गोंडा जिले में बड़ी तादाद में किसान और पशुपालक अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए बकरी पालन का सहारा ले रहे हैं। जब भी मौसम करवट लेता है, तो वातावरण के बदलते मिजाज के साथ बकरियों की शारीरिक सेहत पर सीधा दबाव पड़ता है। अचानक तापमान में वृद्धि या गिरावट से जानवरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है, जिसके चलते वे कई तरह के संक्रमणों की चपेट में आ जाते हैं। विशेष रूप से छोटे मेमनों और शारीरिक रूप से कमजोर बकरियों में यह जोखिम कई गुना अधिक पाया जाता है। अगर पशुपालक समय रहते उचित प्रबंधन और बुनियादी सावधानियां अपना लें, तो अपने पशुधन को गंभीर बीमारियों और आकस्मिक नुकसान से पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं।
तापमान का उतार-चढ़ाव और बीमारियों का बढ़ता खतरा
उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी के अनुसार, जब मौसम बदलता है तब कभी तेज धूप और गर्मी, कभी अचानक ठंडक तो कभी वर्षा के कारण वातावरण में अनिश्चितता बनी रहती है। यह निरंतर तापमान असंतुलन सीधे तौर पर बकरियों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालता है। यदि इन जीवों को गीले, सीलन भरे अथवा अत्यधिक ठंडे फर्श पर बांधा जाए, तो उनके बीमार होने की दर काफी तेज हो जाती है। इसके अलावा बाड़े के आसपास जमा गंदा पानी, बासी या फफूंद लगा चारा और बाड़े के इर्द-गिर्द पनप रही गंदगी भी कई संक्रामक रोगों को जन्म देती है, जो तेजी से पूरे झुंड में फैल सकते हैं।
बाड़े और शेड के रख-रखाव में बरतें यह सावधानी
बदलते मौसम के दौरान पशुपालक को सबसे पहला ध्यान बकरियों के आवास स्थल पर देना चाहिए। शेड के भीतर किसी भी हाल में पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए और फर्श को हर समय सूखा रखने की व्यवस्था करनी चाहिए। बाड़े में एकत्र होने वाले गोबर, मल-मूत्र और अन्य कचरे की रोजाना व्यवस्थित सफाई बेहद आवश्यक है। बारिश के दिनों में शेड के अंदर सीलन और नमी बढ़ जाना स्वाभाविक है, इसलिए उसे तुरंत सुखाने या हवादार रखने के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। बकरियों को ठंडी हवाओं के सीधे झोंकों और वर्षा की बौछारों से महफूज रखने के लिए मजबूत शेड जरूरी है, क्योंकि अत्यधिक नमी और सर्दी बकरियों के श्वसन तंत्र को सबसे पहले प्रभावित करती है।
ताजा पानी और फफूंद रहित चारे की व्यवस्था
पशुओं के लिए हमेशा शुद्ध और ताजा पीने का पानी ही उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कई दिनों से बर्तनों में जमा गंदा अथवा बासी पानी पिलाने से पेट और आंतों से जुड़ी बीमारियां पनपने लगती हैं। खानपान के मामले में भी स्वच्छता और पौष्टिकता का पूरा ध्यान रखना अनिवार्य है। सड़ चुका, बासी अथवा फफूंद लगा चारा बकरियों को कभी न परोसें। सूखे चारे और दाने का भंडारण भी ऐसे सुरक्षित कमरों में करें जहां सीलन या बारिश का पानी न पहुंच सके। दूषित और सड़ा चारा खाने से बकरियों के पाचन तंत्र में गंभीर विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
बीमारी के शुरुआती संकेत और तुरंत अलगाव की जरूरत
यदि झुंड में किसी भी बकरी की तबीयत खराब दिखाई दे, तो संक्रमण की रोकथाम का पहला कदम उसे बाकी स्वस्थ बकरियों से तत्काल अलग करना है। यदि कोई बकरी नियमित खुराक छोड़ दे, चारा खाना बेहद कम कर दे, सुस्त होकर एक कोने में बैठी रहे, लगातार खांस रही हो, उसकी नाक से तरल पदार्थ बह रहा हो, दस्त की शिकायत हो या उसका शरीर बुखार से तप रहा हो, तो पशुपालक को इन संकेतों को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे किसी भी असामान्य लक्षण के उभरते ही योग्य पशु चिकित्सक से संपर्क साधना जरूरी है। इसके साथ ही कई जानलेवा संक्रमणों से स्थायी बचाव के लिए निर्धारित समय पर टीकाकरण पूरा कराना अनिवार्य है। पशुपालक अपने स्थानीय पशु अस्पताल या पशुपालन विभाग से संपर्क कर टीकाकरण कैलेंडर और जरूरी एहतियात की पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं।
कमजोर मेमनों की सुरक्षा और जरूरी चिकित्सा परामर्श
बकरी के नन्हे बच्चों में बीमारियों से लड़ने की स्वाभाविक ताकत कम होती है। इसलिए ऋतु परिवर्तन के समय उन्हें ठंड, बरसात और गीलेपन से दूर रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। बच्चों को हमेशा साफ-सुथरी, सूखी और गर्म जगह पर रखें और उनके पोषण की विशेष निगरानी करें। डॉ. राकेश कुमार तिवारी बताते हैं कि थोड़ी सी सतर्कता और नियमित देखभाल बकरियों को कई घातक व्याधियों से बचा सकती है। आवास की स्वच्छता, संतुलित आहार, शुद्ध पेयजल और समयबद्ध टीकाकरण को अपनाकर पशुपालक नुकसान से बच सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी प्रकार की बीमारी दिखने पर अपनी मर्जी से कोई दवा देने के बजाय केवल पंजीकृत पशु चिकित्सक के परामर्श पर ही उपचार शुरू करना चाहिए।

















