इस्लामाबाद की वैश्विक कूटनीतिक आकांक्षाओं को तब गहरा झटका लगा जब अरबों रुपये के वित्तीय निवेश के बावजूद ब्रिक्स के मुख्य राजनीतिक मंच पर उसकी दावेदारी अटकी रह गई। तकरीबन तीन साल पहले आवेदन सौंपने वाला पाकिस्तान लगातार यह उम्मीद बांधे बैठा था कि रूस की सार्वजनिक हिमायत और चीन की रणनीतिक नजदीकी उसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं के इस प्रभावशाली गुट का स्थायी हिस्सा बना देगी। इसके समानांतर उसने ब्लॉक के न्यू डेवलपमेंट बैंक में भारी भरकम पूंजी लगाकर अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराई। इसके बावजूद हकीकत यह है कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका द्वारा स्थापित इस शक्तिशाली समूह के दरवाजे अब तक उसके लिए नहीं खुले हैं। यह पूरा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि केवल वित्तीय हिस्सेदारी खरीद लेना या दो महाशक्तियों का समर्थन हासिल कर लेना ब्रिक्स के उच्च स्तरीय विचार विमर्श में कुर्सी पाने की गारंटी नहीं बन सकता, खासकर तब जब नई दिल्ली जैसे संस्थापक देश के साथ कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी गहरे मतभेद बरकरार हों।
बैंक में हिस्सेदारी और समूह की राजनीतिक सदस्यता में अंतर
बहुत से विश्लेषक न्यू डेवलपमेंट बैंक के विस्तार को ही ब्रिक्स सदस्यता का पर्याय मान बैठते हैं, जबकि दोनों संस्थाओं की कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्थाएं पूरी तरह अलग हैं। मूल संस्थापक देशों ने बुनियादी ढांचे और सतत विकास परियोजनाओं को गति देने के उद्देश्य से इस बहुपक्षीय वित्तीय संस्थान का ढांचा तैयार किया था। इस वित्तीय संस्थान का नियम स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था देता है कि कोई भी मुल्क ब्रिक्स के राजनीतिक घोषणापत्र का भागीदार बने बिना भी बैंक की शेयरधारिता खरीद सकता है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बांग्लादेश है, जिसने बैंक में औपचारिक हिस्सेदारी तो प्राप्त की लेकिन वह ब्रिक्स समूह का औपचारिक सदस्य नहीं है।
पाकिस्तान ने भी इसी रास्ते को अपनी आर्थिक ढाल बनाने की कोशिश की थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे पश्चिमी संस्थानों की कड़ी शर्तों और बार-बार के दबाव से बचने के लिए उसने शुरुआती दौर में 1.09 प्रतिशत हिस्सेदारी जुटाने के वास्ते 116 मिलियन डॉलर की चुकता पूंजी का वादा किया था। इसके बाद फरवरी 2025 में इस्लामाबाद ने 5,882 शेयरों की खरीद को मंजूरी दी, जिसका कुल मूल्यांकन लगभग 582 मिलियन डॉलर बैठता है। इस सौदे के जरिए उसने बैंक के भीतर अपनी 1.09 प्रतिशत की इक्विटी सुरक्षित कर ली। इस कदम से इस्लामाबाद को ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित वित्तीय नेटवर्क से जुड़ने का रास्ता तो जरूर मिला, लेकिन यह सौदा उसे उस मेज पर राजनीतिक वीटो या प्रतिनिधित्व नहीं दिला सका जहां संगठन की विदेश नीति, सुरक्षा रणनीति और वैश्विक एजेंडे तय किए जाते हैं।
आर्थिक संकट और ग्लोबल साउथ में पहचान की छटपटाहट
आखिरकार इस्लामाबाद इस ब्लॉक में शामिल होने के लिए इतना उतावला क्यों दिखाई देता है। इसकी सबसे बड़ी वजह समूह का तेजी से बदलता स्वरूप और वैश्विक पटल पर बढ़ता दायरा है। साल 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को इसमें पूर्ण सदस्यता मिली, जबकि साल 2025 में इंडोनेशिया भी एक संपूर्ण भागीदार के रूप में इसमें शामिल हो गया। इस विस्तार ने ब्रिक्स को विकासशील दुनिया की एक मजबूत आवाज बना दिया है, जिससे बाहर रहना पाकिस्तान जैसे आर्थिक रूप से कमजोर देश के लिए कूटनीतिक अलग-थलग पड़ने जैसा महसूस होता है। नवंबर 2023 में जब पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने अपनी औपचारिक अर्जी दाखिल की थी, तब उसने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और समावेशी बहुपक्षवाद में अपनी भूमिका निभाने का दावा पेश किया था।
कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पहल के पीछे पाकिस्तान की राजनीतिक साख चमकाने के साथ-साथ गंभीर आर्थिक मजबूरियां भी छिपी हैं। लंबे समय से विदेशी मुद्रा भंडार की किल्लत, भारी विदेशी कर्ज और आईएमएफ के बार-बार बेलआउट पैकेज की जकड़न में फंसा पाकिस्तान नए वित्तीय विकल्प तलाश रहा है। चीन और संयुक्त अरब अमीरात पहले से ही उसे द्विपक्षीय मदद देते रहे हैं और दोनों ही देश ब्रिक्स के भीतर बेहद प्रभावशाली स्थिति में हैं। भले ही ब्रिक्स की मुहर लगने भर से पाकिस्तान का चरमराया हुआ आर्थिक ढांचा रातों-रात नहीं सुधर सकता, लेकिन उभरते बाजारों के नेटवर्क, कूटनीतिक मंचों और विकास बैंक से आसान वित्तीय प्रवाह तक सीधी पहुंच उसके लड़खड़ाते बजट को सहारा दे सकती है।
नई दिल्ली की सुरक्षा चिंताएं और आम सहमति का तकनीकी अवरोध
पाकिस्तानी विदेश नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ब्रिक्स किसी एक या दो देशों की जागीर नहीं है। सदस्यता का फैसला सर्वसम्मति से होता है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि भारत की मंजूरी के बिना कोई भी देश इसमें प्रवेश नहीं कर सकता। दोनों पड़ोसियों के बीच सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद, जम्मू-कश्मीर और सुरक्षा के मसलों पर दशकों पुराना तनाव जगजाहिर है। भारत ने हमेशा इस बात को दृढ़ता से रेखांकित किया है कि आतंकी नेटवर्क को पनाह देने वाले मुल्कों के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सामान्य सहयोग संभव नहीं है।
अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले के बाद तनाव अपने चरम पर पहुंच गया था। नई दिल्ली ने इस हमले की जड़ें पाकिस्तानी जमीन से जुड़ी बताते हुए पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थित आतंकी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाकर सख्त सैन्य कार्रवाई की थी। सुरक्षा से जुड़ी यही तीखी तकरार 2026 में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पटल पर भी स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित हुई। उस सम्मेलन के साझा घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में भर्त्सना की गई और आतंकवाद के वित्तपोषण, सुरक्षित पनाहगाहों तथा आतंकियों की सीमा पार आवाजाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए शून्य सहिष्णुता की नीति का आह्वान किया गया।
यद्यपि भारत ने सार्वजनिक रूप से कोई औपचारिक वीटो लगाने का ऐलान नहीं किया है, लेकिन रणनीतिकारों का आकलन है कि सर्वसम्मति की अनिवार्यता के कारण भारत का कड़ा रुख व्यावहारिक रूप से एक वीटो की तरह ही काम करता है। दूसरी तरफ मॉस्को ने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान के प्रवेश की वकालत की है। रूसी विश्लेषक आंद्रेई कोर्तुनोव ने 2024 में कहा था कि पाकिस्तान दक्षिण-दक्षिण सहयोग को गति देने में मददगार हो सकता है। परंतु केवल रूस या चीन की सद्भावना से समीकरण नहीं बदलते। विश्लेषक मुहम्मद फैसल के अनुसार, पाकिस्तान की सदस्यता का सफर बेहद लंबा और पेचीदा है, जो नई दिल्ली के कड़े एतराज के साथ-साथ भारत और चीन के आपसी द्विपक्षीय समीकरणों पर भी काफी हद तक निर्भर करता है।
वैश्विक टकराव बनाम आर्थिक मंच का बुनियादी द्वंद्व
ब्रिक्स के भीतर चल रही इस खींचतान को केवल भारत बनाम रूस-चीन के साधारण झगड़े के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे समूह की मूल दिशा को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। रूस और चीन इस मंच का तेजी से विस्तार करके इसे पश्चिमी प्रभुत्व वाले वैश्विक संस्थानों के समानांतर एक व्यापक भू-राजनीतिक शक्ति केंद्र के रूप में उभारना चाहते हैं। बीजिंग और मॉस्को के लिए अधिक सदस्यों का मतलब पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों और डॉलर की दादागिरी के सामने एक सशक्त वैश्विक विकल्प खड़ा करना है।
इसके विपरीत, भारत इस ब्लॉक को पश्चिमी विरोधी खेमे में तब्दील करने के पक्ष में नहीं है। नई दिल्ली का दृष्टिकोण यह रहा है कि ब्रिक्स को विकासशील देशों के विकास, आर्थिक सुधारों और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व का साधन बनना चाहिए, न कि पश्चिमी देशों के साथ टकराव का अखाड़ा। भारत के संबंध अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भी बेहद मजबूत हैं। ऐसे में यदि स्पष्ट साझा उद्देश्यों के बिना केवल संख्या बढ़ाने के लिए समूह का विस्तार किया जाता है, तो इसकी एकजुटता और प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है। पाकिस्तान का चीन के साथ बेहद गहरा सामरिक झुकाव इस बहस को और अधिक संवेदनशील बना देता है।
पार्टनर देश का दर्जा और बीजिंग-नई दिल्ली संबंधों की नई दिशा
साल 2024 में कजान में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पूर्ण सदस्यता के अलावा एक नई भागीदार देश श्रेणी का गठन किया गया था। इस श्रेणी का मकसद उन मुल्कों को ब्रिक्स के करीब लाना था जिन्हें तत्काल पूर्ण सदस्यता नहीं दी जा सकती। दिलचस्प बात यह रही कि पाकिस्तान को इस शुरुआती भागीदार सूची में भी जगह नहीं मिल पाई। हालांकि रणनीतिक विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान की उम्मीदों का औपचारिक अंत नहीं मानते।
आने वाले समय में एक नया कोण भारत और चीन के संबंधों में संभावित नरमी का उभर रहा है। विश्लेषक हुमा यूसुफ ने रेखांकित किया है कि यदि भारत और चीन के बीच संबंधों में जमी बर्फ पिघलती है, तो वह बदलाव इस्लामाबाद के आवेदन पर पुनर्विचार के लिए कुछ खिड़की खोल सकता है। यह पहलू 2026 के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के बाद और अधिक प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि 2026 में भारत मेजबान की भूमिका में रहा जबकि अगले वर्ष ब्रिक्स की कमान चीन के हाथों में जाने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करने के प्रयासों के बीच इस्लामाबाद यह परखने की कोशिश कर रहा है कि क्या एशियाई पड़ोसियों के बीच की यह नरमी उसके लिए कोई कूटनीतिक गुंजाइश पैदा करेगी। कुल मिलाकर, पाकिस्तान का ब्रिक्स अभियान केवल मॉस्को और बीजिंग के समर्थन की परीक्षा नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी पैमाना है कि नई दिल्ली और बाकी सदस्य भविष्य के ब्रिक्स को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।



















