उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बारिश का मौसम शुरू होते ही खेतों की मेड़ों पर तरह-तरह की जंगली लाई अपने आप उग आती है, और इन्हीं में से एक है कांटेदार लाई, जिसे सर्दी और खांसी से राहत दिलाने वाला घरेलू नुस्खा भी माना जाता है. दिलचस्प बात यह है कि यह सब्जी की तरह भी खाई जाती है और पीढ़ियों से पहाड़ी परिवारों के खाने का हिस्सा रही है.
पत्तियों से लेकर कांटों तक, कैसे पहचानें यह पौधा
कांटेदार लाई के पत्ते नुकीले और कटे-कटे आकार के होते हैं, इसी वजह से लोग इसे कांटेदार लाई पुकारते हैं, हालांकि हकीकत में इसमें असली कांटे नहीं होते. पत्तियों का रंग गहरा हरा होता है और किनारे देखने में नुकीले लगते हैं, लेकिन पौधा छूने में मुलायम होता है. यह प्राकृतिक रूप से पहाड़ के खेतों की मेड़ों पर उगती है और इसकी कोमल पत्तियां ही खाने लायक मानी जाती हैं. इसे तोड़ते वक्त सिर्फ ताजी और स्वस्थ पत्तियां चुनना जरूरी है. अगर किसी जंगली पौधे की पहचान को लेकर जरा भी शक हो, तो इलाके के किसी जानकार व्यक्ति से सलाह लेना बेहतर रहता है, ताकि गलत पौधा खाने की गलती न हो जाए.
खांसी-जुकाम में इस्तेमाल की पुरानी परंपरा
पहाड़ों में कांटेदार लाई को घरेलू भोजन के तौर पर बरसों से बनाया जाता रहा है. स्थानीय जानकार रमेश बताते हैं कि इसकी उबली हुई पत्तियां खाने से मौसमी खांसी और जुकाम में राहत मिल सकती है. हालांकि वे यह भी साफ करते हैं कि अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है, और इसे सिर्फ एक पारंपरिक इलाज के तौर पर ही देखा और इस्तेमाल किया जाना चाहिए, किसी दवा के विकल्प के रूप में नहीं.
फाइबर, आयरन और विटामिन से भरपूर पहाड़ी साग
बागेश्वर के चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल के मुताबिक, आम हरी पत्तेदार सब्जियों की तरह कांटेदार लाई में भी फाइबर, विटामिन ए, विटामिन सी, आयरन और कैल्शियम जैसे जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं. वे बताते हैं कि अगर संतुलित मात्रा में हरी सब्जियों का सेवन नियमित रूप से किया जाए, तो इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और पाचन तंत्र भी बेहतर काम करता है.
जाखिया के तड़के के साथ बनती है स्वादिष्ट सब्जी
कांटेदार लाई की कोमल पत्तियों को पहले अच्छी तरह धोया जाता है, फिर उबाला जाता है. इसके बाद जाखिया, लहसुन, हरी मिर्च और हल्के मसालों का तड़का लगाकर इसे स्वादिष्ट सब्जी का रूप दिया जाता है. कई लोग इसे मंडुवे या गेहूं की रोटी के साथ खाना पसंद करते हैं. डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि उबालने की इस प्रक्रिया से पत्तियों की कड़वाहट भी काफी हद तक कम हो जाती है, जिससे सब्जी का स्वाद और बेहतर हो जाता है.
मानसून में ही मिलती हैं सबसे कोमल पत्तियां
डॉ. ऐजल पटेल के अनुसार, यह पौधा मुख्य रूप से मानसून के दौरान ही ज्यादा मात्रा में उगता है. बारिश के मौसम में खेतों और जंगलों के किनारों पर इसकी नई पत्तियां निकलना शुरू होती हैं, और यही वह समय होता है जब इसकी कोमल पत्तियां सबसे स्वादिष्ट मानी जाती हैं. जैसे ही बारिश का मौसम खत्म होने लगता है, इसकी उपलब्धता भी धीरे-धीरे घटने लगती है.
तोड़ने से पहले बरतें ये सावधानियां
जंगली साग इकट्ठा करते समय सिर्फ उसी पौधे को तोड़ना चाहिए जिसकी पहचान पूरी तरह पक्की हो. सड़क किनारे, प्रदूषित इलाकों या ऐसी जगहों से लाई नहीं तोड़नी चाहिए जहां कीटनाशकों का इस्तेमाल होता हो. इस्तेमाल से पहले पत्तियों को साफ पानी से कई बार धोना बेहद जरूरी है, ताकि उनमें चिपकी मिट्टी और बाकी अशुद्धियां पूरी तरह निकल जाएं.
सिर्फ साग नहीं, पहाड़ की खाद्य परंपरा का हिस्सा
डॉ. ऐजल पटेल कहते हैं कि कांटेदार लाई केवल एक जंगली साग भर नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का अहम हिस्सा है. इसका अनोखा स्वाद इसे बाकी हरी सब्जियों से अलग पहचान देता है. आज भी बारिश के मौसम में कई ग्रामीण परिवार इसे अपने खाने में शामिल करते हैं. उनका कहना है कि अगर सही पहचान के साथ और स्वच्छ तरीके से इसका इस्तेमाल किया जाए, तो यह एक पौष्टिक और फायदेमंद आहार का बेहतरीन विकल्प बन सकता है.











