उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के ग्रामीण अंचलों में आज भी दूध की मलाई और मक्खन का उपयोग करके पारंपरिक विधि से शुद्ध देसी घी तैयार करने की परंपरा जीवित है। आज के दौर में जब लोग अपनी सेहत और खान-पान को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुके हैं, तब बाजार में मिलने वाले पैकेटबंद उत्पादों के साथ-साथ घर के बने शुद्ध घी की मांग भी लगातार बनी हुई है। ग्रामीण इलाकों के कई परिवार आज भी दूध और दही के जरिए अपने घरों में ही খাঁटी घी बनाते हैं, जिसके लिए पूरी तरह से पारंपरिक तौर-तरीकों का सहारा लिया जाता है।
घर पर देसी घी तैयार करने की यह पूरी प्रक्रिया ताजे दूध से शुरू होती है। सबसे पहले ताजे दूध को अच्छी तरह उबालकर ठंडा किया जाता है, जिसके बाद उसके ऊपर जमने वाली मलाई को एक अलग बर्तन में लगातार इकट्ठा किया जाता है। कई दिनों तक इस मलाई को जमा करने के बाद इसमें थोड़ा सा दही मिलाकर इसे खट्टा किया जाता है। इसके पश्चात इस मिश्रण को मथनी की सहायता से जोर-जोर से मथा जाता है, जिससे मलाई से मक्खन और छाछ दोनों अलग-अलग हो जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मक्खन निकालने के लिए विशेष रूप से लकड़ी की मथनी का ही उपयोग किया जाता है। मलाई को तब तक अच्छी तरह मथा जाता है जब तक कि उससे मक्खन के छोटे-छोटे गोले अपने आप बाहर न आने लगें। इन मक्खन के गोलों को छाछ से पूरी तरह अलग करके साफ पानी से अच्छी तरह धोया जाता है ताकि उसकी खटास निकल जाए। इसके बाद इस मक्खन को एक मोटे तले वाले बर्तन में ट्रांसफर किया जाता है और धीमी आंच पर गर्म करने के लिए रख दिया जाता है।
धीमी आंच पर पकने के दौरान मक्खन के अंदर मौजूद सारा अतिरिक्त पानी भाप बनकर धीरे-धीरे उड़ने लगता है और इसके परिणामस्वरूप शुद्ध घी बनकर तैयार होने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। कुछ समय तक उबालने के बाद घी के ऊपरी सतह पर उठने वाला झाग कम होने लगता है और बर्तन के निचले हिस्से में दूध के ठोस कण धीरे-धीरे बैठने लगते हैं। जब घी का सारा पानी पूरी तरह सूख जाता है और उसमें से एक सोंधी तथा शानदार खुशबू आने लगती है, तो बर्तन को तुरंत आंच से नीचे उतार लिया जाता है।
इसके बाद इस तैयार घी को कुछ देर के लिए ठंडा होने दिया जाता है और फिर इसे छानकर एक साफ कांच या अन्य बर्तन में सुरक्षित रख लिया जाता है। पारंपरिक विधि से बनाए गए इस देसी घी की असली पहचान उसकी बेहतरीन खुशबू, उसके प्राकृतिक रंग और उसकी दानेदार बनावट से की जाती है। जैसे-जैसे यह ठंडा होता है, यह पूरी तरह से जमने लगता है। हालांकि, घी का अंतिम रंग और उसकी बनावट इस बात पर भी निर्भर करती है कि दूध की गुणवत्ता कैसी थी, पशुओं को क्या आहार दिया गया था और उसे पकाने का तरीका क्या अपनाया गया था। उदाहरण के लिए, गाय के दूध से निकाले गए घी का रंग अलग-अलग परिस्थितियों में हल्का या गहरा पीला हो सकता है।
लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाके की रहने वाली मुस्कान बताती हैं कि उनके घर पर आज भी देसी घी तैयार करने के लिए प्राचीन लकड़ी की मथनी का ही इस्तेमाल किया जाता है। इस विधि के तहत कई दिनों तक लगातार दूध से निकलने वाली मलाई को इकट्ठा करके फ्रिज के अंदर सुरक्षित रखा जाता है ताकि वह खराब न हो सके। जब पर्याप्त मात्रा में मलाई जमा हो जाती है, तब उसे पारंपरिक मथनी से मथा जाता है, जिससे मक्खन और छाछ एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। इसके बाद इस निकाले गए मक्खन को गैस पर गर्म करके शुद्ध घी तैयार किया जाता है। मुस्कान के अनुसार, मक्खन को धीमी आंच पर पिघलाकर घी बनाने की इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 20 से 30 मिनट का समय लगता है, जिसके बाद शुद्ध घी बनकर तैयार हो जाता है। उनका कहना है कि इस तरह घर पर पारंपरिक माध्यमों से बनाए जाने वाले घी में किसी भी प्रकार की मिलावट की कोई गुंजाइश नहीं रहती है।


















