हॉलीवुड सिनेमा की चर्चित फिल्म ब्रेकिंग अवे और ब्रॉडवे थिएटर मंच पर अपने यादगार अभिनय की छाप छोड़ने वाली मशहूर अभिनेत्री बारबरा बैरी का 95 साल की उम्र में निधन हो गया। वे लंबे समय से कैंसर के आखिरी पड़ाव यानी टर्मिनल कैंसर और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस से जूझ रही थीं। अत्यधिक शारीरिक पीड़ा और सांस लेने में निरंतर बढ़ रही तकलीफ के बीच उन्होंने चिकित्सकीय रूप से सहायता प्राप्त मृत्यु का विकल्प चुना। उनकी बेटी जेन हार्निक ने इस दुखद समाचार की पुष्टि की है। इस घटनाक्रम ने गंभीर असाध्य रोगों के अंतिम चरण में होने वाले तीव्र दर्द और ऐसी अवस्था में सहायता प्राप्त मृत्यु के चिकित्सीय व कानूनी पहलुओं की ओर ध्यान खींचा है।
टर्मिनल कैंसर की अवस्था और अंगों पर उसका प्रभाव
टर्मिनल कैंसर चिकित्सा विज्ञान में उस स्थिति को कहा जाता है, जब कैंसर की अनियंत्रित कोशिकाएं शरीर के कई प्राथमिक और दूरस्थ अंगों में फैल जाती हैं। इस पड़ाव पर पहुंचने के बाद उपलब्ध चिकित्सीय पद्धतियों, दवाओं या कीमोथेरेपी से बीमारी को ठीक करना लगभग असंभव हो जाता है। धीरे-धीरे शरीर की सामान्य आंतरिक प्रक्रियाएं पूरी तरह चरमरा जाती हैं और शरीर दवाओं पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है। समय बीतने के साथ महत्वपूर्ण अंग एक-एक कर निष्क्रिय होने लगते हैं और मरीज मल्टी ऑर्गन फेल्योर की गंभीर स्थिति की ओर बढ़ने लगता है।
बारबरा बैरी को साल 1994 में पहली बार कोलोन कैंसर का पता चला था। इसके बाद उनका इलाज कई वर्षों तक लगातार चला, लेकिन समय बीतने के साथ यह बीमारी गंभीर रूप लेते हुए अंतिम अवस्था तक पहुंच गई। सामान्यतः ऐसी गंभीर स्थिति में कई विशेषज्ञ चिकित्सकों का एक पैनल मरीज के स्वास्थ्य परीक्षण के आधार पर यह आकलन करता है कि वह कितने महीने या दिन और जीवित रह सकता है। यह अनुमान वर्तमान चिकित्सीय आंकड़ों और मरीज की शारीरिक स्थिति के वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित होता है।
कैंसर में असहनीय दर्द के मुख्य चिकित्सीय कारण
अंतिम चरण में मरीज को होने वाली शारीरिक पीड़ा के पीछे कई ठोस जैविक कारण होते हैं। बारबरा बैरी के मामले में कैंसर का फैलाव हड्डियों तक हो चुका था या फिर शरीर के संवेदनशील हिस्सों में ट्यूमर की गांठें इतनी बड़ी हो गई थीं कि वे आसपास की नसों को बुरी तरह दबा रही थीं। जब कैंसर की विकराल गांठें नसों पर भारी दबाव डालती हैं या कोशिकाएं हड्डियों के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती हैं, तो मरीज को असहनीय दर्द का सामना करना पड़ता है।
इसके साथ ही उन्हें इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस की भी गंभीर समस्या थी। फेफड़ों की इस असाध्य बीमारी में फेफड़ों के आंतरिक ऊतक कठोर और क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह घट जाता है और सांस लेना एक अत्यंत कष्टदायी संघर्ष बन जाता है। कैंसर के भारी दर्द और सांस के इस गहरे संकट ने मिलकर शारीरिक तकलीफ को असहनीय बना दिया था।
क्या हर तरह के कैंसर में अत्यधिक दर्द महसूस होता है
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार आम लोगों में यह धारणा बहुत प्रचलित है कि कैंसर का मतलब हमेशा भयानक दर्द ही होता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। किसी मरीज को दर्द महसूस होगा या नहीं, यह इस बात पर तय होता है कि बीमारी शरीर के किस हिस्से में है और उसका प्रसार किस प्रकार हुआ है।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति को कोलोन कैंसर है और वह शरीर में फैलकर लिवर तक पहुंच जाता है, लेकिन वहां कोई बड़ी गांठ नहीं बनती जो नसों को दबाए, तो लिवर अपनी कार्यप्रणाली खोकर अंतिम चरण में फेल तो हो सकता है, परंतु मरीज को लिवर में दर्द का अहसास नहीं होता। इसी तरह अगर कैंसर मस्तिष्क तक फैल जाए, तब भी कई बार मरीज को सीधे दर्द का अनुभव नहीं होता। तीव्र दर्द की स्थिति मुख्य रूप से तब पैदा होती है जब कैंसर की बड़ी गांठें नसों पर लगातार दबाव बनाएं या फिर कैंसर कोशिकाएं हड्डियों के भीतर पहुंचकर उन्हें अंदर से खोखला करने लगें।
चिकित्सीय रूप से सहायता प्राप्त मृत्यु के कानूनी और मानवीय पहलू
अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में इस संबंध में कानून प्रभावी है, जो असाध्य रोगों से जूझ रहे मरीजों को गरिमापूर्ण अंत का अधिकार प्रदान करता है। वहां की चिकित्सा प्रणाली में कैंसर के मरीज को बीमारी की वास्तविक स्थिति के बारे में पूरी पारदर्शिता से जानकारी देना अनिवार्य है। मरीज को स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि कैंसर किस प्रकार का है, वह शरीर में कहां तक फैल चुका है, बीमारी किस स्टेज में है, ठीक होने की कितनी संभावना बची है और मरीज के पास संभावित जीवन कितना शेष है।
इस कानून के प्रावधानों के अंतर्गत जब किसी मरीज को ऐसी बीमारी हो जाती है जिसमें उसके बचने की उम्मीद बहुत कम रह जाती है और उपलब्ध चिकित्सा या दवाएं निष्प्रभावी हो जाती हैं, तब विशेषज्ञ डॉक्टरों का एक बोर्ड स्थिति की विस्तृत समीक्षा करता है। बोर्ड यह आंकलन करता है कि मरीज कितने समय तक जीवित रह सकता है और उसे आने वाले समय में किस स्तर की शारीरिक व मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ सकती हैं। यदि मरीज पूरी तरह अपने होशोहवास में है और अपनी स्वतंत्र इच्छा से शांतिपूर्ण अंत का विकल्प चुनना चाहता है, तो तय कानूनी प्रक्रिया के तहत इसकी अनुमति मिल सकती है। यह निर्णय पूरी तरह मरीज की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर करता है, ताकि अंतिम समय में उसके जीवन की गुणवत्ता और मानवीय गरिमा बनी रहे।


















