छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं की देखभाल के दौरान माता-पिता को बेहद सतर्क रहने की जरूरत होती है। जरा सी भी लापरवाही बच्चे की सेहत पर भारी पड़ सकती है। खासकर, शिशु को दूध पिलाते वक्त सही तौर-तरीकों का पालन करना अनिवार्य है। यदि बच्चे को गलत मुद्रा में या जबरन दूध पिलाया जाए, तो वह सांस की नली में जा सकता है, जिससे उसकी हालत काफी बिगड़ सकती है। इस विषय पर बहराइच के एक वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ ने दूध पिलाने की सही विधि और बरती जाने वाली सावधानियों पर विस्तार से रोशनी डाली है।
जबरदस्ती दूध पिलाना और लेटाकर खिलाना है खतरनाक
बहराइच के महेश चिल्ड्रंस पॉलीक्लिनिक के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शशिर अग्रवाल ने जानकारी दी है कि कई बार माता-पिता शिशु के रोने पर या वह नींद में होने के बावजूद उसे जबरन दूध पिलाने की जिद करते हैं। ऐसा करना बच्चे के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसी स्थिति में दूध भोजन की नली में जाने के बजाय सांस की नली में प्रवेश कर सीधे फेफड़ों तक पहुंच जाता है। इसके कारण बच्चे को सांस लेने में भारी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है और स्थिति गंभीर हो सकती है।
दूध पिलाने की सही मुद्रा और तरीका
चिकित्सक के अनुसार, अगर बच्चा रो रहा है, तो उसे सबसे पहले शांत कराना चाहिए। कभी भी रोते हुए शिशु को जबरदस्ती दूध नहीं पिलाया जाना चाहिए। इसके अलावा, बच्चे को पूरी तरह से फ्लैट लेटाकर या सोते हुए अवस्था में दूध पिलाने से बचना चाहिए। दूधपान कराते समय शिशु के सिर और शरीर को उचित सहारा मिलना बहुत जरूरी है। हमेशा बच्चे को अपनी गोद में लेकर उसका सिर थोड़ा ऊंचा रखते हुए दूध पिलाएं, ताकि दूध के सांस की नली में जाने की आशंका न्यूनतम हो सके।
डकार दिलाना और तुरंत न लेटाना
डॉ. शशिर अग्रवाल ने यह भी सलाह दी है कि शिशु को दूध पिलाने के बाद कुछ देर तक गोद में सीधा करके रखना चाहिए। जरूरत पड़ने पर उसकी पीठ को बेहद हल्के हाथों से सहलाकर डकार दिलाने में सहायता करनी चाहिए। विशेष तौर पर 6 से 7 महीने तक की उम्र के बच्चों को दूध पिलाने के तुरंत बाद लिटाने से परहेज करना चाहिए। कई बार दूध मुंह से बाहर आने पर अभिभावक घबरा जाते हैं, इसलिए दूध पिलाने के बाद बच्चे को करीने से संभालना आवश्यक है।
घरेलू नुस्खों और झोलाछाप से दूरी
शिशु की तबीयत में किसी भी तरह की गिरावट आने पर माता-पिता को खुद से इलाज करने या किसी अप्रशिक्षित झोलाछाप डॉक्टर के चक्कर में पड़ने से बचना चाहिए। स्वास्थ्य संबंधी कोई भी समस्या दिखने पर अपने नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) या किसी योग्य और प्रशिक्षित चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। यदि वहां उचित उपचार न मिल पाए, तो बिना किसी विलंब के बड़े अस्पताल का रुख करना चाहिए। ऐसी आपात स्थिति में घबराकर दूर-दराज जाने के बजाय सबसे पास के योग्य डॉक्टर से तुरंत सहायता लेना बुद्धिमानी है।
सतर्कता ही बचाव है
कुल मिलाकर, शिशु को दूध पिलाते वक्त उसकी शारीरिक स्थिति, उसके रोने और सांस लेने की प्रक्रिया पर पूरी नजर रखनी चाहिए। किसी भी प्रकार की असुविधा नजर आने पर घरेलू उपायों के फेर में अपना कीमती वक्त गंवाने के बजाय तुरंत किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।


















