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नेत्रदान से चेहरे की बनावट पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर रश्मि मित्तल ने दूर किए पांच बड़े भ्रमस्वास्थ्य
6 सित॰ 2026, 7:41 am (25 मिनट पहले)· 2

नेत्रदान से चेहरे की बनावट पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर रश्मि मित्तल ने दूर किए पांच बड़े भ्रम

मृत्यु के बाद नेत्रदान को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं। फरीदाबाद की नेत्र विशेषज्ञ डॉ. रश्मि मित्तल ने स्पष्ट किया है कि इससे चेहरे पर कोई निशान नहीं पड़ता और उम्र या चश्मे की वजह से भी दान रोका नहीं जाता।

फरीदाबाद में नेत्रदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों ने अहम जानकारियां साझा की हैं। किसी अपने की मौत के बाद आंखें दान करने से दूसरे जरूरतमंद व्यक्ति के जीवन में उजाला आ सकता है, लेकिन समाज के भीतर आज भी इसे लेकर कई तरह की गलतफहमियां बनी हुई हैं। कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या आंखें निकालने से मृतक के चेहरे का स्वरूप बिगड़ जाता है। इसके अलावा अधिक उम्र या नजर का चश्मा होना भी कई लोग इस नेक काम में बाधा मान बैठते हैं। कुछ लोगों को यह भी लगता है कि नेत्रदान करने से हर प्रकार के अंधेपन का पूरी तरह से इलाज संभव हो जाता है। इन तमाम पहलुओं पर फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. रश्मि मित्तल ने विस्तार से प्रकाश डाला और सच्चाई सामने रखी।

चेहरे के सौंदर्य पर नहीं पड़ता कोई प्रतिकूल प्रभाव

अक्सर लोगों के मन में यह आशंका घर कर जाती है कि नेत्रदान करने से अंतिम संस्कार के वक्त मृतक का चेहरा बदला हुआ या खराब दिखाई देगा। इस बारे में डॉ. रश्मि मित्तल ने बताया कि नेत्रदान के बाद मृतक के चेहरे पर किसी भी प्रकार का नकारात्मक बदलाव नहीं आता है। प्रक्रिया के दौरान पूरी आंख कभी नहीं निकाली जाती है, बल्कि केवल जरूरत के मुताबिक कॉर्निया यानी आंख के सामने का पारदर्शी हिस्सा ही लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद चेहरे पर कोई ऐसा निशान या बदलाव नहीं बचता जिससे परिवार के सदस्यों को अंतिम दर्शन के समय किसी प्रकार की असहजता या परेशानी का सामना करना पड़े।

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चश्मा पहनने वाले लोग भी आसानी से दे सकते हैं आंखें

एक और आम भ्रम यह है कि जिन लोगों की नजर कमजोर है या जो लोग चश्मा लगाते हैं, वे नेत्रदान नहीं कर सकते हैं। विशेषज्ञ ने इस बात को पूरी तरह खारिज करते हुए बताया कि चश्मे का नंबर होना इस प्रक्रिया में किसी भी तरह की रुकावट नहीं बनता है। यदि किसी व्यक्ति की नजर बहुत अधिक कमजोर है और वह भारी नंबर का चश्मा पहनता है, तब भी वह अपनी आंखें दान करने के योग्य रहता है। इसके अलावा यदि किसी को पहले मोतियाबिंद की शिकायत रही हो या आंखों की कोई अन्य सर्जरी हुई हो, तब भी नेत्रदान आसानी से किया जा सकता है। डायबिटीज और उच्च रक्तचाप जैसी सामान्य बीमारियां भी अपने आप में नेत्रदान को रोकने का कारण नहीं बनती हैं। डॉक्टर का कहना है कि कॉर्निया की वास्तविक स्थिति देखकर ही विशेषज्ञ यह निर्णय लेते हैं कि उसका प्रत्यारोपण किया जा सकता है या नहीं।

उम्र का बंधन नहीं और बुजुर्ग भी कर सकते हैं दान

बुजुर्गों के बीच अक्सर यह गलत धारणा फैली रहती है कि अधिक उम्र हो जाने की वजह से उनकी आंखें किसी भी काम की नहीं बची हैं। डॉ. रश्मि मित्तल ने इस सोच को गलत करार देते हुए स्पष्ट किया कि बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक कोई भी व्यक्ति इस प्रक्रिया में हिस्सा ले सकता है। एक या दो साल के छोटे बच्चे से लेकर अस्सी या सौ साल की उम्र तक के इंसानों के नेत्रदान पर पूरी तरह विचार किया जा सकता है। इसलिए आयु सीमा को लेकर मन में किसी प्रकार की हिचकिचाहट या संकोच रखने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

मृत्यु के बाद छह घंटे का समय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण

नेत्रदान के मामले में समय का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। इस बारे में जानकारी देते हुए डॉ. रश्मि मित्तल बताती हैं कि हमेशा यह प्रयास रहना चाहिए कि प्राण त्यागने के छह घंटे के भीतर ही नेत्रदान की पूरी प्रक्रिया संपन्न कर ली जाए। इस समयावधि के दौरान मृतक की पलकें बंद रखी जानी चाहिए। जिस कमरे में पार्थिव शरीर को रखा गया हो, वहां चल रहा पंखा सीधे चेहरे की तरफ नहीं होना चाहिए, हालांकि कमरे में एसी चलाया जा सकता है। यदि संभव हो सके तो पलकों के पास साफ और गीली रुई रख देनी चाहिए ताकि आंखों के ऊतक सूखने से बचे रहें। हालांकि डॉक्टर यह भी मानती हैं कि छह घंटे का समय सबसे उत्तम होता है, लेकिन सात से आठ घंटे बीत जाने पर भी हर परिस्थिति में ऊतक को तुरंत बेकार नहीं मान लिया जाता है।

क्या हर तरह के अंधेपन में वापस आ सकती है रोशनी

समाज में यह भी एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि नेत्रदान करने से दुनिया के हर अंधे व्यक्ति की आंखों की रोशनी वापस लौटाई जा सकती है। डॉ. रश्मि मित्तल के अनुसार यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज की नजर जाने की असली वजह क्या थी। वर्तमान चिकित्सा व्यवस्था में पूरी आंख का ट्रांसप्लांट संभव नहीं है, बल्कि केवल खराब कॉर्निया को दान में मिले स्वस्थ कॉर्निया से बदला जाता है। यदि किसी व्यक्ति की दृष्टि केवल कॉर्निया से जुड़ी किसी बीमारी की वजह से गई है, तो कॉर्निया प्रत्यारोपण के बाद उसकी देखने की क्षमता में भारी सुधार हो सकता है। परंतु यह हर प्रकार के अंधेपन में कारगर साबित हो, ऐसा बिल्कुल भी जरूरी नहीं है।

नेत्रदान को लेकर चलाए जाते हैं विशेष जागरूकता अभियान

आम जनता को नेत्रदान के प्रति प्रेरित करने और जागरूक बनाने के उद्देश्य से हर साल 25 अगस्त से 8 सितंबर के बीच आई डोनेशन फोर्टनाइट मनाया जाता है। इस अभियान का मुख्य मकसद लोगों को यह समझाना है कि नेत्रदान कौन कर सकता है, मृत्यु के बाद इसकी चिकित्सीय प्रक्रिया कैसे पूरी होती है और दान किए गए कॉर्निया का उपयोग जरूरतमंद मरीजों के जीवन को संवारने में किस प्रकार किया जाता है। डॉक्टर ने सभी लोगों से अपील की है कि परिवार में किसी की मृत्यु होने पर शोक के बीच भी नेत्रदान का साहसिक फैसला लें। एक छोटे से प्रयास से किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में दोबारा रोशनी लौट सकती है।

सवाल-जवाब

नेत्रदान के बाद क्या मृतक का चेहरा खराब हो जाता है?
नहीं, नेत्रदान के बाद मृतक के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आता क्योंकि केवल कॉर्निया लिया जाता है।
क्या चश्मा पहनने वाले लोग अपनी आंखें दान कर सकते हैं?
हां, चश्मे का नंबर होना नेत्रदान में कोई बाधा नहीं बनता है।
नेत्रदान के लिए मृत्यु के बाद कितना समय सबसे अच्छा माना जाता है?
मृत्यु के छह घंटे के भीतर नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी करना सबसे बेहतर माना जाता है।
क्या अधिक उम्र के बुजुर्ग भी नेत्रदान कर सकते हैं?
हां, बच्चे से लेकर 80 या 100 वर्ष की आयु तक के बुजुर्ग भी नेत्रदान कर सकते हैं।
क्या नेत्रदान से हर तरह के अंधेपन का इलाज हो सकता है?
नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि दृष्टि जाने का कारण कॉर्निया से जुड़ा हुआ है या नहीं।
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