शिशु का अचानक दूध पीने से इनकार करना, सामान्य से कम खुराक लेना या फिर दूध पीते ही तुरंत उल्टी कर देना हर माता-पिता के लिए भारी परेशानी का सबब बन जाता है। इस प्रकार की शारीरिक परेशानी के पीछे कई सामान्य कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, जिनमें शिशु का पेट पहले से भरा रहना, पेट में कीड़े होना या फिर पेट में मरोड़ और दर्द की समस्या शामिल है। मऊ स्थित आयुर्वेदिक यूनानी चिकित्सालय के चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. मोहम्मद इमरान ने ऐसी असहज परिस्थितियों से निपटने के लिए कुछ पारंपरिक और सुरक्षित घरेलू सुझाव साझा किए हैं। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट रूप से यह भी आगाह किया है कि नन्हे शिशुओं पर किसी भी प्रकार का नुस्खा आजमाने से पहले हमेशा एक योग्य डॉक्टर की सलाह अवश्य ली जानी चाहिए।
दूध न पीने के सामान्य कारण और नाभि पर हींग का प्रयोग
डॉ. मोहम्मद इमरान के अनुसार जब कोई नन्हा बच्चा नियमित रूप से दूध पीने से कतराने लगे, तो सबसे पहले यह जांचना चाहिए कि कहीं उसका पेट पहले से पूरी तरह भरा हुआ तो नहीं है। कई बार आंतों में कीड़े सक्रिय होने अथवा पेट में गैस और मरोड़ उठने की वजह से भी शिशु असहज होकर दूध से दूरी बना लेता है। ऐसी असहज स्थिति में डॉक्टर एक सरल घरेलू प्रक्रिया अपनाने का सुझाव देते हैं। इसके तहत थोड़ी सी शुद्ध हींग को हल्के गुनगुने पानी में अच्छी तरह घोल लें और फिर इस घोल को शिशु की नाभि के चारों ओर बेहद हल्के हाथों से धीरे-धीरे लगाएं। यह प्रक्रिया गैस और मरोड़ से राहत दिलाने में सहायक मानी जाती है।
गाय या भैंस का दूध उबालते समय रखें इन बातों का ध्यान
डॉ. इमरान का कहना है कि कई बार छोटे बच्चों के लिए गाय अथवा भैंस का भारी दूध पचाना मुश्किल हो जाता है, जिससे उनके शरीर में कफ बनने जैसी परेशानियां उभरने लगती हैं। पाचन की इस बाधा को दूर करने के लिए उन्होंने एक उपयोगी तरीका सुझाया है। जब भी बच्चे के लिए गाय या भैंस का दूध गर्म किया जा रहा हो, तो उसमें थोड़ी सी इलायची और मात्र एक चुटकी सोंठ का चूर्ण डालकर अच्छी तरह उबाल लेना चाहिए। इस तरह तैयार किया गया दूध बच्चों के पाचन तंत्र के लिए काफी सुपाच्य और हल्का साबित हो सकता है।
दूध पिलाते समय दबाव न बनाएं, बड़े बच्चों के आहार में जोड़ें घी और काली मिर्च
खान-पान के दौरान बच्चों के साथ सख्ती बरतने को लेकर भी विशेषज्ञ ने अभिभावकों को सतर्क किया है। उनका कहना है कि शिशु को आहार या दूध देते समय किसी भी सूरत में जोर-जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए। दबाव डालकर खिलाने या पिलाने की कोशिश से बच्चे के स्वाभाविक खान-पान का चक्र और आदतें लंबे समय के लिए बिगड़ सकती हैं, इसलिए उसकी शारीरिक जरूरत को धैर्य से समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त, यदि बच्चा कुछ बड़ा हो चुका है और वह दाल, चावल या खिचड़ी जैसे ठोस आहार खाने लगा है, तो उसके भोजन में थोड़ी सी पिसी हुई काली मिर्च और शुद्ध गाय का घी मिलाया जा सकता है। यह संयोजन बच्चे की जठराग्नि और पाचन क्रिया को मजबूत बनाने में प्रभावी योगदान देता है।
शिशुओं के लिए जायफल का इस्तेमाल और चिकित्सकीय सावधानी
छह महीने से कम उम्र के नन्हे शिशुओं के संदर्भ में डॉ. इमरान ने जायफल को दूध के साथ हल्का सा घिसकर जीभ पर लगाने का एक पारंपरिक नुस्खा भी बताया है। मगर इसके साथ ही उन्होंने कड़े शब्दों में यह चेतावनी भी दी है कि इतने छोटे शिशु को कोई भी बाहरी चीज देने से पूर्व बाल रोग विशेषज्ञ से विधिवत परामर्श करना अनिवार्य है। विशेषकर छह माह से छोटे बच्चों को बिना डॉक्टरी राय के मां के दूध या अनुशंसित दूध के अलावा कुछ भी नहीं दिया जाना चाहिए। किसी भी घरेलू प्रयोग को शुरू करने से पहले योग्य चिकित्सक से सलाह लेना इसलिए भी जरूरी है ताकि बच्चे को किसी प्रकार की अप्रत्याशित एलर्जी, रिएक्शन अथवा अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना न करना पड़े।


















