहीं मिले जो यह साबित कर सकें कि पार्टनर के अधिक समान होने से रिश्ते में खुशी बढ़ जाती है। वहीं जहां तक व्यक्तित्व के एक-दूसरे के पूरक होने का सवाल है, उस सिद्धांत को समर्थन देने वाले वैज्ञानिक साक्ष्य तो और भी कम हैं।
क्या डेटा पैटर्न से सुलझ सकती है केमिस्ट्री की गुत्थी?
भले ही कंपैटिबिलिटी का कोई स्थापित वैज्ञानिक नियम न हो, फिर भी एआई के समर्थकों का तर्क है कि यह तकनीक यूज़र के व्यवहार से खुद सीख सकती है। चिकित्सा क्षेत्र में एआई जटिल पैटर्न की पहचान करके अधिक सटीक निदान और उपचार में मदद कर रहा है। मौसम की भविष्यवाणी से लेकर वित्तीय धोखाधड़ी को रोकने तक, एआई ने पूर्वानुमान लगाने की इंसानी क्षमता को काफी मजबूत किया है।
लेकिन क्या यही मॉडल इंसानी प्यार और रिश्तों पर भी लागू हो सकता है? यदि समस्या सिर्फ यह है कि इंसान जटिल पैटर्न को पहचान नहीं पाए हैं, तो एआई एक क्रांतिकारी समाधान साबित हो सकता है। परंतु यदि समस्या यह है कि इंसान खुद इतने गतिशील और अप्रत्याशित हैं कि उनके व्यवहार का पहले से सटीक अनुमान लगाना ही असंभव है, तो एआई भी हमें प्यार की भविष्यवाणी करने के करीब नहीं ले जा पाएगा।
पसंद का विरोधाभास और सतही खारिज की आदत
शोधकर्ताओं ने यह देखा है कि लोग स्पीड डेटिंग इवेंट से पहले अपनी पसंद की लंबी सूची तैयार करते हैं, लेकिन जब वे किसी व्यक्ति से असल में मिलते हैं, तो वे अपनी ही बताई गई सभी शर्तों को भूल जाते हैं। इतना ही नहीं, डेटिंग ऐप्स पर लोग बेहद मामूली और अवास्तविक कारणों से दूसरों की प्रोफ़ाइल खारिज कर देते हैं, जैसे कि किसी का नाम अपने भाई या बहन जैसा होना अथवा किसी की हेयरस्टाइल पसंद न आना।
ये उदाहरण यह सवाल उठाते हैं कि क्या एआई के पास विश्लेषण के लिए सही डेटा उपलब्ध है। यदि बुनियादी डेटा ही लोगों की सतही पसंद या जल्दबाजी में किए गए स्वाइप पर आधारित होगा, तो एआई का निष्कर्ष भी अधूरा रहेगा। इसी समस्या को समझने के लिए ऑनलाइन डेटिंग डेटा और वास्तविक जीवन की मुलाकातों को मिलाकर नए प्रयोग किए जा रहे हैं, ताकि यह देखा जा सके कि डिजिटल दुनिया की केमिस्ट्री असल जिंदगी में कितनी बदलती है।
वैज्ञानिकों के दो अलग दृष्टिकोण और भविष्य की राह
रिलेशनशिप साइंस के विशेषज्ञ भी इस विषय पर दो गुटों में बंटे हुए हैं। पहला वर्ग मानता है कि भविष्य में जटिल एल्गोरिदम के ज़रिए कंपैटिबिलिटी का सटीक मॉडल तैयार करना संभव होगा। दूसरा वर्ग यह मानता है कि कंपैटिबिलिटी कोई स्थिर चीज़ नहीं है जिसे पहले से मापा जा सके, बल्कि यह दो लोगों की बातचीत और साझा अनुभवों के साथ धीरे-धीरे विकसित होने वाली एक जीवंत प्रक्रिया है।
इस दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार, प्यार पाना सही मैच ढूंढने से ज्यादा सही समय और सही जगह पर होने तथा साथ मिलकर रिश्ते को गढ़ने के बारे में है। शुरुआती वैज्ञानिक संकेत बताते हैं कि दो यादृच्छिक रूप से चुने गए लोगों के बीच तुरंत आकर्षण होना काफी दुर्लभ है। लेकिन अगर वे बार-बार मिलते हैं, तो क्या उनके बीच केमिस्ट्री विकसित हो सकती है? क्या सही परिस्थितियों में कोई भी दो इंसान एक-दूसरे के प्यार में पड़ सकते हैं, या इसके लिए कोई अनदेखी जैविक और मनोवैज्ञानिक शर्त जरूरी है?
एआई का विवेकपूर्ण इस्तेमाल और डेटिंग की नई सोच
एआई बेशक शोधकर्ताओं के लिए एक बेहतरीन उपकरण हो सकता है, लेकिन प्यार की तलाश कर रहे लोगों को इसका इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए। एआई सिस्टम हमेशा उन पूर्वधारणाओं पर काम करते हैं जो उनके डेवलपर्स ने उनमें फीड की हैं। जब तक विज्ञान खुद कंपैटिबिलिटी का रहस्य नहीं सुलझा लेता, तब तक एआई के फैसलों पर आंख मूंदकर भरोसा करने से यूज़र ऐसे लोगों से मिलने से वंचित रह सकते हैं जो उनके लिए अप्रत्याशित रूप से बेहतरीन पार्टनर साबित हो सकते थे।
डेटिंग को केवल एक फिल्टर प्रोसेस मानने के बजाय अन्वेषण और नए अनुभवों के अवसर के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर जीवन शैली, धर्म या परिवार से जुड़े कुछ बुनियादी नियम आपके लिए बेहद अहम हैं, तो उन पर कायम रहना सही है। लेकिन केवल नाम, हेयरस्टाइल या सतही बातों के आधार पर किसी को खारिज करने के बजाय, खुले दिमाग से नए लोगों से मिलना और खुद अनुभव करना ही सही जीवनसाथी तक पहुंचने का सबसे प्रामाणिक रास्ता है।


















