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वाराणसी के हुनर से गाजीपुर में गुलजार है हींग कचौड़ी का जायका, जानिए इसकी खासियतखानपान
21 अक्तू॰ 2026, 3:17 pm (2 घंटे पहले)· 4

वाराणसी के हुनर से गाजीपुर में गुलजार है हींग कचौड़ी का जायका, जानिए इसकी खासियत

गाजीपुर के बाजार में बिकने वाली हींग की कचौड़ी अपने खास मसालों और बिना लहसुन-प्याज के सात्विक स्वाद के लिए लोगों को खूब भा रही है। कारीगरों ने इसकी रेसिपी वाराणसी से सीखी है।

गाजीपुर के बाजारों में हींग की कचौड़ी का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। इस कचौड़ी की खासियत इसका बाहरी हिस्सा खस्ता और अंदर का मसाला तीखा व खुशबूदार होना है। इसे बनाने में हींग के अलावा अदरक, मिर्च और पारंपरिक मसालों का भरपूर उपयोग किया जाता है। स्थानीय स्तर पर इस व्यंजन को लेकर लोगों में काफी क्रेज देखा जा रहा है।

काशी के उस्ताद से सीखी कला

कारीगर संदीप के अनुसार, उन्होंने यह खास कचौड़ी बनाना वाराणसी में बेनिया मस्जिद के पास रहने वाले राजेश गुप्ता से सीखा था। कारीगरी में माहिर होने के बाद उन्होंने गाजीपुर के महाजन टोली इलाके में आकर अपनी दुकान शुरू की और आज यहीं के लोगों को यह जायका परोस रहे हैं। इस कला को सीखने में उन्होंने पारंपरिक तौर-तरीकों और बारीकियों को बारीकी से समझा है।

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तैयारी का समय और खपत

दुकान पर रोजाना लगभग पांच से दस किलो आटे की कचौड़ियां तैयार की जाती हैं। इन्हें बनाने का काम दिन में दो बार होता है। पहली खेप सुबह लगभग सात से साढ़े सात बजे के बीच बनती है, जबकि दूसरी खेप दोपहर एक बजे से शाम पांच बजे तक तैयार की जाती है। कारीगर दीपक बताते हैं कि कचौड़ी के आटे और मसाले के संतुलन को बनाए रखने के लिए समय का खास ध्यान रखा जाता है।

सामग्री और सात्विक विधि

हींग की कचौड़ी की रेसिपी जगहों के हिसाब से बदल सकती है, लेकिन इस विशेष दुकान की अपनी पहचान है। इसकी बाहरी परत मैदा या गेहूं के आटे से बनती है, जबकि अंदर उड़द या अन्य दाल के साथ हींग, अदरक, मिर्च, सौंफ, जीरा, धनिया और गरम मसाला भरा जाता है। कुछ जगहों पर बेसन का इस्तेमाल भी किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लहसुन और प्याज का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जाता है, जिससे यह पूरी तरह सात्विक रहती है।

ग्राहकों की प्रतिक्रिया और कीमत

स्थानीय निवासी अवनीश का कहना है कि इस कचौड़ी का स्वाद बेहतरीन है और इसमें हींग की सोंधी खुशबू अलग से महसूस होती है। बिना लहसुन और प्याज के भी मसालों का यह मेल बहुत पसंद आ रहा है। कारीगर दीपक का मानना है कि सात्विक भोजन पसंद करने वालों के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है। कीमत की बात करें तो यहां 60 रुपये में चार कचौड़ियां मिलती हैं, जो ग्राहकों के बजट में भी फिट बैठती हैं।

सवाल-जवाब

गाजीपुर में हींग की कचौड़ी कहाँ मिलती है?
गाजीपुर के महाजन टोली इलाके में यह कचौड़ी मिलती है।
इस कचौड़ी को बनाने की कला कहाँ से सीखी गई थी?
कारीगर संदीप ने इसे वाराणसी में बेनिया मस्जिद के पास रहने वाले राजेश गुप्ता से सीखा था।
कचौड़ी बनाने का समय क्या रहता है?
दिन में दो बार, सुबह सात से साढ़े सात बजे के बीच और दोपहर एक से शाम पाँच बजे तक कचौड़ियाँ बनाई जाती हैं।
क्या इस कचौड़ी में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल होता है?
नहीं, इस कचौड़ी को बनाने में लहसुन और प्याज का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
हींग की कचौड़ी की कीमत क्या है?
यहाँ 60 रुपये में चार कचौड़ियाँ मिलती हैं।
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टिप्पणियाँ 4

Tanvi Desai@tanvi-desai·34 मिनट पहले

बिना लहसुन-प्याज के ऐसी हींग वाली खस्ता कचौड़ी मिल जाए, तो सुबह का नाश्ता एकदम सेट है।

Rohan Verma@rohan-verma·33 मिनट पहले

तनवी जी, एकदम सही कहा आपने! वैसे क्या कोई और भी दुकान है गाजीपुर में जो ऐसी सात्विक हींग कचौड़ी बनाती है?

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·57 मिनट पहले

बिना प्याज-लहसुन के भी हींग का ऐसा स्वाद, सच में मुंह में पानी ले आया।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·57 मिनट पहले

कार्लोस, बात तो सही है, बिना लहसुन-प्याज के ऐसी हींग वाली कचौड़ी खाने का मज़ा ही अलग है। वैसे क्या आपने कभी खुद घर पर ऐसी खस्ता कचौड़ी बनाने की कोशिश की है?

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