भारत में मधुमेह रोगियों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है और देश को इस बीमारी की वैश्विक राजधानी भी कहा जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 10 करोड़ लोग आधिकारिक तौर पर डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि ऐसे लोगों की भी एक बड़ी संख्या है जो इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं लेकिन उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। सामान्य तौर पर जब किसी व्यक्ति का खाली पेट शुगर लेवल यानी फास्टिंग ब्लड शुगर 120 mg/dL से ऊपर आता है, तो इसे डायबिटीज का संकेत माना जाता है। हालांकि, जब 3 महीने के औसत शुगर स्तर को मापने वाली जांच यानी HbA1c करवाई जाती है और उसका परिणाम 5.7 प्रतिशत से कम निकलता है, तो डॉक्टरी भाषा में उसे डायबिटीज का रोगी नहीं माना जाता। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सामने अक्सर यह सवाल आता है कि यदि किसी व्यक्ति की फास्टिंग शुगर बढ़ी हुई हो लेकिन 3 महीने की औसत रिपोर्ट नियंत्रण में रहे, तो क्या उसे तुरंत दवा शुरू कर देनी चाहिए या इंतजार करना चाहिए।
डायबिटीज की पुष्टि के लिए मेडिकल साइंस के 3 मुख्य मापदंड
गुरुग्राम के सी के बिड़ला अस्पताल में मेटाबोलिक, डायबिटीज एवं ओब्सिटी क्लीनिक के निदेशक डॉ. पारस अग्रवाल के अनुसार, चिकित्सकीय दुनिया में डायबिटीज की पुष्टि करने के लिए 3 प्रमुख मानक तय किए गए हैं। इन 3 मापदंडों में से कम से कम 2 मानकों का पूरा होना अनिवार्य माना जाता है। पहला मापदंड यह है कि व्यक्ति की खाली पेट शुगर यानी फास्टिंग ब्लड शुगर का स्तर 126 mg/dL या उससे अधिक हो। दूसरा मापदंड यह है कि पिछले 90 दिनों की औसत शुगर बताने वाली HbA1c रिपोर्ट का स्तर 6.5 प्रतिशत या उससे ज्यादा हो। तीसरा मापदंड भोजन करने के 2 घंटे बाद यानी रैंडम या पोस्टप्रैंडियल (PP) शुगर का स्तर 200 mg/dL से अधिक होना है। जब इनमें से कम से कम दो स्थितियां पाई जाती हैं, तभी डॉक्टर मरीज को डायबिटीज की दवा देने पर विचार करते हैं।
यदि किसी मरीज की HbA1c रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य आती है लेकिन सिर्फ फास्टिंग शुगर का स्तर 126 mg/dL से ऊपर निकलता है, तो चिकित्सक तुरंत दवा शुरू करने की सलाह नहीं देते। डॉ. पारस अग्रवाल बताते हैं कि ऐसी स्थिति में मेडिकल जांच की प्रक्रिया को दोहराना बहुत आवश्यक होता है। HbA1c परीक्षण पिछले 3 महीनों का औसत रिकॉर्ड प्रस्तुत करता है, जबकि फास्टिंग शुगर में आई हालिया बढ़ोतरी पिछले कुछ दिनों के दौरान शरीर में हुए बदलावों का नतीजा हो सकती है। इसलिए केवल एक बार फास्टिंग शुगर बढ़ी हुई आने पर मरीज को मधुमेह से पीड़ित नहीं मान लिया जाता, बल्कि विस्तृत जांच का सहारा लिया जाता है।
फास्टिंग ब्लड शुगर की रिपोर्ट गलत आने के मुख्य कारण
डॉ. पारस अग्रवाल का कहना है कि फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट की रिपोर्ट कई कारणों से अचानक असामान्य या गलत आ सकती है। अक्सर लोग जांच कराने से पहले अपनी दैनिक आदतों में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिनका सीधा असर अगली सुबह के ब्लड टेस्ट पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने टेस्ट कराने से एक रात पहले बहुत देर से भोजन किया है या सोने से ठीक पहले दूध का सेवन किया है, तो सुबह उसकी खाली पेट शुगर का स्तर बढ़ा हुआ आ सकता है। इसके अलावा, देर रात तक जागने या नींद पूरी न होने के कारण भी शरीर में तनाव हार्मोन बढ़ जाते हैं जो ब्लड शुगर को अस्थाई रूप से बढ़ा देते हैं।
मानसिक और शारीरिक तनाव भी फास्टिंग रिपोर्ट को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। अत्यधिक तनाव की स्थिति में रहने वाले लोगों की सुबह की शुगर रिपोर्ट अक्सर ज्यादा आती है। इसी प्रकार, कई लोग सुबह उठकर भारी शारीरिक व्यायाम या कसरत करने के तुरंत बाद ब्लड टेस्ट करवाने चले जाते हैं। व्यायाम के दौरान शरीर को ऊर्जा देने के लिए लिवर से ग्लूकोज रिलीज होता है, जिससे टेस्ट में शुगर का स्तर अस्थाई रूप से बढ़ा हुआ दिखाई दे सकता है। इन तमाम परिस्थितियों के कारण ही स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि फास्टिंग शुगर 126 mg/dL से अधिक आए, तो घबराने की बजाय कुछ दिन बाद दोबारा सटीक परिस्थितियों में जांच करानी चाहिए।
75 ग्राम ग्लूकोज चैलेंज टेस्ट और दोबारा जांच की आवश्यकता
यदि किसी मरीज की दोबारा जांच कराने पर भी खाली पेट शुगर 126 mg/dL से ऊपर बनी रहती है लेकिन HbA1c स्तर सामान्य रहता है, तो चिकित्सक मरीज को 75 ग्राम की मात्रा वाला ग्लूकोज चैलेंज टेस्ट लेने का सुझाव देते हैं। इस विशेष मेडिकल टेस्ट में मरीज को 75 ग्राम ग्लूकोज का घोल पिलाया जाता है और उसके शरीर पर चीनी के इस अचानक प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। इस जांच के माध्यम से डॉक्टर यह देखते हैं कि मरीज का अग्न्याशय यानी पैनक्रियाज कितनी तेजी और दक्षता के साथ इंसुलिन का स्राव करता है तथा शरीर ग्लूकोज को किस तरह पचाता है।
ग्लूकोज चैलेंज टेस्ट के साथ-साथ मरीज के भोजन करने के 2 घंटे बाद वाले ब्लड शुगर यानी पोस्टप्रैंडियल टेस्ट की रिपोर्ट का भी बारीकी से मूल्यांकन किया जाता है। डॉ. पारस अग्रवाल स्पष्ट करते हैं कि HbA1c जांच 90 दिनों की औसत स्थिति दर्शाती है और इसमें भी शरीर की कई अलग-अलग स्थितियों के कारण विसंगतियां या भिन्नता हो सकती हैं। यही वजह है कि डॉक्टर सभी प्राथमिक टेस्ट दोबारा दोहराने पर जोर देते हैं। जब तक खाली पेट शुगर 126 mg/dL से ऊपर न हो और 3 महीने की औसत जांच HbA1c भी 6.5 प्रतिशत से अधिक न आ जाए, तब तक किसी व्यक्ति पर डायबिटीज का स्थायी लेबल नहीं लगाया जाता और न ही उसे नियमित दवाओं पर डाला जाता है।
शरीर की चेतावनी को समझें और लाइफस्टाइल में करें बदलाव
डॉ. पारस अग्रवाल के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की 3 महीने की औसत रिपोर्ट यानी HbA1c बिल्कुल नॉर्मल है, लेकिन खाली पेट शुगर बढ़ी हुई आ रही है, तो यह घबराने का नहीं बल्कि सतर्क होने का समय है। इस चरण पर मरीज के पास अपनी जीवनशैली में सुधार करने और डायबिटीज को शरीर में जड़ जमाने से पूरी तरह रोकने का एक बेहतरीन अवसर होता है। शरीर द्वारा दी गई इस प्रारंभिक चेतावनी को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति को अपनी दिनचर्या और खान-पान में तुरंत व्यापक बदलाव करने चाहिए।
जीवनशैली में सुधार का सबसे पहला कदम अपनी डाइट को दुरुस्त करना है। बाजार में मिलने वाले प्रोसेस्ड और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए, क्योंकि आमतौर पर सभी पैकेटबंद चीजों में अस्वस्थ सामग्रियां शामिल होती हैं। इसके अलावा भोजन में अत्यधिक चीनी और ज्यादा नमक का प्रयोग तुरंत बंद कर देना चाहिए। फास्ट फूड, जंक फूड, अत्यधिक तली-भुनी चीजें, रेड मीट, चीज़ और बटर का सेवन बंद करने की सख्त सलाह दी जाती है। इन अस्वास्थ्यकर चीजों की जगह प्राकृतिक और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों को अपनी थाली में शामिल करना चाहिए।
परंपरागत खान-पान और मोटे अनाज (मिलेट्स) का महत्व
खान-पान में क्या शामिल किया जाए, इस सवाल का उत्तर देते हुए डॉ. पारस अग्रवाल बताते हैं कि हमारे पूर्वजों का जिस प्रकार का पारंपरिक खान-पान और जीवनशैली थी, उसे अपनाना स्वास्थ्य के लिए सबसे लाभकारी सिद्ध होता है। घर में बने शुद्ध और ताजे अनाज के भोजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भोजन में मोटे अनाज यानी मिलेट्स का उपयोग जितना अधिक होगा, शरीर को उतना ही अधिक लाभ मिलेगा। अपने दैनिक आहार में विभिन्न प्रकार की दालें, फलियां, मक्का, ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाजों को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए।
मोटे अनाजों के साथ-साथ रोजाना मौसमी हरी सब्जियों का प्रचुर मात्रा में सेवन करना अत्यंत आवश्यक है। दिन भर में कम से कम दो विभिन्न प्रकार के ताजा और मौसमी फलों को अपनी डाइट का हिस्सा बनाना चाहिए। वहीं, शाम या सुबह के नाश्ते में अस्वास्थ्यकर स्नैक्स के बजाय विभिन्न प्रकार के पोषक बीजों (सीड्स) और सूखे मेवों (ड्राई फ्रूट्स) का सेवन करना चाहिए। इस प्रकार का फाइबर युक्त और पोषक तत्वों से भरपूर खान-पान न केवल पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है बल्कि शरीर में इंसुलिन की संवेदनशीलता को बढ़ाकर शुगर के स्तर को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में मदद करता है।
तनाव प्रबंधन, गहरी नींद और नियमित एक्सरसाइज का फॉर्मूला
डॉ. पारस अग्रवाल के अनुसार, लाइफस्टाइल को संतुलित करने का सबसे महत्वपूर्ण और सरल सूत्र तनाव को नियंत्रित करना है। आधुनिक जीवन में तनाव होना एक सामान्य बात है, लेकिन उसका सही प्रबंधन करना बेहद जरूरी है। तनाव से राहत पाने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले उन मुद्दों और वजहों को सुलझाना चाहिए जो मानसिक अशांति पैदा कर रहे हैं। मानसिक शांति बनाए रखने और ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रतिदिन योग तथा ध्यान (मेडिटेशन) का अभ्यास करना चाहिए, जिससे तनाव हार्मोन का स्तर नियंत्रित रहता है।
तनाव प्रबंधन के साथ-साथ हर रात 7 से 8 घंटे की गुणवत्तापूर्ण और आरामदायक नींद लेना अनिवार्य है। एक अच्छी नींद वही मानी जाती है जो बिना किसी व्यवधान के पूरी हो और जिसमें रात के समय अधिकतम एक या दो बार से अधिक नींद में बाधा न आए। नींद के बाद तीसरा सबसे जरूरी स्तंभ नियमित शारीरिक व्यायाम है। प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा ऐसा अभ्यास करना चाहिए जिससे शरीर थक जाए और पसीना आए। इसके लिए जिम जाना जरूरी नहीं है; कोई भी व्यक्ति रोजाना तेज चाल से वॉक या रनिंग कर सकता है। इसके अलावा स्ट्रैंथ एक्सरसाइज बेहद फायदेमंद मानी जाती है, जिसमें शरीर की ताकत से विपरीत दिशा में काम किया जाता है। जैसे हाथों से वजन को सिर के ऊपर उठाना, रस्सी को विपरीत दिशा में खींचना, या जिम में बायसेप्स, ट्रायसेप्स और बटरफ्लाई जैसी कसरतें करना।


















