कभी बढ़ती उम्र का संकट माना जाने वाला दिल का रोग अब कम उम्र के लोगों को अपना शिकार बना रहा है। देश में हृदय रोग के विस्तार को लेकर सामने आए राष्ट्रीय सांख्यिकी के नए आंकड़े बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों के अनुसार बीते आठ वर्षों की अवधि में हृदय संबंधी दिक्कतों के मामलों में करीब तीन गुनी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जहां वर्ष 2017-18 के दौरान प्रति एक लाख नागरिकों पर 1333 लोग इस परेशानी से जूझ रहे थे, वहीं मौजूदा दौर में यह आंकड़ा उछलकर 3891 तक पहुंच चुका है। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि प्रत्येक 100 नागरिकों में से लगभग 4 लोग किसी न किसी रूप में कार्डियोवैस्कुलर समस्या का सामना कर रहे हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जिम में कसरत करने वाले और बाहर से पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त दिखाई देने वाले युवा भी अचानक कार्डियक अरेस्ट और दिल के दौरों का शिकार बन रहे हैं।
कम उम्र के लोगों पर मंडराता गंभीर खतरा
इस अध्ययन से पता चलता है कि 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में हृदय रोगों की दर में 2.1 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वहीं दूसरी तरफ 30 से 44 वर्ष के लोगों में सामने आने वाली कुल बीमारियों में 15.3 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले दिल से जुड़े रोगों की पाई गई। जब मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति का विश्लेषण किया गया, तो उसमें भी यही पैटर्न दिखा। 15 से 29 वर्ष के युवाओं के कुल हॉस्पिटलाइजेशन में 3.4 प्रतिशत मामले दिल की बीमारियों के थे, जबकि 30 से 44 वर्ष के समूह में यह संख्या 7.3 प्रतिशत दर्ज की गई। चिकित्सकों और विशेषज्ञों का कहना है कि 30 वर्ष की दहलीज पार करते ही अनियंत्रित उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी समस्याएं हृदय को सबसे भारी नुकसान पहुंचाती हैं।
असमय होने वाली मौतों में सबसे बड़ा कारण
अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि 70 वर्ष से कम आयु में होने वाले कुल देहांतों में 53.4 प्रतिशत मौतों के पीछे दिल की बीमारियां ही प्रमुख वजह रहीं। देश की राजधानी दिल्ली का डेटा इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट करता है। वर्ष 2005 में दिल्ली के भीतर हृदय रोगों और दिल के दौरे से 8,576 मौतें हुई थीं, जो वर्ष 2023 तक उछलकर 22,385 के स्तर पर पहुंच गईं। इन मौतों में 21.9 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनकी उम्र मात्र 15 से 44 वर्ष के बीच थी। इस अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और शुगर के बढ़ते मामले इस संकट को और गहरा बना रहे हैं।
बिना किसी लक्षण के धमनियों में रुकावट का मामला
चिकित्सकों के पास पहुंच रहे मामले यह साबित करते हैं कि शारीरिक रूप से सक्रिय और स्वस्थ दिखने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं हैं। एक 38 वर्षीय व्यक्ति का उदाहरण सामने आया, जो रोजाना कोर्ट पर एक घंटा बैडमिंटन खेलता था। वह न तो धूम्रपान करता था, न ही उसे शुगर या बीपी की कोई शिकायत थी और न ही उसके परिवार में दिल के रोग का कोई पुराना इतिहास था। इसके बावजूद कोर्ट पर महज 30 मिनट की सक्रियता के बाद उसकी सांस फूलने और अत्यधिक थकान होने लगी। जब जांच के लिए एंजियोग्राफी की गई, तो उसकी दिल की तीनों प्रमुख कोरोनरी धमनियों में गंभीर रुकावट मिली, जिसके बाद डॉक्टरों को उसकी तत्काल ट्रिपल बाईपास सर्जरी करनी पड़ी।
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में कार्डियोथोरैसिक और वैस्कुलर सर्जरी के वरिष्ठ कंसल्टेंट डॉ. वरुण बंसल के मुताबिक, मरीज में बीमारी के कोई पारंपरिक खतरे मौजूद नहीं थे। डॉ. वरुण बंसल ने बताया कि मरीज ने केवल इस बात पर गौर किया था कि खेल के दौरान उसकी शारीरिक क्षमता धीरे-धीरे घट रही थी।
अस्पष्ट कारणों से धड़कनों की गड़बड़ी और हार्ट फेलियर
एक अन्य घटनाक्रम में पूरी तरह स्वस्थ मानी जाने वाली एक युवती अचानक तेज घबराहट, असामान्य रूप से तेज धड़कन और सांस में भारी रुकावट के चलते अचेत होने की कगार पर पहुंच गई। अस्पताल में जांच करने पर पता चला कि उसके दिल की रक्त पंप करने की क्षमता घटकर केवल 30 प्रतिशत रह गई थी। स्थिति इतनी नाजुक थी कि डॉक्टरों को उसे बचाने के लिए आपातकालीन बिजली के झटके देने पड़े। इसके बाद जब उसकी गर्दन पर एक उभरी हुई गांठ की बायोप्सी कराई गई, तो दिल की धमनियों में रुकावट की पुष्टि हुई। डॉक्टरों द्वारा दी गई दवाओं और उच्च खुराक वाले स्टेरॉयड के असर से उसकी धड़कनें संभलीं और दिल की कार्यक्षमता सुधरकर 45 से 50 प्रतिशत तक लौट आई।
पीएसआरआई अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. के. के. तलवार ने इस विषय पर टिप्पणी की। डॉ. के. के. तलवार ने कहा कि युवाओं में बिना स्पष्ट कारण के होने वाली धड़कन की गड़बड़ी और हार्ट फेलियर में पारंपरिक जांचों से आगे देखने की जरूरत होती है।



















