मानसून की सक्रियता के साथ ही मुंबई से लेकर दिल्ली तक बारिश का दौर जारी है और इस मौसम में सांपों का निकलना एक आम समस्या बन जाता है। सांप के काटने की घटनाएं अक्सर बारिश के दौरान ही ज्यादा दर्ज की जाती हैं। हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने सांप के काटने से होने वाली मौतों को लेकर एक महत्वपूर्ण सर्वे पूरा किया है, जिससे इस विषय पर बनी पुरानी धारणाएं बदल गई हैं। अध्ययन में यह पाया गया कि सांप के डसने से होने वाली वास्तविक मौतें अब तक के अनुमानों की तुलना में काफी कम हैं। इस सर्वे के लिए 11 अलग-अलग राज्यों को चुना गया था।
सर्वे के चौंकाने वाले निष्कर्ष
इस शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि सांप के काटने के मामलों में 43 फीसदी मौतें अस्पताल पहुंचने से पहले ही या इलाज के रास्ते में हो जाती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा देखा गया है। सर्वे के अनुसार, मरने वालों में 53 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों से थे, जो यह साबित करता है कि सांप का दंश मुख्य रूप से गरीब आबादी को अपना निशाना बनाता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो हर एक लाख लोगों पर करीब 0.3 मौतें सांप के काटने से होती हैं। यह आंकड़ा पिछले अनुमानों से कहीं कम है, क्योंकि पूर्व में भारत के रजिस्ट्रार जनरल की 1998 से 2014 के बीच हुई वन मिलियन डेथ स्टडी के आधार पर यह संख्या हर एक लाख पर 6 मौतें बताई गई थी।
वैज्ञानिक पद्धति और अध्ययन का दायरा
यह विस्तृत रिपोर्ट नेचर कम्युनिकेशंस नामक वैज्ञानिक जर्नल में छपी है। इस शोध के लिए 11 राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में एक साल तक लगातार डेटा जुटाया गया। इस प्रक्रिया में आशा वर्कर्स ने सांप के काटने के मामलों की पहचान करने में मदद की और उन परिवारों से सहमति लेकर जानकारी ली गई जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया था। हालांकि, मेघालय और पश्चिम बंगाल में अभी भी सर्वे का काम चल रहा है। अध्ययन के लेखकों का तर्क है कि पुराने अनुमानों ने मौतों की संख्या को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था। उदाहरण के तौर पर, 2024-25 के दौरान केरल में, जिसकी आबादी करीब 3.5 करोड़ है, सांप के काटने से केवल 31 मौतें आधिकारिक रूप से दर्ज की गईं, जबकि पुराने अनुमानों के अनुसार यह संख्या 2100 तक होनी चाहिए थी।
देशव्यापी स्थिति और भौगोलिक चुनौतियां
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन 11 राज्यों के नतीजों को यदि पूरे भारत पर लागू किया जाए, तो सालाना सांप काटने के लगभग 120852 मामले सामने आते हैं। हालांकि, विशेषज्ञ इस बात को स्वीकार करते हैं कि यह आंकड़ा कम हो सकता है, क्योंकि देश के 28 राज्यों में से केवल 13 ही इस स्टडी का हिस्सा बन पाए हैं। सबसे घनी आबादी वाले उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्य इस अध्ययन में शामिल नहीं थे। यह एक महत्वपूर्ण कमी है क्योंकि सामान्यतः सांप के काटने से सबसे अधिक मौतें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे क्षेत्रों में देखी जाती रही हैं।
खेती और सांपों का बढ़ता जोखिम
दुनियाभर में सांप के जहर का शिकार होने वाले लोगों में सबसे ज्यादा संख्या भारत की है, और वैश्विक स्तर पर होने वाली कुल मौतों में से करीब आधी भारत में ही होती हैं। इसका मुख्य कारण भारत की विशाल कृषि आधारित आबादी है, जहां इंसानों और सांपों का निवास क्षेत्र आपस में मिलता है, जिससे उनका आमना-सामना अधिक होता है। भारत में जहरीले सांपों की चार प्रमुख प्रजातियां, जिन्हें 'बिग फोर' कहा जाता है, जहर फैलने के अधिकतर मामलों के लिए उत्तरदाई मानी जाती हैं। अध्ययन के दौरान 25 जिलों में कुल 7094 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 2.7 प्रतिशत लोगों की मौत हो गई। इन मौतों में 57 फीसदी लोग ऐसे थे जिनकी जान अस्पताल में इलाज के दौरान गई। सर्वे में यह तथ्य भी पुनः स्थापित हुआ कि मानसून का समय सांप के काटने के खतरों के लिए सबसे अधिक संवेदनशील है।











