अमेरिकी सेना ने टेक्सास स्थित फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पर 2009 में हुए खूनी हमले के दोषी निदाल हसन के मृत्युदंड को पूरी दुनिया के सामने सीधे प्रसारित करने की आधिकारिक तैयारी पूरी कर ली है। ठीक उसी स्थान और उसी दोपहर के एक बजे के वक्त पर एक सैन्य फायरिंग स्क्वाड निदाल हसन को गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतारेगा, जहां उसने सत्रह साल पहले अपने ही साथी सैनिकों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं। संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास में सार्वजनिक तौर पर दी जाने वाली फांसी या मौत की सजा लगभग नब्बे साल बाद फिर से लौट रही है, जिसको लेकर वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार और कूटनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है।
फोर्ट हुड के मेडिकल सेंटर में मचाई थी भारी तबाही
यह खूनी वारदात 5 नवंबर 2009 को दोपहर करीब 1 बजे घटी थी। उस वक्त अमेरिकी मेजर के पद पर तैनात निदाल हसन दो पिस्तौलों के साथ टेक्सास के फोर्ट हुड सैन्य ठिकाने के भीतर स्थित चिकित्सा सुविधा केंद्र में दाखिल हुआ था। वहां मौजूद पूर्व एफबीआई निदेशक विलियम वेबस्टर के नेतृत्व में हुई आधिकारिक जांच के विवरण से साफ हुआ कि निदाल एक मेज पर चढ़ गया और एक धार्मिक नारा लगाने के बाद उसने दोनों हथियारों से ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।
इमारत के अंदर मची भगदड़ के दौरान जान बचाकर बाहर पार्किंग की तरफ भाग रहे जवानों पर भी उसने पीछे से गोलियां दागीं। इस भीषण नरसंहार में बारह अमेरिकी सैनिकों और अमेरिकी रक्षा विभाग के एक कर्मचारी सहित कुल 13 लोगों की जान चली गई थी, जबकि 32 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। गोलीबारी के दौरान मौके पर पहुंचे एक पुलिस अधिकारी की जवाबी गोली लगने से निदाल हसन भी घायल हो गया था, जिसके बाद से लकवाग्रस्त होने के कारण वह लगातार व्हीलचेयर पर ही है।
हमले की पूर्व तैयारी और अदालत का फैसला
जांचकर्ताओं को मौके से कुल 146 खाली कारतूस बरामद हुए थे, जबकि आरोपी के पास से 177 जिंदा कारतूस भी मिले थे। जांच रिपोर्ट के अनुसार, हसन ने इस हमले को अंजाम देने के लिए हफ्तों तक गहन अभ्यास किया था। उसने बेहद तेजी से मैगजीन बदलने का हुनर सीखा था, जिसके चलते हमले के समय उसे रोक पाना लगभग असंभव हो गया था।
सैन्य अदालत ने 28 अगस्त 2013 को निदाल हसन को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। सुनवाई की पूरी प्रक्रिया के दौरान हसन ने अपने बचाव में न तो कोई गवाह पेश किया और न ही अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करने की कोई कोशिश की। अदालत द्वारा नियुक्त उसके वकीलों ने यह भी खुलासा किया था कि वह खुद मौत की सजा पाना चाहता था। बाद में 2 अक्टूबर को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की सिफारिश पर ट्रंप ने इस सजा की तामील पर अंतिम मुहर लगा दी, जिसके बाद अमेरिकी सेना सचिव एडम टेले ने 3 दिसंबर को दोपहर 1 बजे का समय निर्धारित किया।
निदाल हसन की पृष्ठभूमि और सेना में विवाद
छप्पन वर्षीय निदाल मलिक हसन का जन्म अमेरिकी राज्य वर्जीनिया में हुआ था। उसके माता-पिता फलस्तीनी मूल के थे और यरूशलेम के निकट एक छोटे से कस्बे से आकर अमेरिका में बसे थे। हसन ने 1995 में स्नातक की पढ़ाई के दौरान अमेरिकी रिजर्व ऑफिसर्स ट्रेनिंग कॉर्प्स के साथ प्रशिक्षण लिया और फिर अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर अमेरिकी सेना में शामिल हो गया। उसने 2003 में मनोचिकित्सा की डिग्री हासिल की और 2005 में उसे चिकित्सा अभ्यास का लाइसेंस मिला।
वॉशिंगटन के आर्मी मेडिकल सेंटर में तैनाती के दौरान वह युद्ध से लौटे मानसिक रूप से अस्वस्थ सैनिकों का इलाज करता था। मैरीलैंड के इमाम फैजुल खान के अनुसार, हसन का झुकाव मजहब की ओर काफी गहरा था और वॉशिंगटन में रहने के दौरान वह प्रतिदिन नमाज अदा करने मस्जिद जाता था। हमले से करीब एक साल पहले, 17 दिसंबर 2008 को उसने अमेरिका के खिलाफ हिंसक जिहाद की वकालत करने वाले चरमपंथी मौलवी अनवर अल-अवलाकी को ईमेल भेजा था। संयुक्त आतंकवाद कार्यबल ने पाया कि 1 जनवरी 2009 से 16 जून के बीच दोनों के बीच 17 बार ईमेल पर संपर्क हुआ था, जबकि मौलवी ने भी दो संदेश भेजे थे। हालांकि, सेना की जांच एजेंसी की पूछताछ में उसके किसी आतंकी संगठन से सीधे जुड़े होने की पुष्टि उस समय नहीं हो सकी थी।
हसन को 15 जुलाई को फोर्ट हुड में तैनात किया गया था और अक्टूबर में यह तय हुआ कि अगले महीने उसे अफगानिस्तान भेजा जाएगा। वह अमेरिकी सेना द्वारा इराक और अफगानिस्तान में मुसलमानों के खिलाफ लड़े जाने वाले युद्धों का सख्त विरोधी था। उसके एक साथी के अनुसार, वह अक्सर कहता था कि मुसलमानों को हमलावरों के खिलाफ लड़ना चाहिए। इसके विपरीत, घटना के बाद उसके चचेरे भाई नादर हसन ने दावा किया था कि मध्य पूर्वी पहचान के कारण सेना में उसके साथ दुर्व्यवहार होता था। नादर के मुताबिक, निदाल ने सरकार के पैसे लौटाकर सेना छोड़ने के लिए एक सैन्य वकील भी नियुक्त किया था और यह घटना लगातार उत्पीड़न का नतीजा थी।
सीधे प्रसारण के फैसले पर भड़का अंतरराष्ट्रीय विवाद
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने 8 अक्टूबर को इस फैसले का बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि वर्दी में मौजूद एक इस्लामिक चरमपंथी ने सैनिकों पर हमला किया था, इसलिए सैनिकों का एक दस्ता ही उसे गोली मारकर सजा देगा। उन्होंने कहा कि इसे सार्वजनिक रूप से प्रसारित किया जाएगा ताकि लोग देख सकें और समझें कि ऐसे कृत्यों के परिणाम कितने गंभीर होते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या दोषी ने कोई अंतिम अपील की है, तो उन्होंने दो टूक कहा कि उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है और वे उससे 3 दिसंबर को मिलेंगे।
इस निर्णय की दुनिया भर में तीखी आलोचना हो रही है। ऑस्ट्रेलियाई वरिष्ठ स्तंभकार पॉल डेली ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पहली बार मौत की सजा को एक मनोरंजन की तरह पेश किया जा रहा है और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला देश नैतिक रूप से बेहद भयावह स्तर पर गिर गया है। ओआरएफ के सीनियर फेलो सुशांत सरीन ने इसकी तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका उसी रास्ते पर बढ़ रहा है जिस पर इस्लामिक स्टेट चलता था, और तालिबान की सार्वजनिक सजाओं की आलोचना करने वाला देश अब उससे भी आगे निकल गया है।
अमेरिका में मृत्युदंड का इतिहास और वर्तमान परिदृश्य
अमेरिका में आखिरी बार किसी नागरिक को खुलेआम सार्वजनिक तौर पर मृत्युदंड 90 साल पहले, 14 अगस्त 1936 को केंटकी में दिया गया था। तब 70 वर्षीय श्वेत महिला से दुष्कर्म के आरोप में 22 वर्षीय अश्वेत युवक रैनी बेथिया को फांसी दी गई थी। वहीं, अमेरिकी सेना में किसी सैनिक को मौत की सजा दिए जाने का आखिरी मामला 65 साल पहले 1961 का है, जब जॉन बेनेट नामक सैनिक को फायरिंग स्क्वाड ने गोली मारी थी।
अमेरिका के 50 राज्यों में से 27 राज्यों के साथ-साथ अमेरिकी सेना और संघीय सरकार में मृत्युदंड का प्रावधान है। संघीय सरकार ने 2020 में ट्रंप के पिछले कार्यकाल से पहले बीस वर्षों तक इस पर रोक लगा रखी थी। 2020 में उस रोक को हटाकर शुरुआती छह महीनों के भीतर 13 लोगों को मृत्युदंड दिया गया था। बाइडन प्रशासन के दौरान संघीय स्तर पर फिर से रोक लगी, लेकिन 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन ट्रंप ने इसे पुनः बहाल कर दिया।
संघीय स्तर पर फांसी, फायरिंग स्क्वाड, बिजली की कुर्सी और जहरीली गैस के जरिए सजा देने के नियम हैं, जबकि पहले जहरीले इंजेक्शन का भी उपयोग होता था। वर्तमान में इडाहो, मिसिसिपी, ओक्लाहोमा, साउथ कैरोलिना और यूटा में फायरिंग स्क्वाड के जरिए मौत की सजा दी जाती है। साउथ कैरोलिना में पिछले साल पंद्रह साल में पहली बार किसी दोषी को गोली मारी गई थी। जहां 2024 में विभिन्न अमेरिकी राज्यों में 25 लोगों को मृत्युदंड मिला था, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 47 हो गई और 2026 में अब तक 19 लोगों को मृत्युदंड दिया जा चुका है।
दुनिया भर में सार्वजनिक मृत्युदंड की स्थिति
वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर केवल तीन देश—ईरान, अफगानिस्तान और उत्तर कोरिया—ऐसे हैं जहां आधिकारिक रूप से सार्वजनिक मृत्युदंड दिया जाता है। ईरान में सड़क के बीच क्रेन से लटकाकर फांसी दी जाती है, जहां 2025 में कम से कम 11 लोगों को इस तरह सजा दी गई। अफगानिस्तान में तालिबान लड़ाके मैदान में कतार में खड़ा करके लोगों को गोली मारते हैं, जहां 2025 में कम से कम छह लोगों को मारा गया। उत्तर कोरिया में तानाशाह किम जोंग के आदेशों पर सार्वजनिक सजाएं दी जाती हैं।
सऊदी अरब में गंभीर अपराधों के लिए सिर कलम करने की प्रथा पहले थी जो अब बंद हो चुकी है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के आंकड़ों के अनुसार, अफगानिस्तान, चीन, उत्तर कोरिया, सऊदी अरब, सोमालिया, ताइवान, संयुक्त अरब अमीरात और यमन में गोली मारकर मौत की सजा दी जाती है। भारत के संदर्भ में बात करें तो आम अपराधियों को जेल के भीतर फांसी दी जाती है, जबकि सैन्य अपराधियों के मामले में सैन्य अदालत यह तय कर सकती है कि दोषी को फांसी दी जाएगी या फिर गोली मारी जाएगी।



















