आज के समय में खान-पान की आदतें बेहद खराब हो चुकी हैं और चारों तरफ अस्वास्थ्यकर भोजन का बोलबाला है। पिज्जा, बर्गर, चाउमीन और मोमोज जैसे फास्ट फूड के लगातार बढ़ते इस्तेमाल ने जनस्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाया है। ऐसी स्थिति में यह समझना जरूरी हो जाता है कि वास्तविक रूप से सेहतमंद भोजन क्या है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसका सीधा जवाब यही है कि आज से 50 से 100 साल पहले हमारे दादा-परदादा जो शुद्ध और प्राकृतिक चीजें खाते थे, वही असली हेल्दी फूड था। पूर्वजों का वह शुद्ध आहार ही मुख्य वजह थी कि उस दौर में लोगों को क्रोनिक बीमारियां बहुत कम होती थीं।
पूर्वजों के खान-पान में छिपा था बीमारियों से बचाव का राज
आज से 50 या 100 साल पहले की बात करें तो हमारे पूर्वज जिन खाद्य पदार्थों का सेवन करते थे, वे बिना किसी मिलावट के पूरी तरह प्राकृतिक होते थे। यही कारण था कि उस समय मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग, लिवर और किडनी से जुड़ी गंभीर क्रोनिक बीमारियों के मामले न के बराबर देखने को मिलते थे। अधिकतर लोग स्वाभाविक रूप से स्वस्थ और दीर्घायु होते थे। अपोलो अस्पताल में जेरिएट्रिक एंड लॉन्गिविटी साइंस के डायरेक्टर डॉ. प्रसून चटर्जी का कहना है कि हमारे पूर्वज जो भोजन लेते थे, उसमें से ज्यादातर चीजें सेहत के लिए बेहद फायदेमंद थीं। उन्हें इस बात की अच्छी समझ थी कि शरीर की आंतरिक घड़ी और प्रकृति के बदलावों के हिसाब से कौन सा आहार उनके अनुकूल रहेगा। जब आधुनिक विज्ञान इतना विकसित नहीं हुआ था, तब भी हमारे ऋषि-मुनियों और पूर्वजों ने प्रकृति के नियमों के अनुसार अपनी दिनचर्या और आहार को संतुलित किया था। यदि आज भी हम उन बुनियादी नियमों का ईमानदारी से पालन करें, तो हमारी आधी से अधिक स्वास्थ्य समस्याएं बिना किसी दवा के समाप्त हो सकती हैं।
पौधों पर आधारित शुद्ध आहार और मौसमी विविधता
डॉ. प्रसून चटर्जी के अनुसार सबसे बेहतर और हेल्दी फूड वही है जिसमें विविध प्रकार के पोषक तत्व मौजूद हों और जिसके दुष्प्रभाव न के बराबर हों। पेड़-पौधों से प्राप्त होने वाली प्राकृतिक चीजें सबसे शुद्ध मानी जाती हैं। यदि इन चीजों को बिना किसी कृत्रिम मिलावट के प्राकृतिक रूप में खाया जाए, तो यह शरीर के लिए सबसे ज्यादा गुणकारी साबित होती हैं। यही कारण था कि हमारे दादा-दादी अपने दैनिक जीवन में साबुत अनाज पर निर्भर रहते थे। वे पौधों की जड़ों और तनों का सेवन करते थे और साथ ही मौसम के अनुसार मिलने वाली ताजी सब्जियों, घर में तैयार दूध के उत्पादों, मेवों और बीजों को अपने भोजन में शामिल करते थे। उनके भोजन में तेल और मसालों का इस्तेमाल नाममात्र का होता था, जिससे भोजन के प्राकृतिक पोषक तत्व सुरक्षित रहते थे।
मोटे अनाज का पुनरुद्धार: रागी, बाजरा, ज्वार और अमरंथ
लगभग 50 साल पहले तक हमारे देश में मोटे अनाज का चलन सबसे ज्यादा था। रागी, बाजरा और ज्वार जैसे पारंपरिक अनाजों का उपयोग हर घर में रोटी, दलिया, चीला और अन्य व्यंजनों में नियमित रूप से किया जाता था। हालांकि समय के साथ यह आदतें बदल गईं, लेकिन अब एक बार फिर इन अनाजों की लोकप्रियता लौट रही है। डॉक्टरों और आहार विशेषज्ञों का मानना है कि रागी, बाजरा, ज्वार और अमरंथ जैसे पारंपरिक अनाजों को केवल एक अस्थायी डाइट ऑप्शन के रूप में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के भोजन के मुख्य हिस्से के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। विशेष रूप से बाजरा शरीर के लिए बेहद लाभदायक है। इसे अपनी रोजाना की रोटी या दलिया में शामिल करने के लिए खान-पान की शैली में कोई बड़ा या जटिल बदलाव करने की भी आवश्यकता नहीं होती है।
सत्तू और दालों के जरिए प्राकृतिक प्रोटीन की पूर्ति
शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए पुराने समय में सत्तू सबसे शक्तिशाली और प्रभावी भोजन माना जाता था। सत्तू का निर्माण काले चने से किया जाता है, जिसे मोटे अनाजों में एक बेशकीमती रत्न का दर्जा दिया गया है। उत्तर भारत में सदियों से सत्तू का सेवन किया जाता रहा है। सत्तू में भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है, जो दिनभर की प्रोटीन जरूरतों को आसानी से पूरा कर देता है। सत्तू के अलावा पहले के समय में लोग रोजाना दालों का सेवन करते थे। दालों के साथ-साथ राजमा और लोबिया जैसी सब्जियों से भी शरीर को पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक प्रोटीन मिल जाता था। यदि आज भी सत्तू और पारंपरिक दालों को दैनिक दिनचर्या में शामिल किया जाए, तो कई शारीरिक बीमारियों से हमेशा के लिए मुक्ति पाई जा सकती है।
तिल, मूंगफली और सूखे मेवों से मिलने वाली प्राकृतिक ऊर्जा
पारंपरिक भारतीय आहार में मूंगफली और तिल प्रमुख बीजों के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। इनसे विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन बनाए जाते थे। तिल और मूंगफली की चटनी, दलिया या लड्डू बनाकर उन्हें मिठाइयों की तरह खाया जाता था। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से आज भी तिल के लड्डू के सामने बाजार की आधुनिक मिठाइयां पूरी तरह विफल साबित होती हैं। बीजों के अतिरिक्त पूर्वजों के खान-पान में सूखे मेवों का भी बड़ा योगदान था। वे रोजाना बादाम, अखरोट और छुहारे जैसी पौष्टिक चीजों का प्रचुर मात्रा में सेवन करते थे। यदि हम भी आज इन पारंपरिक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को अपनी नियमित डाइट का हिस्सा बना लें, तो बिना किसी गंभीर समस्या के सेहतमंद जीवन जी सकते हैं।



















