सामान्य सर्दी, जुकाम या हल्के बुखार के लक्षण सामने आते ही मेडिकल स्टोर से खुद एंटीबायोटिक दवाएं खरीदकर खाने की आदत अब बेहद गंभीर स्वास्थ्य संकट में बदल चुकी है। बिना डॉक्टरी परामर्श के अंधाधुंध एंटीबायोटिक का सेवन करने से शरीर में मौजूद सूक्ष्मजीव दवाओं के प्रति ढीठ हो चुके हैं, जिससे सामान्य संक्रमण भी जानलेवा रूप ले रहे हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने एक अध्ययन के आधार पर देशव्यापी चेतावनी जारी करते हुए बताया है कि ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमणों में मृत्यु का जोखिम कई गुना बढ़ चुका है। अस्पतालों में मरीजों का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सबसे उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाएं भी अब बेअसर साबित हो रही हैं, जो चिकित्सा जगत और आम जनता दोनों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया है।
1.60 लाख मरीजों के अध्ययन में सामने आए डराने वाले आंकड़े
ICMR के वैज्ञानिकों द्वारा देश भर के अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर व्यापक अध्ययन किया गया। इस शोध के दौरान कुल 1.60 लाख भर्ती मरीजों के स्वास्थ्य आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया गया था। इनमें से 26,213 मरीजों में ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरियल संक्रमण की स्पष्ट पुष्टि हुई। अध्ययन के निष्कर्ष बेहद चिंताजनक रहे क्योंकि संक्रमित पाए गए मरीजों में से 61.1 प्रतिशत मामलों में सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवा कार्बापेनम भी पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हुई। कार्बापेनम वह उच्च स्तरीय दवा है जिसे डॉक्टर गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन के मामलों में अंतिम हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जब बैक्टीरिया इस उच्च श्रेणी की दवा के प्रति भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, तो डॉक्टरों के पास मरीज को बचाने के लिए बहुत सीमित और कम असरदार विकल्प ही शेष रह जाते हैं। इसके अतिरिक्त, एंटीबायोटिक बेअसर होने के कारण मरीजों का इलाज लंबा खिंच जाता है और स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाला खर्च दो गुना से भी अधिक बढ़ जाता है।
किन अंगों को निशाना बनाते हैं ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया
ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया बहुत ही आक्रामक और खतरनाक संक्रमण फैलाने के लिए जाने जाते हैं। यह सूक्ष्मजीव मुख्य रूप से मानव शरीर के फेफड़ों, पेशाब की नली, खुले घावों और रक्त प्रवाह को संक्रमित करते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इस श्रेणी में ई. कोलाई, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, एकिनेटोबैक्टर बॉमनाइ और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा जैसे जानलेवा बैक्टीरिया शामिल हैं। यह बैक्टीरिया जब शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में जगह बना लेते हैं, तो तीव्र संक्रमण पैदा करते हैं। चूंकि इनकी शारीरिक संरचना दवाओं के असर को रोकने में सक्षम होती है, इसलिए सामान्य दवाएं इन पर काम नहीं करतीं। अत्यधिक गंभीर स्थिति में ही डॉक्टरों द्वारा कार्बापेनम जैसी हाई एंटीबायोटिक का सहारा लिया जाता है, लेकिन वर्तमान में यह बैक्टीरिया इस शक्तिशाली दवा के खिलाफ भी खुद को पूरी तरह सुरक्षित करने में सफल हो चुके हैं।
90 प्रतिशत मामलों में बिना जरूरत खाई जाती हैं एंटीबायोटिक दवाएं
एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने का मुख्य कारण लोगों द्वारा इनका गलत और अत्यधिक इस्तेमाल करना है। गुरुग्राम स्थित सी के बिड़ला अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. तुषार तायल ने इस विषय पर विस्तृत जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोग जिन बीमारियों या परेशानियों के लिए एंटीबायोटिक दवाएं खाते हैं, उनमें से लगभग 90 प्रतिशत मामलों में एंटीबायोटिक की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। अधिकांश मौसमी बीमारियां जैसे सर्दी, जुकाम, गले में खराश और बुखार दरअसल वायरस, फंगस या पैरासाइट के कारण होते हैं। इन वायरल या फंगल बीमारियों का एक निश्चित जीवनकाल होता है, जो आमतौर पर दो, तीन, चार या कुछ अधिक दिनों में स्वतः ही समाप्त हो जाता है। हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम भी इन सूक्ष्मजीवों से लड़कर इन्हें खत्म कर देता है। वायरल बीमारियों पर एंटीबायोटिक दवा का कोई असर नहीं होता, लेकिन जब मरीज बेवजह इन्हें खा लेते हैं, तो इसका दुष्प्रभाव शरीर के बैक्टीरिया पर पड़ता है।
डीएनए म्यूटेशन और बैक्टीरिया में प्रतिरोध का तंत्र
मानव पेट में हमेशा अरबों की संख्या में बैक्टीरिया मौजूद रहते हैं, जिनमें से अधिकांश स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं। जब कोई व्यक्ति अकारण एंटीबायोटिक दवा का सेवन करता है, तो यह दवा बीमारी पर कोई असर डाले बिना पेट में मौजूद एक-दो बैक्टीरिया के डीएनए में अचानक बदलाव लाने में मदद कर देती है। इस जेनेटिक बदलाव के कारण बैक्टीरिया की शारीरिक संरचना बदल जाती है और वह उस विशिष्ट एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध उत्पन्न कर लेता है। समय के साथ यह ढीठ बैक्टीरिया पेट के स्वस्थ बैक्टीरिया को मारने लगता है और अपनी आबादी तेजी से बढ़ाने लगता है। इतना ही नहीं, यह प्रतिरोधी बैक्टीरिया अपने अंदर मौजूद रेजिस्टेंस जीन को आसपास के अन्य बैक्टीरिया में ट्रांसफर करने की क्षमता भी रखते हैं। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जब कोई बीमारी फैलाने वाला बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश करता है, तो वह भी इन प्रतिरोधी जीन्स को ग्रहण कर लेता है, जिससे आगे चलकर कोई भी एंटीबायोटिक दवा काम नहीं करती।
सूक्ष्मजीवों का जेनेटिक सुरक्षा कवच और इफ़्लक्स पंप
डॉ. तुषार तायल के अनुसार, बैक्टीरिया और वायरस दवाओं से बचने के लिए जेनेटिक स्तर पर अत्यंत जटिल सुरक्षा तंत्र विकसित करते हैं। कुछ बैक्टीरिया का बाहरी आवरण यानी सेल मेंब्रेन कुदरती रूप से इतना कठोर और सख्त होता है कि दवा बैक्टीरिया के शरीर के भीतर प्रवेश ही नहीं कर पाती। वहीं कुछ अन्य बैक्टीरिया दवा के प्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिए शरीर में विशेष एंजाइम का निर्माण करने लगते हैं। यह एंजाइम दवा को बैक्टीरिया की सतह पर चिपकने से रोक देता है, जिससे दवा अंदर नहीं जा पाती और बेअसर हो जाती है। इसके अलावा, कई सूक्ष्मजीव अपनी शारीरिक बनावट को इस तरह परिवर्तित कर लेते हैं कि दवा बेअसर हो जाती है। कुछ ढीठ बैक्टीरिया तो दवा के संपर्क में आने से पहले ही उसे हवा के झोंकों की तरह बाहर फेंक देते हैं, जिसे इफ़्लक्स पंप कहा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया जेनेटिक म्यूटेशन या अलग-अलग बैक्टीरिया के आपस में मिलकर प्रतिरोधी गुण प्राप्त करने के कारण होती है।
खुद दवा लेने से बचें और अपनाएं डॉक्टरी सलाह
इस बढ़ते खतरे से बचाव के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों ने आम जनता को सतर्क रहने की सलाह दी है। डॉ. तुषार तायल ने मरीजों को सलाह देते हुए कहा, "जब भी सर्दी-जुकाम या बुखार महसूस हो तो तुरंत दवा लेने के बजाय एक-दो दिन इंतजार करें और फिर डॉक्टर से संपर्क करें।" डॉक्टर मरीज की पूरी शारीरिक जांच करने के बाद ही आवश्यक दवाएं लिखेंगे। यदि बीमारी किसी बैक्टीरियल संक्रमण के कारण हुई होगी, तभी एंटीबायोटिक दवा दी जाएगी; वायरल संक्रमण की स्थिति में एंटीबायोटिक नहीं लिखी जाएगी। बिना डॉक्टरी पर्चे के केमिस्ट से सीधे एंटीबायोटिक खरीदकर खाना शरीर के सामान्य बैक्टीरिया को एंटीबैक्टीरियल रेजिस्टेंट बना देता है, जो भविष्य में किसी भी इलाज को बेहद जटिल और महंगा बना सकता है।



















