फरीदाबाद में हृदय स्वास्थ्य को लेकर अक्सर मरीजों के मन में एक गहरा असमंजस बना रहता है कि दिल की नसों में ब्लॉकेज होने पर स्टेंट लगवाना बेहतर है या बायपास सर्जरी कराना। सामान्य तौर पर लोग बिना पूरी जानकारी के किसी एक विकल्प को बेहतर मान लेते हैं, जबकि चिकित्सा जगत में इन दोनों ही प्रक्रियाओं की उपयोगिता मरीज के स्वास्थ्य प्रोफाइल पर टिकी होती है। फरीदाबाद के अमृता हॉस्पिटल में हार्ट एंड लंग सर्जरी विभाग के डिविजनल चीफ डॉ. समीर भाटी के अनुसार, यह तय करना कि कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी, पूरी तरह से ब्लॉकेज की जटिलता, नसों में रुकावट की संख्या, रोगी को हार्ट अटैक आने का इतिहास और हृदय की कार्यक्षमता (पंपिंग) जैसे महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर करता है। बिना संपूर्ण मेडिकल रिपोर्ट और डायग्नोसिस के किसी भी उपचार को सर्वश्रेष्ठ नहीं माना जा सकता।
कौन सा उपचार कब काम आता है?
डॉ. समीर भाटी स्पष्ट करते हैं कि स्टेंट और बायपास सर्जरी दोनों ही ब्लॉकेज खोलने के प्रभावी तरीके हैं, लेकिन इनके प्रयोग की स्थितियां भिन्न हैं। स्टेंट प्रक्रिया का उपयोग तब किया जाता है जब ब्लॉकेज का स्वरूप अधिक जटिल नहीं होता है। यदि मरीज की एक या दो प्रमुख नसों में ही रुकावट है, तो स्टेंट के माध्यम से उन्हें खोलना एक बेहद सटीक और प्रभावी निर्णय होता है। विशेष रूप से जब कोई मरीज अचानक जानलेवा हार्ट अटैक का सामना करता है, तो उस समय स्टेंट लगाकर बंद नस को तुरंत खोलना न केवल हृदय की मांसपेशियों को ऑक्सीजन की आपूर्ति बहाल करता है, बल्कि यह जीवन रक्षक भी साबित होता है।
बायपास सर्जरी की आवश्यकता
दूसरी ओर, बायपास सर्जरी उन मामलों में अनिवार्य हो जाती है जहाँ ब्लॉकेज का जाल फैला हुआ है या धमनियां बहुत अधिक जटिल तरीके से अवरुद्ध हैं। यदि हृदय की मांसपेशियां पहले से ही कमजोर हो चुकी हैं, तो मात्र स्टेंटिंग पर्याप्त परिणाम नहीं दे पाती। ऐसी गंभीर स्थितियों में, सर्जरी के द्वारा रक्त प्रवाह के लिए एक नया रास्ता (बायपास) तैयार किया जाता है, जिससे हृदय को पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन मिलना सुनिश्चित होता है। डॉ. भाटी के अनुसार, ऐसे जटिल मामलों में बायपास सर्जरी के परिणाम लंबी अवधि में अधिक संतोषजनक और सुरक्षित रहते हैं।
स्टेंट लगने के बाद भी सावधानी क्यों जरूरी है?
एक आम धारणा यह है कि स्टेंट लगवा लेने के बाद भविष्य में कभी हार्ट अटैक नहीं आएगा। डॉ. समीर भाटी इस मिथक को तोड़ते हुए कहते हैं कि स्टेंट केवल उस विशेष बिंदु पर जमा रुकावट को हटाता है, लेकिन यह दिल की अन्य नसों में बढ़ रही ब्लॉकेज को रोकने की गारंटी नहीं है। यदि रोगी अपनी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव नहीं लाता या दवाइयों का नियमित सेवन नहीं करता, तो अन्य नसों में ब्लॉकेज विकसित होने की आशंका बनी रहती है। इसलिए, प्रक्रिया के बाद भी स्वास्थ्य जांच, समय पर दवाइयां और स्वस्थ दिनचर्या का पालन करना अपरिहार्य है।
रिकवरी और जीवन की गुणवत्ता
दोनों ही प्रक्रियाओं में रिकवरी के अपने मानक हैं। स्टेंट लगवाने वाले मरीज आमतौर पर दो से तीन दिनों के भीतर अस्पताल से छुट्टी पा लेते हैं और एक सप्ताह के भीतर अपने दैनिक कार्यों में लौट सकते हैं। इसके विपरीत, बायपास सर्जरी एक प्रमुख ऑपरेशन है, जिसमें अस्पताल में लगभग सात दिनों का समय लगता है। सर्जरी के बाद घर लौटने पर मरीज को 10 से 15 दिनों में अपनी गतिविधियों को धीरे-धीरे सामान्य करने की सलाह दी जाती है। डॉ. भाटी के अनुभव में, यदि मरीज सर्जरी के बाद डॉक्टर के निर्देशों का कड़ाई से पालन करे, मधुमेह और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखे और अपनी जीवनशैली सुधारे, तो वह 15 से 20 साल तक पूर्णतः स्वस्थ जीवन जी सकता है। उन्होंने ऐसे मरीजों का उल्लेख किया है जिन्होंने सफलतापूर्वक बायपास सर्जरी के बाद मैराथन जैसी कठिन प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया है।
स्वस्थ जीवनशैली का महत्व
अंततः, हृदय को दीर्घायु बनाने की कुंजी जीवनशैली में छिपी है। तला-भुना और वसायुक्त भोजन हृदय पर अतिरिक्त दबाव बनाता है, इसलिए इससे बचना चाहिए। धूम्रपान पूरी तरह से वर्जित है। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, और समय-समय पर हेल्थ चेकअप दिल की बीमारियों के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से कम करने के अचूक उपाय हैं।











