फरीदाबाद के शहरी क्षेत्रों और स्थानीय नर्सरियों में इन दिनों पौधरोपण का एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। पर्यावरण को स्वच्छ रखने और घर की सुंदरता बढ़ाने के साथ-साथ लोग अब ऐसे पौधों को तरजीह दे रहे हैं, जिनमें प्राकृतिक औषधीय गुण मौजूद हों। हवा की गुणवत्ता और बढ़ते प्रदूषण के बीच शहरवासी केवल सजावटी पत्तियों वाले पौधों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे आयुर्वेद में बताए गए गुणकारी पौधों को अपने बगीचे और बालकनी में जगह दे रहे हैं। इसी क्रम में फरीदाबाद की विभिन्न नर्सरियों पर पत्थरचट्टा नाम का पौधा लोगों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित कर रहा है। मानसून के इस मौसम में मिट्टी में नमी और अनुकूल वातावरण के कारण इसकी बिक्री में तेजी दर्ज की गई है। इस पौधे की उपलब्धता और घर पर रखरखाव बेहद आसान है, जिससे आम नागरिक इसे सुलभता से खरीदकर अपने आवास पर रोप रहे हैं।
आयुर्वेद में पाषाण भेद के नाम से प्राचीन पहचान
प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धतियों में इस पौधे का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। फरीदाबाद स्थित सर्वोदय हॉस्पिटल के आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉक्टर चेतन शर्मा के अनुसार, पत्थरचट्टा को संस्कृत भाषा और आयुर्वेदिक शास्त्रों में पाषाण भेद नाम से संबोधित किया जाता है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसे सामान्य तौर पर पत्थरचट्टा कहा जाता है। इस पौधे का नाम इसके उगने की प्राकृतिक क्षमता को दर्शाते हुए रखा गया है। यह पौधा कठोर चट्टानों, पत्थरों की दरारों और विपरीत परिस्थितियों में भी अंकुरित होकर बाहर निकलने की अद्भुत क्षमता रखता है। मैदानी इलाकों, सार्वजनिक उद्यानों और ग्रामीण भूभागों में यह जमीन की सतह के निकट आसानी से पनपता हुआ दिखाई देता है। इसकी मोटी और रसदार पत्तियां जल संचयन में सक्षम होती हैं। सदियों पुरानी आयुर्वेदिक परंपरा में इसे विभिन्न शारीरिक समस्याओं के निवारण के लिए एक प्रभावशाली जड़ी-बूटी के रूप में मान्यता प्राप्त है।
किडनी की पथरी और रिनल स्टोन में पत्थरचट्टा की भूमिका
गुर्दे की पथरी यानी रिनल स्टोन की समस्या से जूझ रहे रोगियों के लिए पत्थरचट्टा का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में अत्यंत कारगर माना जाता है। डॉक्टर चेतन शर्मा बताते हैं कि जिस प्रकार यह पौधा कठोर पत्थरों को चीरकर अपना मार्ग बना लेता है, उसी प्राकृतिक स्वभाव के आधार पर आयुर्वेदिक विज्ञान में इसे किडनी स्टोन को विघटित करने में उपयोगी माना गया है। जब शरीर में कैल्शियम या अन्य खनिजों के जमाव से किडनी में पथरी निर्मित हो जाती है, तब पाषाण भेद का सही मात्रा में सेवन उस जमाव को छोटे-छोटे कणों में तोड़ने में मदद करता है। यह पथरी को प्राकृतिक रूप से मूत्र मार्ग के जरिए शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को सुगम बनाता है। इसी विशिष्ट गुण के कारण गुर्दे से जुड़े विकारों के उपचार हेतु निर्मित की जाने वाली कई आयुर्वेदिक औषधियों में इसके घटकों को शामिल किया जाता है।
मूत्र विकार और ड्यूरेटिक प्रभाव में सहायक
किडनी की पथरी को नष्ट करने के अलावा पत्थरचट्टा का सेवन मूत्र प्रणाली के स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने में भी लाभकारी सिद्ध होता है। चिकित्सा विशेषज्ञ बताते हैं कि पाषाण भेद में प्राकृतिक रूप से ड्यूरेटिक गुण मौजूद होते हैं। ड्यूरेटिक उस तत्व या औषधि को कहा जाता है, जो शरीर में मूत्र के निर्माण और उसके निष्कासन की दर को बढ़ाता है। जिन व्यक्तियों को पेशाब रुक-रुक कर आने, जलन होने अथवा मूत्र त्याग में कठिनाई का सामना करना पड़ता है, उनके लिए यह पौधा अत्यंत उपयोगी माना जाता है। यह मूत्र मार्ग की रुकावटों को दूर करने और तरलता को बढ़ाने में मदद करता है। आयुर्वेद में लंबे समय से किडनी और यूरिनरी ट्रैक से संबंधित जटिलताओं को दूर करने के लिए तैयार किए जाने वाले काढ़ों और औषधीय योगों में पाषाण भेद का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है।
ताजा रस निकालने का तरीका और अनुशंसित खुराक
घर में लगे ताजा पत्थरचट्टा के पौधे से इसका औषधीय लाभ प्राप्त किया जा सकता है। डॉक्टर चेतन शर्मा के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के पास इस पौधे की ताजी पत्तियां उपलब्ध हैं, तो वह इसका रस निकालकर सेवन कर सकता है। रस तैयार करने के लिए इसकी पत्तियों को अच्छी तरह धोकर सिलबट्टे पर पीसने की पारंपरिक विधि को सबसे उपयुक्त माना जाता है। पीसने के उपरांत पत्तियों से प्राप्त 2 एमएल रस की खुराक सुबह और शाम के समय खाना खाने से पहले लेने की सलाह दी जाती है। यह नियंत्रित मात्रा किडनी के कार्य को बेहतर बनाने और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होती है। हालांकि, प्रत्येक रोगी की शारीरिक स्थिति, आयु और रोग की तीव्रता भिन्न होती है, जिसके आधार पर ही इसकी सटीक मात्रा निर्धारित की जानी चाहिए।
नर्सरियों में बढ़ती मांग और प्रदूषण नियंत्रण का प्रयास
वर्षा ऋतु का आगमन होते ही हरियाली बढ़ाने की इच्छा से लोग नर्सरियों का रुख करते हैं। फरीदाबाद जैसे औद्योगिक और घने आबादी वाले शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल रहा है। ऐसे में लोग अपने घरों के भीतर और आसपास का वातावरण स्वच्छ बनाने के प्रयास में जुटे हैं। नर्सरी संचालकों के अनुसार, ग्राहक अब केवल फूलों और सजावटी पत्तियों की सुंदरता देखकर पौधा नहीं चुनते, बल्कि वे पौधे के औषधीय गुणों, हवा को शुद्ध करने की क्षमता और आयुर्वेद में उसके महत्व के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करते हैं। पत्थरचट्टा इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। यह घर के प्रांगण में हरियाली का विस्तार तो करता ही है, साथ ही आवश्यकता पड़ने पर एक त्वरित घरेलू उपचार के रूप में भी उपलब्ध रहता है।
चिकित्सकीय परामर्श के बिना सेवन से बचें
यद्यपि पत्थरचट्टा के औषधीय लाभ बहुआयामी हैं, किंतु इसका स्वयं से सेवन करना हानिकारक भी हो सकता है। डॉक्टर चेतन शर्मा इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि किसी भी व्यक्ति को आयुर्वेदिक डॉक्टर की पूर्व सलाह के बिना इसका नियमित सेवन शुरू नहीं करना चाहिए। मानव शरीर की तासीर, दोष (वात, पित्त, कफ) की स्थिति और पूर्व से चली आ रही बीमारियां हर व्यक्ति में अलग होती हैं। जरूरी नहीं कि जो औषधि एक व्यक्ति के लिए लाभप्रद हो, वह दूसरे के लिए भी समान रूप से उपयुक्त सिद्ध हो। गुर्दे की पथरी का आकार, उसकी स्थिति और रोगी की समग्र सेहत को ध्यान में रखकर ही विशेषज्ञ यह तय करते हैं कि पत्थरचट्टा का रस कितनी मात्रा में और कितने समय तक लिया जाना चाहिए। इसलिए स्वास्थ्य संबंधी लाभ पाने के लिए योग्य चिकित्सक की देखरेख में ही इसका उपयोग करें।



















