फलस्तीनी क्षेत्र गाजा में मानवीय संकट एक बार फिर बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां खाद्य आपूर्ति का मुख्य जिम्मा संभाल रही संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने अपने राहत अभियान में भारी कटौती करने की घोषणा की है। बजट की गंभीर किल्लत से जूझ रही इस एजेंसी को जीवन रक्षक खाद्य सहायता में भारी कमी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इस फैसले का सीधा असर गाजा की उस बेबस आबादी पर पड़ेगा जो पहले से ही तीन वर्षों से चले आ रहे युद्ध, विस्थापन और तबाही की मार झेल रही है। सर्दी का मौसम तेजी से करीब आ रहा है और ऐसे नाजुक वक्त में लाखों परिवारों के सामने भुखमरी का नया खतरा मंडराने लगा है।
आंकड़ों के अनुसार, इस एजेंसी की मदद पर निर्भर लोगों की कुल संख्या में लगभग एक तिहाई की कटौती की जा रही है। पहले जहां 1.6 मिलियन (16 लाख) लोगों तक राशन और भोजन की सीधी मदद पहुंचाई जा रही थी, वहीं अब यह दायरा सिमटकर केवल 1.1 मिलियन (11 लाख) लोगों तक ही सीमित रह जाएगा। इसका मतलब यह है कि लगभग पांच लाख लोग सीधे तौर पर बुनियादी खाद्य सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएंगे। गाजा पट्टी की कुल आबादी लगभग 2.1 मिलियन (21 लाख) है, जिसमें से लगभग पूरी आबादी अपने घरों से उजड़कर विस्थापित हो चुकी है और करीब दो तिहाई लोग जिंदा रहने के लिए पूरी तरह से मानवीय सहायता और भोजन के पैकेटों पर निर्भर हैं।
कम्युनिटी किचन और पके हुए भोजन में भारी कमी
इस नई कटौती का सबसे फौरी और कड़वा असर इलाके में चलने वाले कम्युनिटी किचन यानी सामुदायिक रसोइयों पर पड़ा है। अब तक इन रसोइयों के जरिए जरूरतमंद विस्थापितों को रोजाना 250,000 (ढाई लाख) गर्म भोजन की थालियां परोसी जा रही थीं, जिसे अब घटाकर प्रतिदिन 150,000 (डेढ़ लाख) कर दिया गया है। रोजाना एक लाख थालियों की यह सीधी कटौती उन असहाय परिवारों के पेट पर सीधी चोट है जिनके पास खुद से चूल्हा जलाने का कोई जरिया नहीं बचा है।
विशेष रूप से दुर्गम और संवेदनशील इलाकों में रह रहे लोगों के लिए स्थिति और भी बदतर हो गई है। उदाहरण के तौर पर, तथाकथित येलो लाइन के पास बसे विस्थापित शिविरों में रहने वाले परिवारों को अब हर रोज भोजन नहीं मिलेगा। यह येलो लाइन इजरायल के सैन्य नियंत्रण वाले क्षेत्र को चिह्नित करती है, जहां सुरक्षा कारणों और पहुंच की दिक्कतों की वजह से हालात पहले से ही तनावपूर्ण हैं। इन इलाकों में बसे लोगों को अब दैनिक भोजन के बजाय एक दिन छोड़कर, यानी हर दूसरे दिन एक बार ही खाना मुहैया कराया जाएगा।
तंबुओं में जीवन बसर कर रहे परिवारों का दर्द
खान यूनिस के अल-मवासी इलाके में शरणार्थी शिविरों में रह रहे विस्थापित फिलिस्तीनियों ने इस फैसले को अपने लिए कयामत जैसा बताया है। पांच बच्चों की मां मेरवत अल-सतारी ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा, "यह एक आपदा है! इन घटे हुए राशन से हम क्या करेंगे? हम अपने छोटे बच्चों का पेट कैसे भरेंगे?" उन्होंने बताया कि कई बार उनके बच्चे दिनभर सिर्फ इसलिए इंतजार करते हैं ताकि इन राहत रसोइयों से मिलने वाले एक वक्त के खाने से अपनी भूख शांत कर सकें।
अल-मवासी में ही तीन बच्चों का पालन-पोषण कर रहीं सौसन बहलूल ने कहा, "यह हमें बहुत प्रभावित करेगा। दैनिक सहायता किसी तरह हमारी जरूरतें पूरी कर रही थी, लेकिन अब यह हर दो दिन में एक बार मिलेगी।" उन्होंने यह भी साझा किया कि सामुदायिक रसोइयों से जो भोजन उन्हें मिलता था, वह पहले से ही परिवार की जरूरत के हिसाब से बहुत कम था। इन रसोइयों में आम तौर पर पास्ता या मसूर की दाल के साथ कभी-कभार आलू और बैंगन ही मिलते थे, जो बच्चों के पोषण और भूख मिटाने के लिए नाकाफी थे।
वित्तीय संकट बनी कटौती की मुख्य वजह
WFP के फलस्तीन निदेशक शॉन ह्यूजेस ने स्पष्ट किया है कि यह कठोर कदम किसी नीतिगत बदलाव या पहुंच की कमी के कारण नहीं, बल्कि पूरी तरह से धन के अभाव की वजह से उठाया गया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, "जरूरतें कम होने या पहुंच न होने की वजह से ऐसा नहीं किया जा रहा है, हमारे पास पहुंच मौजूद है।" इसका अर्थ है कि जमीनी स्तर पर राहत सामग्री पहुंचाने की क्षमता और रास्ते तो खुले हैं, लेकिन राशन खरीदने और वितरित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाला फंड पूरी तरह सूख चुका है।
WFP को वर्ष 2026 में अपने फलस्तीनी अभियानों के लिए पिछले वर्षों की तुलना में आधे से भी कम फंड मिला है। एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अगले छह महीनों तक अपने इन बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण राहत अभियानों को जिंदा रखने के लिए उसे तत्काल 450 मिलियन डॉलर (लगभग 338 मिलियन पाउंड) की भारी वित्तीय मदद की सख्त दरकार है। अगर यह रकम समय पर नहीं मिलती है, तो आने वाले दिनों में भोजन की यह सप्लाई लाइन पूरी तरह ठप भी हो सकती है।
सूखे राशन और नकदी हस्तांतरण पर भी कैंची
राहत में कटौती की यह प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई है, बल्कि पिछले कुछ महीनों से लगातार गहरी होती जा रही है। जुलाई के महीने से ही करीब 500,000 (पांच लाख) लोगों को मिलने वाले नकद पैसे के हस्तांतरण में कटौती कर दी गई थी। नकद सहायता घटने का नतीजा यह हुआ कि विस्थापित परिवारों की स्थानीय बाजारों से ताजा फल, सब्जियां या अन्य जरूरी चीजें खरीदने की क्षमता और घट गई।
अब इस ताजा फैसले के बाद WFP द्वारा हर महीने बांटे जाने वाले आटे के बोरों और सूखे राशन के डिब्बों में भी भारी गिरावट देखने को मिलेगी। नियमित राशन बॉक्स और आटा पाने वाले गाजावासियों की संख्या को प्रति माह 1.1 मिलियन (11 लाख) से घटाकर सीधे 600,000 (छह लाख) कर दिया जाएगा। यानी करीब पांच लाख परिवारों से उनके घर का सूखा राशन पूरी तरह छिन जाएगा, जिससे उनके पास अब कम्युनिटी किचन की आधी हो चुकी लाइनों में लगने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
जमीनी हकीकत: युद्धविराम के बावजूद बदहाली
हमास और इजरायल के बीच एक साल पहले युद्धविराम पर सहमति बनी थी, लेकिन इसके बावजूद गाजा के अंदरूनी मानवीय हालात में कोई ठोस सुधार नहीं हो पाया है। युद्धविराम के एक साल बीत जाने के बाद भी यहां पुनर्निर्माण का कोई काम शुरू नहीं हो सका है और आर्थिक बहाली न के बराबर है। इजरायल सीमा चौकियों के जरिए आने-जाने वाले सामानों पर कड़ा नियंत्रण रखता है।
हालांकि वर्तमान में गाजा के स्थानीय बाजारों में खाने-पीने की चीजें दुकानों में सजी हुई दिखाई देती हैं, लेकिन त्रासदी यह है कि उन्हें खरीदने की हैसियत लगभग किसी के पास नहीं है। गाजा में 80% से अधिक आबादी पूरी तरह बेरोजगार है, जिसके चलते अधिकांश लोगों के पास कोई नियमित आय नहीं बची है। यही वजह है कि आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ और सिर्फ मुफ्त राहत सहायता पर टिका हुआ है।
गाजा शहर में अपने ढह चुके घर के खंडहरों में अपने आठ सदस्यों के परिवार के साथ रह रहीं दलाल अल-दहदू ने बताया कि कटौती से पहले भी WFP से मिलने वाला राशन परिवारों के लिए अपर्याप्त था और उनके भोजन में पोषण की भारी कमी थी। उन्होंने कहा, "आटा पर्याप्त नहीं है और खाने के डिब्बे भी पर्याप्त नहीं हैं।" उन्होंने अपनी पिछली जिंदगी को याद करते हुए भावुक होकर कहा कि युद्ध से पहले उनके पास अपना पक्का घर, ताजा सब्जियां, साफ-सफाई की उचित सुविधाएं और खुद की जमीन थी, लेकिन अब वे पूरी तरह WFP के कूपनों और दी जाने वाली खैरात पर निर्भर हो चुके हैं।
ईंधन का संकट और प्लास्टिक जलाने की मजबूरी
गाजा में केवल अनाज का ही अकाल नहीं है, बल्कि खाना पकाने के लिए ईंधन की भी भारी किल्लत है। पूरे इलाके में रसोई गैस पूरी तरह से गायब है, क्योंकि इजरायली सरकार रसोई गैस को दोहरे उपयोग (डुअल यूज़) वाली वस्तु मानती है, जिसका इस्तेमाल हमास द्वारा सैन्य उद्देश्यों के लिए किए जाने की आशंका जताई जाती है।
बाजार में लकड़ी की कीमतें इतनी ज्यादा हैं कि गरीब और विस्थापित परिवार उसे खरीद नहीं सकते। ऐसे में सौसन बहलूल जैसी अनगिनत माताओं को अपने छोटे बच्चों को गलियों और कचरे के ढेरों में भेजना पड़ता है, ताकि वे प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां और गत्ते बीनकर ला सकें। इन जहरीले प्लास्टिक और कचरों को जलाकर ही परिवार रोटी पकाने और पानी गर्म करने को मजबूर हैं, जिससे सांस और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा भी पैदा हो रहा है। WFP के अधिकारी ह्यूजेस ने भी माना कि लोग बर्बर परिस्थितियों में जी रहे हैं, जहां उनके पास न पक्के मकान हैं, न पीने का साफ पानी, न स्वच्छता और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं। यह नई कटौती पिछले तीन साल से संकट झेल रहे परिवारों की पीड़ा को कई गुना बढ़ा देगी।
अकाल का बढ़ता खतरा और वेस्ट बैंक के हालात
राहतकर्मियों का कहना है कि एक साल पहले की तुलना में गाजा में मामूली सुधार दिखने के बावजूद, तीव्र खाद्य असुरक्षा और भुखमरी का साया लगातार मंडरा रहा है। जुलाई में खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी विशेषज्ञ संगठन, इंटीग्रेटेड फेज क्लासिफिकेशन (IPC) ने अपनी रिपोर्ट में चेताया था कि जुलाई से दिसंबर 2026 के दौरान गाजा की दो तिहाई आबादी यानी 1.4 मिलियन (14 लाख) लोगों को गंभीर खाद्य असुरक्षा के संकट या उससे भी बदतर स्तर का सामना करना पड़ सकता है।
फिलहाल WFP का कहना है कि वह गाजा की रोटी की कुल मांग के एक तिहाई हिस्से को पूरा करने वाली बेकरियों को अपना समर्थन जारी रखेगा। इसके अलावा एजेंसी लगभग 300,000 महिलाओं और बच्चों को पोषण सहायता तथा करीब 200,000 बच्चों को स्वास्थ्यवर्धक स्नैक्स की आपूर्ति जारी रखने की कोशिश कर रही है।
वहीं दूसरी ओर, कब्जे वाले वेस्ट बैंक में भी स्थिति लगातार बिगड़ रही है। WFP वहां करीब 200,000 फलस्तीनियों को सहायता देना जारी रखे हुए है, जबकि सितंबर के महीने में ही उसने वहां भी लाभार्थियों की संख्या को आधा कर दिया था। एजेंसी के अनुसार, वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों के बसने वालों द्वारा बढ़ती हिंसा और स्थानीय फलस्तीनियों के लगातार हो रहे विस्थापन के चलते खाद्य असुरक्षा तेजी से बढ़ रही है।



















