कोलकाता का पॉश पार्क स्ट्रीट इलाका हमेशा से अपनी आधुनिक जीवनशैली, खान-पान के मशहूर ठिकानों, रोशन रास्तों और पश्चिमी संगीत के लिए जाना जाता रहा है। क्रिसमस और नए साल के जश्न के केंद्र माने जाने वाले इस इलाके की सांस्कृतिक छवि अब एक ऐतिहासिक मोड़ ले रही है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद पहली बार इस इलाके में सार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है। एलन पार्क परिसर में तांडव थीम पर आधारित विशाल पंडाल बनाया जा रहा है, जिससे इलाके का पूरा माहौल बदल चुका है। हालांकि इस नई शुरुआत के साथ ही डीजे संगीत पर पूरी तरह रोक, महाअष्टमी के दिन शराब की दुकानों को बंद रखने का सरकारी आदेश और सुरक्षा के लिए 20,000 सिविक वॉलंटियर्स की तैनाती जैसे कदमों ने शहर भर में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
एलन पार्क में तांडव थीम पंडाल और संगीत पाबंदियों पर सवाल
पार्क स्ट्रीट स्थित एलन पार्क के एक तरफ चहल-पहल भरा बाजार है और दूसरी तरफ बिशप हाउस का परिसर मौजूद है। इसके आसपास के रिहाइशी इलाकों में लंबे समय से एंग्लो-इंडियन, यहूदी और मुस्लिम समुदाय के परिवार रहते आए हैं। पंडाल में स्थापित की जाने वाली देवी दुर्गा की प्रतिमा पहले ही बनकर तैयार हो चुकी है। पंडाल में मौजूद फैशन डिजाइन की छात्रा कोनिका गोस्वामी ने कहा कि जब यहां क्रिसमस धूमधाम से मनाया जाता है, तो दुर्गा पूजा का आयोजन होने में कोई बुराई नहीं है। हालांकि वह पंडालों में डीजे संगीत बजाने पर लगाए गए सरकारी प्रतिबंध से असहमत हैं। कोनिका गोस्वामी का कहना है कि दुर्गा पूजा बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव है और इस पर किसी भी तरह की बंदिश लगाना सही नहीं है। उनका सवाल है कि जब गणेश पूजा और विश्वकर्मा पूजा के दौरान डीजे बजाया जा सकता है, तो फिर दुर्गा पूजा के समय इस पर रोक क्यों लगाई जानी चाहिए।
370 वर्षों की प्रतीक्षा और अनुमति मिलने का राजनीतिक सफर
एलन पार्क में इस ऐतिहासिक दुर्गा पूजा का आयोजन कोलकाता सनातनी संघ समिति की ओर से कराया जा रहा है। समिति के महासचिव नवीन मिश्रा ने बताया कि पार्क स्ट्रीट क्षेत्र में लगभग 95% आबादी हिंदू है, फिर भी लंबे समय तक यहां पूजा की अनुमति नहीं मिल सकी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 और 2017 में स्थानीय थाने में अनुमति के लिए अर्जी दी गई थी, लेकिन प्रशासन ने इसे मंजूरी नहीं दी। नवीन मिश्रा का कहना है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, वाममोर्चा और ममता बनर्जी की सरकारों के दौर में यहां दुर्गा पूजा नहीं हो पाई। ममता सरकार के समय अनुमति खारिज होने के बाद ही यह संकल्प लिया गया था कि जब अपनी सरकार आएगी, तब यहां पूजा जरूर होगी। उनके अनुसार पार्क स्ट्रीट में दुर्गा पूजा को लाने में 370 साल का लंबा वक्त लग गया है। तैयारियों के बारे में जानकारी देते हुए नवीन मिश्रा ने बताया कि चतुर्थी के दिन मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी इस पंडाल का उद्घाटन कर सकते हैं, जबकि बाकी सभी धार्मिक अनुष्ठान पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ही संपन्न होंगे।
मांसाहार की परंपरा और महाअष्टमी पर शराबबंदी पर छिड़ी बहस
पिछले महीने कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री ने बंगाल के लोगों से दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन न करने की अपील की थी, जिसके बाद पूरे राज्य में सांस्कृतिक खान-पान को लेकर जोरदार बहस शुरू हो गई। यद्यपि सरकार की ओर से मांसाहार पर कोई आधिकारिक रोक नहीं लगाई गई है, लेकिन विहिप ने पूजा आयोजकों से पंडालों के पास मांसाहारी व्यंजनों के स्टॉल न लगाने का आग्रह किया है। इसके अलावा सरकार ने महाअष्टमी के दिन शराब की सभी दुकानें बंद रखने का कड़ा आदेश जारी किया है। पार्क स्ट्रीट में काम करने वाले डोल चक्रवर्ती और सोनल गुप्ता शराबबंदी के इस फैसले का विरोध करते हैं। उनका कहना है कि जिन्हें शराब पीनी है वे पहले से जमाखोरी कर लेंगे, जिससे कालाबाजारी को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकांश बंगालियों के लिए मांसाहार दुर्गा पूजा के उत्सव का अभिन्न हिस्सा है, जहां पूरे त्योहार के दौरान तरह-तरह के व्यंजन बनाए और बेचे जाते हैं। हालांकि वे रेड रोड कार्निवल के रद्द होने से खुश हैं, क्योंकि कार्निवल के कारण रास्ते बंद होने से दफ्तर आने-जाने वालों को भारी परेशानी होती थी।
मटन, हिल्सा मछली और सांस्कृतिक कार्निवल को लेकर नाराजगी
सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी अमिताभ मजूमदार का मानना है कि इस साल की दुर्गा पूजा का स्वरूप काफी बदला हुआ महसूस हो रहा है। उन्होंने कहा कि कई लोग सरकार के इन फैसलों से असंतुष्ट हैं लेकिन खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। उनके अनुसार बंगालियों के लिए दुर्गा पूजा का सीधा मतलब मटन और इलिश माछ (हिल्सा) से है, जिसके बिना पूरे उत्सव का रंग अधूरा रह जाता है। अमिताभ मजूमदार ने राज्य के पारंपरिक कार्निवल को रद्द किए जाने पर भी निराशा जताई। उन्होंने कहा कि बंगाल का यह कार्निवल दुनिया भर में मशहूर था और हमारी संस्कृति को दूर-दूर तक पहुंचाता था, इसलिए इसे रद्द नहीं किया जाना चाहिए था और यह एक राजनीतिक फैसला प्रतीत होता है। वहीं नेटवर्किंग कंपनी में कार्यरत शीला डे का कहना है कि त्योहार के दिनों में खान-पान पर किसी भी तरह की बंदिशें नहीं होनी चाहिए, क्योंकि मां दुर्गा साल में एक बार घर आती हैं और यह पूरा समय खुशियां मनाने का है। हालांकि सरकार ने 21 से 24 अक्टूबर तक प्रतिमा विसर्जन के लिए चार दिनों का समय तय किया है, जिसका शीला डे ने स्वागत करते हुए कहा कि इससे विसर्जन सम्मानजनक तरीके से हो सकेगा।
दुकानदारों की दुविधा और आरएसएस स्वयंसेवकों की निगरानी
दुर्गा पूजा के दौरान विभिन्न समुदायों के लोग प्रतिमा निर्माण और दुकानों के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने इस संबंध में किसी भी टिप्पणी से इनकार कर दिया। वहीं नाम न छापने की शर्त पर एक मांसाहारी फूड स्टॉल संचालक ने बताया कि वह पंडाल के पास स्टॉल लगाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन छिड़े विवाद को देखते हुए उसने अपना इरादा बदल दिया क्योंकि वह किसी भी तरह के विवाद में नहीं पड़ना चाहता। आरएसएस के एक सूत्र ने बताया कि प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमाओं के निकट शराब और मांसाहारी भोजन का होना उचित नहीं है, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि किसी पर भी कोई जबरदस्ती नहीं की जा रही है। भोजन और पेय पदार्थों को लेकर किसी भी प्रकार के टकराव को रोकने के लिए संघ के स्वयंसेवक पूरी तरह सक्रिय रहेंगे। इसके अलावा आरएसएस ने पूजा पंडालों के बाहर अपने काम और स्वयंसेवकों से जुड़ी किताबों के स्टॉल लगाने की भी योजना बनाई है।
45 हजार क्लबों को 1-1 लाख रुपये की मदद और श्रीभूमि का बदलाव
पश्चिम बंगाल में करीब 45,000 पाड़ा क्लब दुर्गा पूजा का आयोजन करते हैं, जिनमें से 3,000 क्लब अकेले कोलकाता में हैं। इस वर्ष भाजपा सरकार ने प्रत्येक क्लब को ₹1 लाख की आर्थिक सहायता और मुफ्त बिजली देने की घोषणा की है। कोलकाता का श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब हमेशा से बुर्ज खलीफा और हवा महल जैसी भव्य थीम वाले पंडालों के लिए प्रसिद्ध रहा है। पूर्व तृणमूल कांग्रेस मंत्री सुजीत बोस इस क्लब के संरक्षक थे और वर्तमान में नगर पालिका भर्ती घोटाले के मामले में जेल में बंद हैं। अब इस क्लब का प्रबंधन भाजपा से जुड़े सदस्यों के हाथों में आ चुका है। इस साल यह पंडाल चतुर्थी से आम लोगों के लिए खोला जाएगा और मां दुर्गा की प्रतिमा को सोने या चांदी के जेवर नहीं पहनाए जाएंगे। क्लब के अध्यक्ष कनक देबनाथ ने स्पष्ट किया कि यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि आम श्रद्धालु आसानी से दर्शन कर सकें और पुष्पांजलि अर्पित कर सकें, क्योंकि पहले भारी भीड़ के चलते आम लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी।
पंडालों से 100 मीटर दूर स्टॉल लगाने का निगम का नया सुरक्षा नियम
कोलकाता नगर निगम ने आग से सुरक्षा के नियमों का हवाला देते हुए निर्देश दिया है कि खाने-पीने और अन्य सामान के सभी स्टॉल दुर्गा पूजा पंडालों से कम से कम 100 मीटर की दूरी पर लगाए जाएं। इस नियम से गोलगप्पे, झालमुड़ी और खिलौने बेचने वाले छोटे रेहड़ी-पटरी वालों की आजीविका पर सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि मुख्य प्रवेश द्वार से 100 से 200 मीटर दूर होने पर ग्राहकों की संख्या में भारी गिरावट आ सकती है। जादवपुर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर विकास दीक्षित का कहना है कि दुर्गा पूजा का समय स्ट्रीट वेंडर्स के लिए अतिरिक्त आय कमाने का बहुत बड़ा जरिया होता है। पंडाल घूमने आने वाले लोग अक्सर रास्ते में ही इन छोटे दुकानदारों से खान-पान की चीजें खरीदते हैं। अगर स्टॉल दूर कर दिए गए तो लोग वहां रुकने के बजाय सीधे घर लौटने या बड़े रेस्तरां में जाना पसंद कर सकते हैं। हालांकि प्रशासन इन नए नियमों को कितनी सख्ती से लागू करेगा, यह स्थिति अभी पूरी तरह साफ नहीं है।
दुर्गा पूजा बनाम 'शारदोत्सव' के नामकरण पर छिड़ा सियासी संग्राम
त्योहार के नाम को लेकर भी राज्य में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भाजपा प्रवक्ता देबजीत सरकार का कहना है कि ममता सरकार के शासनकाल में आयोजकों को हर पूजा से पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता था, जबकि इस साल का आयोजन बेहद भव्य और व्यवस्थित पैमाने पर हो रहा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सभी पंडालों से अपील की है कि वे 'शारदोत्सव' के बजाय स्पष्ट रूप से 'दुर्गा पूजा' शब्द का इस्तेमाल करें। देबजीत सरकार ने तर्क दिया कि जब अन्य धर्मों के त्योहारों को उत्सव नहीं कहा जाता, तो फिर दुर्गा पूजा को भी उत्सव का नाम नहीं दिया जाना चाहिए। इसके विपरीत माकपा नेता सृजन भट्टाचार्य ने इस विचार से असहमति जताई है। सृजन भट्टाचार्य का कहना है कि बंगाली समाज हर समुदाय के साथ मिलकर इसे एक साझा त्योहार के रूप में मनाता आया है और इसे शारदोत्सव कहना बंगाल की समावेशी परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 'शारदा' स्वयं देवी दुर्गा का ही एक नाम है, इसलिए शारदोत्सव का सीधा अर्थ देवी शारदा का पावन उत्सव ही होता है।



















