अक्सर घरों में सुबह के नाश्ते में चना, सोयाबीन अथवा मूंग दाल को अंकुरित कर खाना स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। हालांकि, यही नियम जब आलू पर लागू किया जाता है, तो स्थिति बिल्कुल विपरीत हो जाती है। हर भारतीय रसोई की रीढ़ मानी जाने वाली प्याज, लहसुन और आलू जैसी कंद वाली फसलें यदि खेत से निकलने के बाद सही तरीके से न रखी जाएं, तो वे सेहत के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकती हैं। आमतौर पर नमी मिलने पर आलू में छोटे-छोटे अंकुर फूटने लगते हैं और उनकी ऊपरी त्वचा पर हरे या नीले रंग के निशान उभर आते हैं। ऐसे बदलाव केवल रूप-रंग तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कंद के भीतर रासायनिक बदलाव की ओर इशारा करते हैं।
सूर्य की सीधी रोशनी और सोलेनिन का रासायनिक प्रभाव
आलू की सतह पर दिखने वाले हरे अथवा नीले चकत्ते दरअसल खेत में फसल के दौरान सूरज की सीधी किरणों के संपर्क में आने से तैयार होते हैं। मिट्टी से बाहर निकले हिस्से पर धूप पड़ने से उसमें सोलेनिन नामक पिगमेंट तेजी से बनने लगता है। यह प्राकृतिक यौगिक इंसानी शरीर के लिए जहरीला साबित होता है और इसके अत्यधिक जमाव से पूरा आलू विषैला बन जाता है। इस तरह के दूषित आलू को आहार में शामिल करने से पाचन तंत्र बिगड़ सकता है और पेट से जुड़े कई रोग घेर सकते हैं। यदि किसी आलू का केवल एक हिस्सा हरा दिखाई दे रहा हो और उसे पकाना जरूरी हो, तो इस्तेमाल से पहले उस हरे भाग को पूरी तरह काटकर अलग कर देना चाहिए।
अंकुरण से घटती है गुणवत्ता और स्वाद
श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया में कार्यरत मृदा विज्ञान और कृषि रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार सिंह का कहना है कि जब आलू में आंखें निकलने लगें, तो उसके सेवन से परहेज करना चाहिए। उनके अनुसार, कंद में मौजूद स्टार्च का बड़ा हिस्सा नए अंकुर को विकसित करने में खर्च होने लगता है। इस रासायनिक प्रक्रिया के चलते आलू के अंदर स्टार्च कम पड़ जाता है, जिसके कारण वह पकाने पर बिल्कुल बेस्वाद हो जाता है। यदि आलू में अंकुरण की शुरुआत दिखाई दे रही हो, तो उन अंकुरों को तुरंत तोड़कर हटा देना चाहिए ताकि वे आगे न बढ़ सकें।
अधिक स्टार्च से वजन और शुगर का खतरा
आहार में किसी भी वस्तु का जरूरत से ज्यादा उपयोग नुकसानदायक होता है। आलू मुख्य रूप से उच्च स्टार्च वाली खाद्य सामग्री है, जिसका अंधाधुंध उपभोग कई परेशानियां ला सकता है। भोजन के साथ शरीर में पहुंचने वाला अतिरिक्त स्टार्च आगे चलकर ग्लूकोज का रूप ले लेता है, जो रक्त में शर्करा के स्तर को सीधे तौर पर बढ़ाता है। यही वजह है कि मधुमेह की समस्या से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए आलू का नियमित या अधिक सेवन उचित नहीं माना जाता। इसके अलावा, अत्यधिक मात्रा में इसे खाने से तेजी से शारीरिक वजन बढ़ने की आशंका भी बनी रहती है। समय बीतने के साथ जैसे-जैसे आलू पुराना पड़ता है, उसमें स्टार्च का अनुपात भी निरंतर बढ़ता जाता है।
सब्जियों के मूल औषधीय गुणों की रक्षा
प्रो. सिंह यह भी स्पष्ट करते हैं कि बाजार में ताजी हरी सब्जियां उपलब्ध होने पर भोजन में आलू की हिस्सेदारी न्यूनतम रखनी चाहिए या फिर उसे पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। करेला, परवल और भिंडी जैसी मौसमी सब्जियों को पकाते समय आलू मिलाने से बचना चाहिए। प्रत्येक वनस्पति और सब्जी की अपनी एक अलग रासायनिक संरचना और स्वास्थ्यवर्धक गुण होते हैं। जब हर प्रकार की सब्जी में आलू मिला दिया जाता है, तो उस व्यंजन का स्वाद आलू के असर में दब जाता है। इस प्रक्रिया से हरी सब्जियों में मौजूद प्राकृतिक औषधीय गुण और उनका वास्तविक पोषण प्रभाव काफी हद तक कमजोर पड़ जाता है।
प्याज, लहसुन और आलू के सही रखरखाव के तरीके
कंद श्रेणी में आने वाले कृषि उत्पादों के लंबे समय तक सुरक्षित उपयोग के लिए उनकी खुदाई के तुरंत बाद उचित संरक्षण जरूरी होता है। यदि प्याज, लहसुन और आलू को नमी भरे वातावरण में रखा जाए, तो उनमें तेजी से कल्ले फूटने लगते हैं। प्रो. सिंह के मुताबिक, इन सभी खाद्य सामग्रियों को नमी और गीलेपन से बिल्कुल दूर सूखी जगह पर रखना आवश्यक है। आलू को अंकुरित होने और जहरीले असर से बचाने का सबसे सही तरीका यह है कि उन्हें हमेशा खुली, हवादार और छायादार जगह पर भंडारित किया जाए, जिससे वे लंबे समय तक खाने योग्य बने रहें।


















