उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के कई ग्रामीण इलाकों में चोट लगने पर प्राथमिक उपचार की एक बेहद पुरानी और अनूठी परंपरा आज भी जीवित है। गांवों में उगने वाले बांस के पेड़ों की गांठों पर अक्सर भूरे रंग का रुई जैसा एक खास पदार्थ देखने को मिलता है। स्थानीय बोलचाल में ग्रामीण इसे नोनी या कोठ के नाम से पुकारते हैं। पुराने दौर में जब दूर-दराज के गांवों में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं और अस्पताल बेहद सीमित थे, तब अचानक हाथ-पैर कट जाने या छिल जाने पर इसी प्राकृतिक पदार्थ का बाहरी तौर पर मरहम की तरह इस्तेमाल किया जाता था।
ग्रामीण इलाकों में क्यों माना जाता है इसे देसी मरहम
बांस की गांठ पर जमे इस रुई जैसे तत्व को नाखून से खुरचकर आसानी से अलग किया जा सकता है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि जब आधुनिक दवाएं उपलब्ध नहीं थीं, तब यह देसी नुस्खा लोगों के लिए जीवन रक्षक साबित होता था। बांस के समीप मौजूद बुजुर्ग सरल के अनुसार, त्वचा अचानक कट जाने की स्थिति में यह रुई फौरन खून के बहाव को थाम लेती है और फिर धीरे-धीरे जख्म को सुखाकर ठीक कर देती है।
विशेषज्ञ की राय और टांके जैसा असर
इस अनूठी लोक परंपरा पर प्रकाश डालते हुए प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि बांस की गांठ पर जमा होने वाली यह रुई किसी आधुनिक मरहम से कम असरदार नहीं होती। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह चोट लगने पर त्वचा से बहने वाले खून को तत्काल रोक देती है और कटे हुए हिस्से को तेजी से सुखाने में सहायता करती है। इसके अलावा, यह त्वचा के कटे हुए भाग को भरने तथा उसे स्वस्थ करने में सक्रिय भूमिका निभाती है। यदि चोट लगने से त्वचा का कटा हुआ हिस्सा अधिक चौड़ा हो गया हो, तो यह उस खुले भाग को आपस में जोड़कर प्राकृतिक टांका लगाने जैसा काम भी करती है।
इस्तेमाल के नियम और चिकित्सीय परामर्श की जरूरत
इस पारंपरिक पद्धति को अपनाते समय कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। नोनी या कोठ का प्रयोग केवल त्वचा के बाहरी हिस्से पर ही किया जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब साधारण कट लगा हो। इसके साथ ही यह सावधानी भी जरूरी है कि यदि घाव बहुत गहरा हो या चोट गंभीर किस्म की हो, तो केवल घरेलू नुस्खे पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करके उचित चिकित्सीय परामर्श लेना चाहिए।


















