डायबिटीज के मरीजों को रोज-रोज उंगली में सुई चुभाने के दर्द से जल्द ही मुक्ति मिल सकती है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के एक युवा वैज्ञानिक मुनीर खान ने एक ऐसी आधुनिक पोर्टेबल डिवाइस तैयार की है, जो बिना खून की एक भी बूंद निकाले मरीज के शरीर में ग्लूकोज का स्तर बता सकती है। यह नया आविष्कार रोशनी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक की मदद से काम करता है, जिसे पहनकर मरीज कभी भी अपना शुगर लेवल आसानी से जांच सकेंगे।
बिना सुई और बिना खून के कैसे होती है जांच?
यह नॉन-इनवेसिव डिवाइस कलाई पर घड़ी की तरह बांधी जाती है और त्वचा के सीधे संपर्क में रहती है। उपकरण में लगे खास फोटोनिक सेंसर शरीर के ऊतकों के भीतर प्रकाश किरणें भेजते हैं। जब यह प्रकाश ऊतकों से टकराकर वापस लौटता है, तो सेंसर उन संकेतों को पकड़ लेते हैं। इसके बाद डिवाइस में मौजूद AI आधारित प्रोसेसिंग सिस्टम इन प्रकाश संकेतों का विश्लेषण करता है और रक्त में ग्लूकोज के स्तर का सटीक अनुमान लगाता है। इस पूरी प्रक्रिया में न तो किसी सुई को चुभाने की जरूरत पड़ती है और न ही खून की बूंद निकालने की। आकार में छोटा और हल्का होने के कारण मरीज इसे आसानी से पहन सकते हैं या अपने साथ कहीं भी ले जा सकते हैं।
ब्रिटेन के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस में रजिस्ट्रेशन
मुनीर खान और उनकी टीम की इस खोज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी मान्यता मिली है। ब्रिटेन के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस में इस मेडिकल उपकरण के डिजाइन को आधिकारिक रूप से पंजीकृत कर लिया गया है। आधिकारिक दस्तावेजों में इस डिवाइस का नाम “Non-invasive Photonic Medical Device for Diabetes Monitoring” दर्ज किया गया है। मुनीर खान के साथ मृदुल पांडेय भी इस डिजाइन के सह-आविष्कारक यानी co-inventor हैं। ब्रिटेन में डिजाइन रजिस्ट्रेशन मिलने से इस शोध दल के बौद्धिक संपदा अधिकारों को कानूनी सुरक्षा मिल गई है।
पारंपरिक ग्लूकोमीटर के दर्द और झंझट से राहत
मधुमेह से पीड़ित मरीजों के लिए दिन में कई बार ग्लूकोज लेवल की जांच करना जीवन का अनिवार्य हिस्सा होता है। खासकर इंसुलिन का सेवन करने वाले मरीजों को दिन में कई बार अपनी शुगर का स्तर मापना पड़ता है। पारंपरिक तरीकों में मरीज को लैंसेट से अपनी उंगली चुभानी पड़ती है, जिससे खून की एक बूंद निकलती है। फिर इस बूंद को टेस्ट स्ट्रिप पर लगाया जाता है और ग्लूकोमीटर कुछ ही सेकंड में रीडिंग दिखाता है। हालांकि यह प्रक्रिया बहुत छोटी लगती है, लेकिन रोजाना बार-बार सुई चुभने के कारण उंगलियों में तेज दर्द, निशान और मानसिक तनाव होता है। मुनीर खान की तकनीक इसी लंबे दर्द को दूर करने का प्रयास करती है।
खेती-किसानी के जिले से निकलकर दुनिया में बनाई पहचान
इस आधुनिक डिवाइस को विकसित करने वाले मुनीर खान उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के एक छोटे से गांव गौरिया के रहने वाले हैं। लखीमपुर खीरी को आमतौर पर एक कृषि प्रधान जिले के तौर पर जाना जाता है, जहां अधिकतर लोग गन्ना, धान, गेहूं और सब्जियों की खेती से अपना जीवनयापन करते हैं। लेकिन अब जिले की नई पीढ़ी खेती के साथ-साथ डिजिटल तकनीक, विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में भी झंडे गाड़ रही है। मुनीर खान का यह काम यह साबित करता है कि ग्रामीण भारत के युवा वैज्ञानिक भी वैश्विक स्तर की स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान खोज रहे हैं।
बाजार में लॉन्च और मेडिकल मंजूरी की प्रक्रिया
ब्रिटेन में डिजाइन रजिस्ट्रेशन पाना मुनीर खान की टीम के लिए एक बड़ी बौद्धिक संपदा उपलब्धि है। हालांकि, इसे आम मरीजों के इस्तेमाल के लिए बाजार में उतारने से पहले कई नियामक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। किसी भी मेडिकल उपकरण को व्यावसायिक रूप से बिक्री या अस्पतालों में निगरानी के लिए पेश करने से पहले संबंधित स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं से कड़े परीक्षण और सुरक्षा मंजूरियां हासिल करनी होती हैं। यह परीक्षण प्रक्रिया यह सुनिश्चित करेगी कि डिवाइस द्वारा दिए गए अनुमानित ग्लूकोज आंकड़े चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित और सटीक हैं।


















