जौनपुर में आज भी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ चिकित्सा पद्धति को लेकर कई तरह के भ्रम और गलत जानकारियां फैली हुई हैं। सबसे बड़ा और आम संशय यह है कि आईवीएफ के जरिए गर्भधारण करने पर हमेशा जुड़वा या उससे ज्यादा बच्चों का जन्म होता है। इसी डर और गलतफहमी की वजह से कई संतानहीन दंपत्ति इस बेहतरीन इलाज को अपनाने से कतराते हैं। हालांकि, फर्टिलिटी विशेषज्ञों का कहना है कि यह धारणा पूरी तरह से निराधार और एक मिथक है। आज के उन्नत चिकित्सा युग में आईवीएफ का प्राथमिक लक्ष्य जुड़वा बच्चों को जन्म देना नहीं, बल्कि मां और नवजात शिशु दोनों को पूरी तरह से स्वस्थ और सुरक्षित रखना है।
पहले क्यों बढ़ जाती थी जुड़वा बच्चों के जन्म की दर?
कृष्णा आईवीएफ सेंटर की आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. मधु शारदा ने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि जब शुरुआती दौर में आईवीएफ तकनीक का विकास हुआ था, तब चिकित्सा विज्ञान आज जितना उन्नत नहीं था। उस समय गर्भधारण की सफलता दर को बढ़ाने के लिए डॉक्टर एक साथ दो या तीन भ्रूणों को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर देते थे। इस प्रक्रिया के कारण स्वाभाविक रूप से जुड़वा या तीन बच्चों के जन्म की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती थी। लेकिन समय के साथ चिकित्सा विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है और पुरानी पद्धतियों में बड़े सुधार किए गए हैं।
सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफर तकनीक से आया बड़ा बदलाव
डॉ. मधु शारदा के अनुसार, आधुनिक फर्टिलिटी क्लिनिकों में अब सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफर को ही सबसे सुरक्षित और बेहतर विकल्प माना जाता है। इस आधुनिक प्रक्रिया में सबसे पहले महिला के अंडों और पुरुष के शुक्राणुओं के मेल से बने भ्रूण को आईवीएफ लैब के नियंत्रित वातावरण में पांच से छह दिनों तक विकसित किया जाता है। जब भ्रूण पूरी तरह से स्वस्थ और मजबूत हो जाता है, तो उसमें से केवल एक सबसे अच्छी गुणवत्ता वाले भ्रूण का चयन करके उसे गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। इस वैज्ञानिक तकनीक की मदद से न केवल गर्भधारण की सफलता दर उत्कृष्ट रहती है, बल्कि एक ही स्वस्थ शिशु के सुरक्षित जन्म की संभावना भी सबसे ज्यादा होती है।
एक से अधिक बच्चों के जन्म से जुड़े गंभीर स्वास्थ्य जोखिम
चिकित्सीय दृष्टिकोण से एक साथ दो या तीन बच्चों का गर्भधारण करना हमेशा सुरक्षित नहीं माना जाता है। डॉ. मधु शारदा ने सचेत करते हुए बताया कि बहु-भ्रूण गर्भावस्था में मां और बच्चों दोनों के लिए कई तरह के स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं। ऐसी स्थितियों में समय से पहले प्रसव होना, जन्म के समय बच्चों का वजन बहुत कम होना, गर्भाशय के भीतर बच्चों का समुचित विकास रुक जाना, कुपोषण, गंभीर एनीमिया और जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशुओं में संक्रमण का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा, ऐसे बच्चों की शारीरिक और मानसिक वृद्धि की गति भी सामान्य बच्चों की तुलना में धीमी होने की आशंका रहती है।
आईवीएफ की वास्तविक सफलता का सही पैमाना क्या है?
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि किसी भी आईवीएफ उपचार की वास्तविक सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने बच्चों का जन्म हुआ है, बल्कि इसका सही पैमाना एक स्वस्थ मां द्वारा एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देना है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का मुख्य ध्येय गर्भावस्था के दौरान होने वाली हर तरह की जटिलता को न्यूनतम करना है। यही कारण है कि आज के विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा केवल एक ही भ्रूण को स्थानांतरित करने की सलाह दी जाती है ताकि गर्भावस्था का सफर पूरी तरह सुरक्षित रहे और होने वाली मां को किसी भी प्रकार की चिकित्सीय परेशानी का सामना न करना पड़े।
भ्रम और अफवाहों से बचें, विशेषज्ञ से लें सही परामर्श
डॉ. मधु शारदा ने संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों या अधूरी जानकारियों पर भरोसा करने के बजाय सीधे फर्टिलिटी विशेषज्ञों से मिलकर सही सलाह लें। आईवीएफ को लेकर मन में किसी भी प्रकार का डर या संशय रखना सही नहीं है। आज की नवीनतम तकनीकों ने आईवीएफ को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित, आसान और अत्यधिक सफल बना दिया है। यदि किसी दंपत्ति को माता-पिता बनने में कठिनाई आ रही है, तो उन्हें बिना किसी हिचकिचाहट के विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श लेना चाहिए। आईवीएफ की सच्ची सार्थकता जुड़वा बच्चों में नहीं, बल्कि एक स्वस्थ बच्चे के रूप में परिवार में खुशियां लाने में है।











