मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य सुविधाओं और महिला बाल विकास योजनाओं को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य सरकार ने ग्रामीण इलाकों में माताओं और नवजात बच्चों की सेहत सुधारने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर धन खर्च किया है। इसके बावजूद, मध्य प्रदेश पूरे देश में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर वाला राज्य बना हुआ है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि कुछ आंकड़ों में आंशिक सुधार जरूर हुआ है, लेकिन जमीनी स्तर पर आंगनवाड़ी केंद्रों की बदहाली और अधिकारियों के खाली पद इस पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को खोखला कर रहे हैं।
मौतों के आंकड़ों में गिरावट, फिर भी हालात गंभीर
सरकारी मूल्यांकन इस बात की पुष्टि करता है कि पिछले छह वर्षों के दौरान स्थिति में लगभग छह प्रतिशत का सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में प्रति एक लाख जीवित जन्म पर होने वाली मातृ मृत्यु दर 173 के खतरनाक स्तर से नीचे आकर 135 तक पहुंच गई है। इसी तरह, प्रति एक हजार जीवित जन्म पर होने वाली शिशु मृत्यु दर भी 52 से घटकर 35 दर्ज की गई है। ये आंकड़े स्वास्थ्य सेवाओं के आंशिक असर को जरूर दर्शाते हैं, लेकिन राष्ट्रीय औसत के मुकाबले मध्य प्रदेश की स्थिति आज भी बेहद खराब है। देश के अन्य राज्यों की तुलना में यहां माताओं की जान जाने का जोखिम सबसे अधिक है, जो स्वास्थ्य विभाग के दावों पर बड़े सवाल खड़े करता है।
गांवों में बुनियादी ढांचे का भारी अभाव
ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं तक पोषण पहुंचाने की सबसे अहम कड़ी आंगनवाड़ी केंद्र होते हैं। ऑडिट में इन्हीं केंद्रों की सबसे बड़ी नाकामी उजागर हुई है। जनसंख्या मानकों के आधार पर देखा जाए तो प्रदेश के 54,903 गांवों में से 8,842 गांवों में तो आंगनवाड़ी केंद्र स्थापित ही नहीं किए गए हैं। जो केंद्र संचालित हो रहे हैं, उनकी हालत भी जर्जर है। कई आंगनवाड़ियों में पीने के साफ पानी, सुरक्षित शौचालय और राशन रखने के लिए स्टोर रूम जैसी सबसे बुनियादी सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं। ढांचे की इस भयानक कमी का सीधा असर महिलाओं और नवजात बच्चों को मिलने वाले पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
विशाल बजट और खाली पदों की मार
यह पूरी स्थिति इसलिए भी हैरान करने वाली है क्योंकि इन कल्याणकारी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। कैग ने वित्तीय वर्ष 2019-20 से लेकर 2023-24 तक महिला एवं बाल विकास और स्वास्थ्य विभाग की विभिन्न योजनाओं का विस्तृत ऑडिट किया। इस पांच साल की अवधि में बच्चों के उचित पोषण और गर्भवती महिलाओं को बेहतर इलाज मुहैया कराने के नाम पर 20,565 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की गई। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, पूरे राज्य में काम कर रहीं 97,303 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के जरिए करीब 1.51 करोड़ हितग्राहियों तक इन योजनाओं का लाभ पहुंचाया गया।
इतने बड़े बजट और जमीनी कार्यकर्ताओं की फौज होने के बावजूद, पूरी व्यवस्था को संभालने वाले आला अधिकारियों की भारी कमी है। रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया है कि जिला स्तर पर योजनाओं की निगरानी करने वाले जिला परियोजना अधिकारियों के 55 प्रतिशत पद पूरी तरह खाली पड़े हैं। इसी तरह, बाल विकास परियोजना अधिकारियों के 40 प्रतिशत और सुपरवाइजर के 17 प्रतिशत पदों पर किसी की तैनाती नहीं हुई है। नेतृत्व और उचित मॉनिटरिंग के इस गंभीर अभाव में ही मध्य प्रदेश अपनी बदतरीन मातृ मृत्यु दर के कलंक को मिटाने में नाकाम साबित हो रहा है।




















