कमजोर हड्डियों के सहारे जीवन बिताना किसी चुनौती से कम नहीं होता है। शारीरिक श्रम करने में परेशानी आना और हड्डियों का लगातार कमजोर होना इस बात का संकेत है कि शरीर किसी गंभीर समस्या की चपेट में आ रहा है। ऑस्टियोपोरोसिस हड्डियों से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है, जिसमें वे क्षणभंगुर और बेहद कमजोर हो जाती हैं। पहले यह समस्या आमतौर पर बुजुर्गों में ही देखने को मिलती थी, लेकिन आजकल 40 से 50 वर्ष की उम्र के लोग भी इसका शिकार होने लगे हैं। इस स्थिति में हड्डियां आसानी से चटकने लगती हैं, जिससे उठने-बैठने, खड़े होने और चलने-फिरने में भी भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। समय रहते इसकी पहचान करना और इससे बचाव के तरीकों को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है ताकि स्थिति को गंभीर होने से रोका जा सके।
हड्डियों के टूटने और बनने की प्रक्रिया में असंतुलन
शरीर के भीतर हड्डियों की संरचना लगातार एक चक्र से गुजरती रहती है, जिसमें पुरानी और टूटी-फूटी कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएं लेती हैं। जब पुरानी हड्डियों के नष्ट होने की रफ्तार नई हड्डियों के निर्माण से तेज हो जाती है, तब ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी जन्म लेती है। आमतौर पर पुरुषों में 60 वर्ष की आयु के बाद और महिलाओं में मेनोपॉज के बाद यह समस्या अधिक देखने को मिलती है। इस बीमारी की वजह से हड्डियां इतनी ज्यादा कमजोर हो जाती हैं कि मामूली सा झटका लगने, झुकने, खांसने या हल्का सा गिरने पर भी फ्रैक्चर हो सकता है। ऑस्टियोपोरोसिस की वजह से होने वाले फ्रैक्चर सबसे ज्यादा रीढ़ की हड्डी, कलाई या फिर कूल्हे के हिस्से में होते हैं, जो व्यक्ति की गतिशीलता को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
शुरुआती चरण में छुपे रहते हैं खतरे के संकेत
ऑस्टियोपोरोसिस के शुरुआती चरणों में हड्डियों के कमजोर होने का आभास कराने वाले स्पष्ट लक्षण आमतौर पर नजर नहीं आते हैं। हालांकि, जैसे-जैसे यह बीमारी शरीर में बढ़ती जाती है, हड्डियों का घनत्व तेजी से कम होने लगता है और इसके लक्षण सामने आने लगते हैं। रीढ़ की हड्डी में अचानक से दबाव पड़ने या उसके टूटने के कारण पीठ में तेज दर्द रहने लगता है। समय बीतने के साथ व्यक्ति की लंबाई में भी कमी आने लगती है और लोग झुककर चलने पर मजबूर हो जाते हैं। मामूली सी चोट या गिरने पर हड्डियों का बहुत आसानी से टूट जाना भी इसी बीमारी का एक प्रमुख लक्षण है, जो जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
मानव शरीर में हड्डियों की कोशिकाएं निरंतर बनती और मिटती रहती हैं। युवावस्था के दौरान नई हड्डियों का निर्माण बहुत तेजी से होता है, लेकिन करीब 30 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते यह पीक बोन मास पर पहुंच जाता है। इसके बाद जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, पुरानी हड्डियों के नष्ट होने की प्रक्रिया नई हड्डियों के बनने की तुलना में तेज हो जाती है। ऐसी स्थिति में ऑस्टियोपोरोसिस होने का खतरा इस बात पर बहुत हद तक निर्भर करता है कि युवावस्था के दौरान कितना पीक बोन मास हासिल किया गया था। यह घनत्व जितना अधिक होगा, ढलती उम्र में ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम उतना ही कम होगा। यानी 30 वर्ष की आयु से पहले हड्डियों का घनत्व मजबूत होना आवश्यक है, अन्यथा बाद में खतरा बढ़ सकता है। यही कारण है कि बचपन और जवानी के दिनों में हड्डियों की सेहत पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है।
किन लोगों को रहता है ऑस्टियोपोरोसिस का सबसे ज्यादा खतरा
पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ऑस्टियोपोरोसिस होने की आशंका काफी अधिक होती है। इसके अलावा कुछ मामलों में इसके लिए आनुवंशिक कारक यानी जीन भी जिम्मेदार होते हैं, जिन्हें बदला नहीं जा सकता है। हालांकि, ज्यादातर मामलों में इस बीमारी के लिए हमारी अपनी जीवनशैली जिम्मेदार होती है। शरीर में हॉर्मोन का असंतुलन जिन लोगों में ज्यादा होता है, उन्हें इसका खतरा सबसे अधिक रहता है। खानपान में कैल्शियम की भारी कमी होना, ईटिंग डिसऑर्डर, वजन बहुत कम होना और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी जैसी समस्याओं से जूझने वाले लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। प्रेडनिसोन जैसी कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवाओं का सेवन करने वाले और मिर्गी, कैंसर या अर्थराइटिस जैसी मेडिकल समस्याओं से लंबे समय तक पीड़ित रहने वाले लोगों में भी यह जोखिम बना रहता है। हमारी खराब आदतें जैसे सुस्त जीवनशैली, किसी भी तरह की एक्सरसाइज न करना, शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहना, अत्यधिक मात्रा में शराब पीना और तंबाकू का सेवन करना भी हड्डियों को कमजोर बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
ऑस्टियोपोरोसिस से बचने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए
ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर समस्या से सुरक्षित रहने के लिए सबसे पहले अपने खानपान में संतुलन बनाना जरूरी है, खासकर 30 वर्ष की उम्र तक इसे विशेष महत्व देना चाहिए। इसके बाद नियमित रूप से व्यायाम करने और एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की आवश्यकता होती है। अपनी उम्र के मुताबिक पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम का सेवन करें, जिसमें हरी पत्तेदार सब्जियां और सोया उत्पाद शामिल होने चाहिए। शरीर को पर्याप्त विटामिन डी मिले इसके लिए कम से कम 15 मिनट धूप में जरूर बैठें। इसके अलावा कॉड लिवर ऑयल, फोर्टिफाइड अनाज या फिर डॉक्टर की सलाह के बाद सप्लीमेंट्स का सेवन किया जा सकता है। मांसपेशियों और हड्डियों को मजबूती प्रदान करने के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, वॉकिंग, रनिंग जैसे वजन उठाने वाले व्यायाम और संतुलन सुधारने वाले ताई ची जैसे अभ्यास नियमित तौर पर करने चाहिए। सिगरेट, शराब और किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन करने से पूरी तरह बचना चाहिए ताकि हड्डियों की सेहत बरकरार रह सके।
















