बाजार में उपलब्ध जीवनरक्षक दवाओं की शुद्धता और उनके मानकों को लेकर मरीजों तथा स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मन में अक्सर कई सवाल खड़े होते हैं। आम नागरिकों के बीच यह जिज्ञासा स्वाभाविक रहती है कि मेडिकल स्टोर पर बिकने वाली गोलियों या सिरप की वास्तविक जांच किस प्रक्रिया से गुजरती है और क्या किसी दवा की प्रयोगशाला जांच से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक रूप से देखे जा सकते हैं। इसी पारदर्शिता को धरातल पर उतारने के उद्देश्य से एक अहम सिफारिश रखी गई थी, जिसके तहत दवा निर्माता कंपनियों द्वारा प्रत्येक लॉट की जांच रिपोर्ट को आम लोगों के देखने हेतु एक साझा इंटरनेट मंच पर डालना जरूरी बनाया जाना था। हालांकि, भारत के शीर्ष दवा नियामक सलाहकारी तंत्र ने इस व्यवस्था को लागू करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है।
डीसीसी की 70वीं बैठक में हुआ निर्णय
दवा नियंत्रण नियमों पर विचार-विमर्श करने वाली ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी (डीसीसी) की 70वीं बैठक 18 सितंबर को आयोजित की गई थी। इस बैठक के आधिकारिक कार्यवृत्त यानी मिनट्स में दर्ज विवरण के अनुसार, दवा कंपनियों के गुणवत्ता परीक्षण दस्तावेजों को ऑनलाइन सार्वजनिक करने की योजना को नामंजूर किया गया। डीसीसी एक वैधानिक और नीतिगत मंच के रूप में कार्य करता है, जिसमें केंद्र सरकार और विभिन्न राज्यों के दवा नियंत्रक मिलकर भाग लेते हैं। पूरे देश में दवाओं से जुड़े नियमों, निगरानी प्रणालियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के लिए यह निकाय सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।
प्रस्तावित डिजिटल प्लेटफॉर्म का स्वरूप
प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव की मुख्य रूपरेखा दवाओं के गुणवत्ता नियंत्रण को पूरी तरह जनता की सीधी पहुंच में लाने पर केंद्रित थी। इसके तहत यह अनिवार्य किया जाना था कि सभी दवा निर्माता इकाइयां उत्पादन के बाद तैयार होने वाले प्रत्येक बैच का सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस (सीओए) अथवा परीक्षण रिपोर्ट अनिवार्य तौर पर एक केंद्रीय पब्लिक पोर्टल पर अपलोड करें। यदि यह नियम स्वीकृत हो जाता, तो कोई भी मरीज, चिकित्सक या अस्पताल किसी भी स्ट्रिप पर छपे बैच नंबर को देखकर यह जान सकता था कि प्रयोगशाला में उस दवा की सुरक्षा, घुलनशीलता और रासायनिक संतुलन को लेकर क्या परिणाम दर्ज हुए थे।
सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस और उसकी तकनीकी अहमियत
फार्मास्युटिकल उद्योग में जब भी किसी दवा का कोई नया बैच तैयार किया जाता है, तो वितरण से पूर्व उसके वैज्ञानिक मानकों की गहन पड़ताल की जाती है। इस विस्तृत रासायनिक एवं भौतिक जांच के समापन पर एक अधिकृत दस्तावेज तैयार होता है, जिसे तकनीकी भाषा में सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस कहा जाता है। यह दस्तावेज इस बात का पुख्ता प्रमाण होता है कि उक्त विशेष खेप को निर्धारित मानकों के तहत जांचा गया है और उसने सभी तय परीक्षणों में सफलता प्राप्त की है।
पारदर्शिता की मांग और नियामक संतुलन
इस पूरी पहल का प्राथमिक लक्ष्य दवा निर्माण के क्षेत्र में जवाबदेही को मजबूत करना था। सैद्धांतिक रूप से, जब परीक्षण परिणाम खुले तौर पर उपलब्ध होते हैं, तो स्वास्थ्य कर्मियों और उपभोक्ताओं को सीधे यह परखने की सुविधा मिल जाती है कि वे जिस दवा का सेवन कर रहे हैं, उसकी प्रयोगशाला रिपोर्ट कैसी रही है। इसके बावजूद, डीसीसी के विचारार्थ विषय केवल आंकड़ों की उपलब्धता तक सीमित नहीं था। समिति को यह गहनता से देखना था कि दवाओं की गुणवत्ता की असल निगरानी किस वैधानिक ढांचे के तहत संचालित होनी चाहिए और मौजूदा नियामक व्यवस्था में इस प्रकार के सीधे सार्वजनिक प्रदर्शन का क्या प्रशासनिक प्रभाव पड़ेगा। सभी पहलुओं पर मंथन के बाद समिति ने इस अनिवार्य सार्वजनिक अपलोड व्यवस्था को अस्वीकार करने का अंतिम रुख अपनाया।



















