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बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ में खेतों तक पहुंचे कृषि अधिकारी, फसल कटाई प्रयोगों की भी हुई जांचराजस्थान
8 सित॰ 2026, 6:17 pm (1 घंटे पहले)· 2

बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ में खेतों तक पहुंचे कृषि अधिकारी, फसल कटाई प्रयोगों की भी हुई जांच

बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने खेतों में पहुंचकर मूंग और मोठ की फसल की स्थिति परखी और साथ ही फसल कटाई प्रयोगों की प्रक्रिया की भी जांच की.

बीकानेर जिले के श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी सीधे खेतों में पहुंचे और खरीफ सीजन में मूंग तथा मोठ की फसल की असल स्थिति परखी. अधिकारियों ने पौधों की बढ़वार, फलियों की संख्या और आने वाले दिनों में कितनी उपज मिल सकती है, इसका जायजा लिया. इस दौरान किसानों और मौके पर मौजूद कर्मचारियों से बुवाई के समय, बारिश के असर और संभावित पैदावार को लेकर सीधी बातचीत भी हुई.

वरिष्ठ अधिकारियों ने संभाला मोर्चा

बीकानेर खंड के अतिरिक्त निदेशक कृषि (विस्तार) हीरेंद्र शर्मा और उपनिदेशक कृषि (सामान्य) जयदीप दोगने ने क्षेत्र के कई खेतों का दौरा किया. दोनों अधिकारियों ने खड़ी फसल को करीब से देखा और यह समझने की कोशिश की कि इस सीजन में बारिश और मौसम में आए बदलाव का मूंग व मोठ की फसल पर कैसा असर पड़ा है. खेतों में पौधों की ऊंचाई, उन पर लगी फलियों की संख्या और प्रति हेक्टेयर मिलने वाली संभावित उपज जैसे कई पहलुओं पर बारीकी से नजर रखी गई. इसके साथ ही अधिकारियों ने वहां मौजूद विभागीय कर्मचारियों से इलाके में हुई बुवाई की स्थिति और किसानों को दी जा रही विभागीय मदद के बारे में भी पूछताछ की.

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फसल कटाई प्रयोगों की भी हुई पड़ताल

खेतों के इसी दौरे के दौरान अधिकारियों ने राजस्व विभाग की टीम की ओर से चलाए जा रहे फसल कटाई प्रयोगों का भी मौके पर मुआयना किया. तय मानकों के अनुसार हो रहे इस क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट को बारीकी से परखा गया, जिसमें प्रयोग के लिए खेत और भूखंड चुनने का तरीका, फसल काटने की प्रक्रिया, उपज तौलने का तरीका और आंकड़े दर्ज करने की पूरी कार्यप्रणाली शामिल थी. अधिकारियों ने साफ निर्देश दिए कि यह पूरी प्रक्रिया तय नियमों और पूरी पारदर्शिता के साथ ही पूरी की जाए, ताकि किसी भी स्तर पर गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे.

क्यों अहम हैं ये आंकड़े

अधिकारियों ने यह भी जोर दिया कि दर्ज किया जाने वाला हर आंकड़ा पूरी तरह सटीक होना चाहिए, तभी क्षेत्र में खरीफ फसलों की औसत उपज और कुल उत्पादन का सही अनुमान लगाया जा सकेगा. इन्हीं फसल कटाई प्रयोगों से मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर संबंधित इलाके की प्रति हेक्टेयर औसत उपज तय होती है. ये आंकड़े न सिर्फ कृषि उत्पादन के आकलन में काम आते हैं, बल्कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों को मिलने वाले बीमा दावों के निर्धारण में भी अहम भूमिका निभाते हैं. यही वजह है कि निरीक्षण के दौरान बीमा कंपनी के प्रतिनिधि भी वहां मौजूद रहे, ताकि दावा प्रक्रिया शुरू से ही पारदर्शी और भरोसेमंद बनी रहे.

सवाल-जवाब

यह निरीक्षण कहां हुआ?
बीकानेर जिले के श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में.
कृषि विभाग के किन अधिकारियों ने खेतों का दौरा किया?
अतिरिक्त निदेशक कृषि (विस्तार) हीरेंद्र शर्मा और उपनिदेशक कृषि (सामान्य) जयदीप दोगने ने.
अधिकारियों ने किन फसलों का निरीक्षण किया?
मूंग और मोठ की खरीफ फसलों का.
फसल कटाई प्रयोग क्यों जरूरी हैं?
क्योंकि इन्हीं से प्रति हेक्टेयर औसत उपज का पता चलता है, जो कृषि उत्पादन आकलन और बीमा दावों दोनों में इस्तेमाल होता है.
निरीक्षण के दौरान बीमा कंपनी का प्रतिनिधि क्यों मौजूद था?
क्योंकि फसल कटाई प्रयोगों के आंकड़े प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के दावे तय करने में इस्तेमाल होते हैं.
अधिकारियों ने कर्मचारियों को क्या निर्देश दिए?
फसल कटाई प्रयोग पूरी पारदर्शिता और तय प्रक्रिया के अनुसार करने के निर्देश दिए.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·50 मिनट पहले

श्रीडूंगरगढ़ जैसे संवेदनशीलता वाले कृषि क्षेत्रों में अधिकारियों द्वारा सीधे खेतों में उतरकर फसल कटाई प्रयोगों की भौतिक जांच करना और बीमा कंपनियों की मौजूदगी सुनिश्चित करना एक सराहनीय प्रशासनिक कदम है। जब क्रॉप कटिंग डेटा पूरी पारदर्शिता से दर्ज होगा, तब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के दावों का निस्तारण समयबद्ध तरीके से हो सकेगा और मुआवजे में किसी प्रकार की मनमानी या देरी की गुंजाइश खत्म होगी, जो सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·49 मिनट पहले

फसल कटाई प्रयोगों के दौरान राजस्व और कृषि अधिकारियों के साथ बीमा प्रतिनिधियों की मैदानी उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि प्राकृतिक आपदाओं या मौसम की अनिश्चितता के बाद मिलने वाले मुआवजे में कोई विसंगति न आए। जब जमीनी स्तर पर डेटा संकलन पारदर्शी होता है, तो कानूनी और प्रशासनिक विवादों की संभावना स्वतः न्यूनतम हो जाती है, जिससे किसानों के अधिकारों की रक्षा होती है और न्याय व्यवस्था में उनका विश्वास मजबूत होता है।

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