कई बार नियमित मासिक चक्र होने और मेडिकल जांच रिपोर्ट सामान्य आने के बावजूद महिलाओं को माहवारी शुरू होने से पहले शरीर में अजीब तरह के बदलाव महसूस होते हैं। अक्सर इस स्थिति में यह उलझन पैदा होती है कि जब सेहत से जुड़ी सभी बातें सामान्य हैं, तो फिर अचानक यह असहजता क्यों बढ़ जाती है। दिल्ली स्थित मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अल्का दहिया के अनुसार माहवारी से पहले शरीर में इस तरह के अनुभव सामने आना पूरी तरह से स्वाभाविक और सामान्य बात है।
माहवारी चक्र में हार्मोन का तेज उतार-चढ़ाव
शरीर में होने वाले इन बदलावों को समझाते हुए डॉ. अल्का दहिया ने बताया कि मेंस्ट्रुअल साइकिल के दौरान हार्मोन के स्तर में लगातार बदलाव होता रहता है। माहवारी आने से एक से दो हफ्ते पहले एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के स्तर में तेजी से बढ़ोतरी होती है और फिर वे अचानक नीचे आ जाते हैं। मानव शरीर प्राकृतिक तौर पर इस चक्रीय प्रक्रिया के लिए पूरी तरह अनुकूलित है, लेकिन हार्मोन के इसी तेज उतार-चढ़ाव की वजह से शरीर और मन पर कई अलग-अलग तरह के लक्षण उभरने लगते हैं।
माहवारी से पहले महसूस होने वाले प्रमुख शारीरिक व मानसिक संकेत
माहवारी शुरू होने से पहले महिलाओं में कई आम शारीरिक और भावनात्मक संकेत देखने को मिलते हैं। इनमें शरीर में सूजन, पानी जमा होना यानी वॉटर रिटेंशन, पेट में लगातार भारीपन महसूस होना और स्तनों में कोमलता या भरापन शामिल है। इसके साथ ही अचानक मूड स्विंग होना, बेवजह चिड़चिड़ापन, उदासी का अहसास, नींद पूरी न होना, अत्यधिक थकान, मीठा अथवा नमकीन खाद्य पदार्थ खाने की तीव्र इच्छा होना भी आम है। कई महिलाओं को रक्तस्राव शुरू होने से पहले सिरदर्द, त्वचा पर मुंहासे और पेट के निचले हिस्से में हल्की ऐंठन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
मस्तिष्क के रसायनों और पाचन तंत्र पर प्रभाव
डॉ. अल्का दहिया बताती हैं कि इन सभी बदलावों की मुख्य जड़ शरीर के अंदर होने वाला हार्मोनल परिवर्तन ही है। यह हार्मोनल फेरबदल सीधे तौर पर मस्तिष्क में मौजूद रसायनों की कार्यप्रणाली पर असर डालता है। विशेष रूप से सेरोटोनिन, जो व्यक्ति के मूड, नींद के चक्र और भूख को नियंत्रित करने का काम करता है, इन बदलावों से सीधे प्रभावित होता है। वहीं दूसरी तरफ बढ़ा हुआ प्रोजेस्टेरोन पाचन क्रिया को धीमा कर देता है, जिसके कारण महिलाओं को पेट फूलने, सूजन और कब्ज की शिकायत होने लगती है। इसके अतिरिक्त शरीर में पानी का प्राकृतिक संतुलन भी प्रभावित होता है, जिससे पूरा शरीर फूला हुआ और भारी महसूस होता है। हालांकि रक्तस्राव शुरू होते ही यह समस्या अपने आप धीरे-धीरे ठीक हो जाती है।
दिनचर्या में बदलाव से इन असहज लक्षणों पर कैसे पाएं काबू
इन असहज लक्षणों से राहत पाने के लिए नियमित जीवनशैली में कुछ छोटे सुधार काफी मददगार साबित होते हैं। रोजाना थोड़ा समय निकालकर पैदल चलना, हल्का शारीरिक व्यायाम करना और समय पर सोने की आदत बनाना बेहद आवश्यक है। माहवारी शुरू होने से एक सप्ताह पहले अपनी खुराक में कॉफी, नमक और रेडीमेड डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की मात्रा को काफी कम कर देना चाहिए। अपने भोजन में कैल्शियम और मैग्नीशियम से भरपूर खाद्य सामग्रियों को प्राथमिकता दें, जिसके लिए दही, हरी पत्तेदार सब्जियां और विभिन्न प्रकार के मेवों को डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसके साथ ही लगातार दो से तीन माहवारी चक्रों तक अपने शरीर में उभरने वाले लक्षणों को किसी डायरी में नोट करते रहें, जिससे शारीरिक बदलावों के पैटर्न को आसानी से समझा जा सके।
कब जरूरी हो जाती है डॉक्टर से विशेष चिकित्सीय जांच?
यदि माहवारी के दौरान मूड में बदलाव बहुत तीव्र हो रहे हों या फिर अत्यधिक रक्तस्राव की समस्या सामने आने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। तेज असहनीय दर्द या ऐसे गंभीर लक्षण जो समय के साथ रोजमर्रा की जिंदगी में बर्दाश्त से बाहर हो जाएं, उनकी डॉक्टरी जांच करवाना बेहद आवश्यक है। कई बार पीएमडीडी, थायराइड की समस्या, एंडोमेट्रियोसिस अथवा फाइब्रॉएड जैसी अंदरूनी चिकित्सीय स्थितियों को महिलाएं साधारण पीएमएस समझकर टाल देती हैं। इसलिए समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर से मिलकर उचित परीक्षण कराना बहुत जरूरी होता है ताकि किसी भी छिपी हुई बीमारी की पहचान समय रहते की जा सके।



















