हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर का अंतर्कलह एक बार फिर खुलकर सतह पर आ गया है। पार्टी से निष्कासित और ज्वाली विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक नीरज भारती ने राज्य की सुक्खू सरकार के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अख्तियार किया है। शिमला जिले के रामपुर सराहन में आयोजित एक सार्वजनिक समारोह के दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह अपने निजी स्वार्थ के लिए सत्ता की जी-हजूरी नहीं कर सकते। उनका यह बयान उस वक्त आया जब वह हिमाचल के दिग्गज दिवंगत नेता वीरभद्र सिंह की प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे। इस मंच से उन्होंने सरकार की नीतियों और संगठन के कार्यकर्ताओं के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये पर कड़े सवाल खड़े किए।
जमीनी कार्यकर्ताओं की अनसुनी और चापलूसी की राजनीति
नीरज भारती, जो मौजूदा सुक्खू मंत्रिमंडल के वरिष्ठ मंत्री चंद्र कुमार के पुत्र भी हैं, ने स्पष्ट किया कि उनकी पूरी राजनीति कार्यकर्ताओं के हक और सम्मान के इर्द-गिर्द घूमती है। उनका कहना था कि जब सरकार में उन जमीनी कार्यकर्ताओं की कोई सुनवाई ही नहीं हो रही है, जिन्होंने दिन-रात पसीना बहाकर पार्टी को सत्ता दिलाई, तो ऐसे में सरकार की झूठी तारीफों के पुल बांधना उनके सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने दो टूक कहा कि व्यक्तिगत लाभ हासिल करने के लिए मंत्रियों और शीर्ष नेताओं के चौखट पर हाजिरी लगाना उनकी कार्यशैली कभी नहीं रही। अगर वह चाहते तो आसानी से नेताओं के दरवाजे खटखटाकर अपने निजी काम करवा सकते थे, मगर उन्होंने चापलूसी का आसान रास्ता चुनने के बजाय अपने समर्थकों के अधिकारों के लिए लड़ना चुना।
विपक्ष के दौर का संघर्ष और अधूरी उम्मीदें
ज्वाली के पूर्व विधायक ने कार्यकर्ताओं की व्यथा को विस्तार से साझा करते हुए याद दिलाया कि पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के पांच साल के कार्यकाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भारी प्रताड़ना झेली थी। उस कठिन दौर में कार्यकर्ताओं पर कई तरह के दबाव बनाए गए, मुकदमों का सामना करना पड़ा और उनका दमन हुआ। इसके बावजूद जमीनी स्तर के समर्पित कार्यकर्ताओं ने अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी और पार्टी का झंडा बुलंद रखा। कार्यकर्ताओं को यह पूरी आशा थी कि राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते ही उनके साथ न्याय होगा, उनकी वर्षों की समस्याओं का समाधान किया जाएगा और प्रशासनिक तंत्र में उन्हें उचित आदर-सम्मान प्राप्त होगा।
भारती ने अफसोस जताते हुए कहा कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद जमीनी स्तर के हालात नहीं बदले। कार्यकर्ताओं की उम्मीदें पूरी तरह से धराशायी हो चुकी हैं। उन्होंने साफ किया कि वह पूरे प्रदेश की राजनीति पर टिप्पणी करने के बजाय मुख्य रूप से अपने हलके के पीड़ित कार्यकर्ताओं की आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जिन कार्यकर्ताओं ने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष किया, यदि आज उन्हीं की समस्याओं पर ताले लगे रहेंगे, तो कोई भी स्वाभिमानी प्रतिनिधि किसी बड़े मंच से सत्ता की वाहवाही करने का ढोंग नहीं कर सकता।
कारण बताओ नोटिस और पार्टी से निष्कासन
संगठन द्वारा जारी किए गए कारण बताओ नोटिस और उसके बाद अपने निष्कासन पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व विधायक ने कहा कि उन्हें इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाइयों का कोई भय नहीं है। जब उन्हें पार्टी की तरफ से कारण बताओ नोटिस थमाए जाने की जानकारी मिली थी, तभी उन्होंने साफ कर दिया था कि उन्हें ऐसे किसी नोटिस की परवाह नहीं है। उन्होंने दोहराया कि उनका संघर्ष किसी व्यक्तिगत राजनीतिक पद या फायदे की लालसा में नहीं था, बल्कि यह पूरी लड़ाई उन निस्वार्थ कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान की रक्षा के लिए थी जो खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर दिखाकर उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता।
वीरभद्र सिंह की विरासत और पोस्टरों की सियासत
मुख्यमंत्री के दौरों के दौरान प्रचार सामग्री और पोस्टरों से पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह की तस्वीरें हटाए जाने तथा सार्वजनिक भाषणों में उनका नाम न लिए जाने के विवाद पर भी भारती ने करारा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक पोस्टरों से किसी की तस्वीर को हटा देना बहुत आसान है, परंतु जनता के अंतःकरण में बसी उस नेता की अमिट यादों और ऐतिहासिक योगदान को किसी भी आदेश से नहीं मिटाया जा सकता। स्वर्गीय वीरभद्र सिंह ने अपने लंबे मुख्यमंत्रित्व काल में हिमाचल प्रदेश के सर्वांगीण विकास की मजबूत आधारशिला रखी थी।
भारती ने प्रदेश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों का हवाला देते हुए कहा कि किन्नौर के दूरदराज इलाकों से लेकर बिलासपुर, कांगड़ा, ज्वाली, नगरोटा, हमीरपुर और ऊना तक, हर जिले में वीरभद्र सिंह के विकास कार्यों की छाप देखी जा सकती है। उन्होंने कभी भी क्षेत्रों के बीच भेदभाव नहीं किया और यही कारण है कि उन्हें पूरे राज्य में आधुनिक हिमाचल का निर्माता और विकास पुरुष कहा जाता है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों से इतने बड़े जननेता का नाम न लेना केवल संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। किसी भी नेता के ऐतिहासिक योगदान की अनदेखी करने से इतिहास का सच कभी नहीं बदलता।
सोशल मीडिया पर तकरार और बगावती तेवर
नीरज भारती पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व के विरुद्ध निरंतर मुखर रहे हैं। वह अपने फेसबुक हैंडल के जरिए सरकार की कार्यशैली और मुख्यमंत्री के निर्णयों पर तीखे प्रहार करते रहे थे। स्थिति इस हद तक तनावपूर्ण हो गई थी कि कानूनी कार्रवाई के तहत उनके फेसबुक अकाउंट को निलंबित कर दिया गया था। उस दौरान भारती ने यह दावा तक कर दिया था कि उनके पिता और कैबिनेट मंत्री चंद्र कुमार अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे। रामपुर सराहन के इस ताजा संबोधन ने यह साफ कर दिया है कि निष्कासन और सोशल मीडिया पर पाबंदियों के बावजूद वह सुक्खू सरकार के खिलाफ अपना विद्रोही अभियान धीमा करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।





















