तने में भरा रहता है दूध जैसा रस, जानिए तिरुकैल्ली पौधे के औषधीय गुण और इससे जुड़ी जरूरी सावधानियांस्वास्थ्य
3 घंटे पहले· 2

तने में भरा रहता है दूध जैसा रस, जानिए तिरुकैल्ली पौधे के औषधीय गुण और इससे जुड़ी जरूरी सावधानियां

तिरुकैल्ली यानी मिल्क बुश एक ऐसा औषधीय पौधा है जिसके तने से निकलने वाला दूधिया लेटेक्स पारंपरिक चिकित्सा में कई काम आता है, लेकिन इसका रस विषैला भी होता है इसलिए इसे विशेषज्ञ की सलाह के बिना इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

कुछ पौधे देखने में मामूली लगते हैं, मगर परंपरागत चिकित्सा में उनकी पहचान बेहद खास होती है। ऐसा ही एक पौधा है तिरुकैल्ली, जिसे लोग दूधिया पौधा, थोर या मिल्क बुश के नाम से भी पुकारते हैं। इसकी सबसे खास बात इसके तने और शाखाओं के भीतर भरा वह सफेद, दूध जैसा रस है, जिसे लेटेक्स कहा जाता है। आयुर्वेद में इस वनस्पति को औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है और इसके अलग-अलग हिस्सों को बरसों से पारंपरिक बाहरी उपचारों में काम में लाया जाता रहा है।

श्वसन संबंधी परेशानियों में उपयोग

बलिया की जानी-मानी आयुर्वेदाचार्य डॉ. प्रियंका सिंह बताती हैं कि तिरुकैल्ली का सीमित और नियंत्रित इस्तेमाल सांस से जुड़ी दिक्कतों में राहत देने वाला माना जाता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसके रस को खांसी, जुकाम और अस्थमा जैसी समस्याओं के लिए उपयोग में लाया जाता रहा है। ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग इसे एक घरेलू नुस्खे की तरह पहचानते हैं। बलिया में यह पौधा उद्यानों समेत कई जगहों पर आसानी से मिल जाता है।

दर्द और सूजन में राहत

इस पौधे का दूधिया लेटेक्स दर्द घटाने की क्षमता रखता है। गठिया, नसों के दर्द और कान दर्द जैसी तकलीफों में इसके सीमित उपयोग का जिक्र मिलता है। आयुर्वेद के जानकारों का कहना है कि यह सूजन को कम करने में भी मददगार समझा जाता है और परंपरागत रूप से एक दर्द निवारक की तरह काम में लिया जाता रहा है।

हड्डियों और फ्रैक्चर में पारंपरिक मान्यता

गांव-देहात में तिरुकैल्ली के छिलके को भी अहम माना जाता है, हालांकि इसका सीधे सेवन नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार छिलके को कपड़े में बांधकर पोटली बनाई जाती है और इसे फ्रैक्चर वाले हिस्से पर लगाया जाता है। माना जाता है कि इससे दर्द और सूजन घट सकती है तथा हड्डियों के जुड़ने की प्रक्रिया में सहयोग मिल सकता है। फिर भी इसका इस्तेमाल हमेशा किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।

त्वचा से जुड़ी समस्याओं में

त्वचा की कई परेशानियों में भी इस औषधीय पौधे को लाभकारी माना गया है। इसमें एंटीबैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जिसके चलते दाद, खुजली, संक्रमण और मस्सों जैसी दिक्कतों में परंपरागत रूप से इसका उपयोग होता रहा है। कुछ लोग इसके रस को त्वचा पर लगाने से फायदा मिलने का दावा भी करते हैं। हालांकि जिनकी त्वचा संवेदनशील है, उन्हें इसका बाहरी उपयोग पूरी सावधानी के साथ करना चाहिए।

पाचन और पशुओं के इलाज में

सही तरीके और सीमित मात्रा में लिया गया तिरुकैल्ली पाचन तंत्र की गड़बड़ियों में भी उपयोगी माना जाता है। इसकी जड़ या तने को परंपरागत रूप से पेट दर्द और ऐंठन में काम में लिया जाता रहा है। पशुपालकों के बीच भी इसकी अलग पहचान है, क्योंकि पशुओं की पेट संबंधी दिक्कतों में इसे लंबे समय से घरेलू उपचार के तौर पर अपनाया जाता रहा है।

सर्पदंश को लेकर लोक मान्यता

लोक चिकित्सा में तिरुकैल्ली की जड़ को सर्पदंश के इलाज से भी जोड़ा जाता रहा है। लेकिन यहां सावधान रहना जरूरी है, क्योंकि आधुनिक चिकित्सा साफ कहती है कि सांप के काटने पर सबसे पहली और सबसे जरूरी बात है तुरंत अस्पताल पहुंचकर सही इलाज कराना। इसके बावजूद परंपरागत चिकित्सा में इस पौधे का स्थान महत्वपूर्ण बना हुआ है। गंभीर स्थिति में इसका उपयोग किसी चिकित्सक की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।

जरूरी सावधानियां और नुकसान

तिरुकैल्ली के साथ बेहद सतर्क रहना जरूरी है, क्योंकि इसका दूधिया रस विषैला होता है और त्वचा पर तीव्र जलन पैदा कर सकता है। अगर यह रस आंखों में चला जाए तो गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर उल्टी, दस्त और सिरदर्द जैसी परेशानियां हो सकती हैं। गर्भवती महिलाओं को इससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए। इसका सेवन मुंह से नहीं किया जाता और इसका उपयोग केवल बाहरी रूप में ही उचित माना जाता है। कुल मिलाकर, विशेषज्ञ की सलाह के बिना इसका इस्तेमाल हानिकारक साबित हो सकता है।

सवाल-जवाब

तिरुकैल्ली पौधा किन-किन नामों से जाना जाता है?
इसे दूधिया पौधा, थोर और मिल्क बुश के नाम से भी जाना जाता है।
इसका दूधिया रस यानी लेटेक्स किन समस्याओं में काम आता है?
पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग गठिया, नसों के दर्द, कान दर्द और सूजन में दर्द निवारक के रूप में किया जाता रहा है।
क्या इसे खाया जा सकता है?
नहीं, इसका मुंह से सेवन नहीं किया जाता और इसका उपयोग केवल बाहरी रूप में ही उचित माना जाता है।
इसके इस्तेमाल में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
इसका रस विषैला होता है, आंखों में जाने पर गंभीर नुकसान कर सकता है, और गर्भवती महिलाओं को इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।
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