ऑपरेशन हैट के तहत भारत और अमेरिका ने चीन पर नजर रखने के लिए एक परमाणु ऊर्जा से चलने वाला जासूसी उपकरण तैयार किया था। इस योजना के अगले चरण में 1 मई 1966 को दिल्ली से एक बस जरूरी साजो-सामान के साथ रवाना हुई। ऋषिकेश पहुंचने के बाद पहाड़ी रास्ते शुरू हुए और फिर सैन्य ट्रक के जरिए पूरा काफिला आगे बढ़ा। 3 मई तक यह दल जोशीमठ पहुंचा और फिर वहां से नंदा देवी बेस कैंप की ओर चल पड़ा।
दुर्गम चढ़ाई और चीन का परमाणु परीक्षण
बेस कैंप से आगे की चढ़ाई बेहद कठिन थी जहां तेज बर्फीली हवाओं और ठंड के कारण दल के सदस्यों की सांसें फूलने लगी थीं। इसी दौरान 14 मई को चीन ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण कर दिया जिससे खुफिया तंत्र में हड़कंप मच गया। 15 मई को बेस कैंप पहुंचे अधिकारियों ने बैठकें कीं और तय किया कि केवल भारतीय पर्वतारोही ही कैंप 4 तक जाएंगे जहां पिछले साल यंत्र छिपाया गया था।
गायब मिला जासूसी उपकरण
1 जून को जब दल कैंप 4 पर पहुंचा तो वहां भारी बर्फबारी के बीच केवल एक टूटा हुआ तंबू और बिखरा हुआ सामान मिला। आठ महीने पहले जहां यंत्र छिपाया गया था वह चट्टान गायब थी और केवल तारों के कुछ टुकड़े हाथ लगे। इस खुलासे के बाद दिल्ली और अमेरिकी दूतावास में हड़कंप मच गया। आर.एन. काव और बी.एन. मुल्लिक जैसे खुफिया अधिकारियों ने तुरंत आपात बैठक बुलाई और अमेरिकी वैज्ञानिक भी मौके पर पहुंचे।
अमेरिकी वैज्ञानिकों की आशंका और संदेह
मौके पर पहुंचे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने रेडियोएक्टिविटी की जांच की और चेतावनी दी कि अगर रिसाव होता तो गंगा का पानी प्रदूषित हो सकता था। हालांकि जांच में रीडिंग सामान्य पाई गई लेकिन इस घटना ने दोनों देशों के बीच आपसी शक को जन्म दे दिया। सीआईए के अधिकारियों को लगा कि भारत ने परमाणु कार्यक्रम के लिए इस यंत्र को गायब किया होगा।
नंदा देवी कोट पर नया संयंत्र स्थापना
हालात की नजाकत को देखते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और खुफिया अधिकारियों ने मामले को गुप्त रखा। इसके बाद कैप्टन कोहली के नेतृत्व में एक नई टीम बनाई गई और 24 अप्रैल 1967 को नंदा देवी कोट पर नया निगरानी उपकरण स्थापित कर दिया गया। इस यंत्र ने चीन की बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधियों और तिब्बत में सैनिकों की तैनाती की अहम जानकारियां जुटाईं।
उपकरण का खराब होना और दस्तावेजों का सामने आना
साल 1968 की सर्दियों में यह उपकरण भी खराब हो गया जिसके बाद गर्मियों में एक टीम ने वहां पहुंचकर क्षतिग्रस्त जनरेटर को बाहर निकाला। इस जनरेटर को ओडिशा के चारबाटिया एयरपोर्ट पर गुप्त रूप से लाया गया। सालों तक यह मामला दबा रहा लेकिन 12 अप्रैल 1978 को आउटसाइड नामक अमेरिकी पत्रिका में रिपोर्ट छपने के बाद देश में भूचाल आ गया।
राजनीतिक सरगर्मी और संसद में बयान
उस समय मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस विपक्ष में थी। संसद में बढ़ते दबाव के बीच मोरारजी देसाई ने विशेषज्ञों की समिति बनाने की बात कही और अमेरिकी भूमिका पर सीधा बयान देने से बचे। इसके बाद 8 मई 1978 को अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने मोरारजी देसाई को पत्र लिखकर मामले को संभालने के तरीके की सराहना की। आज भी इस इलाके के लोग और पर्यावरणविद् गंगा के पानी पर मंडराते खतरे को लेकर चिंता जताते हैं।


















