कार्यस्थलों पर समानता के दावों के बीच तकनीकी और मीडिया जगत के भीतर महिलाओं को आज भी लगातार सूक्ष्म और प्रत्यक्ष लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। पेशेवर जगत में पिछले सत्रह वर्षों के अनुभवों पर नजर डालें तो नेतृत्व पदों पर पहुंचने के बावजूद महिलाओं के अधिकार, गरिमा और स्वीकार्यता पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। एक समय तकनीकी क्षेत्र में दूरदर्शी प्रतिभाओं की बात करते समय नेतृत्व का श्रेय लगभग पूरी तरह पुरुषों को ही दिया जाता था। वर्ष 2010 में सामने आए एक विश्लेषण में पाया गया था कि वर्ष 1993 से लेकर उस समय तक प्रमुख तकनीकी प्रकाशनों के 70 कवर पृष्ठों पर पुरुषों को स्थान मिला था, जबकि पेशेवर उपलब्धियों के लिए महिलाओं को केवल चार कवर पृष्ठों पर ही जगह दी गई थी। शुरुआती दौर में कार्यालयों के भीतर महिला संपादकों की भारी कमी रही और कपड़ों के चयन से लेकर पेशेवर उपस्थिति तक पर पुरुष अधिकारियों द्वारा अनुचित टिप्पणियां की जाती थीं।
वेतन असमानता और मातृत्व को लेकर होने वाली असहज टिप्पणियां
करियर में आगे बढ़ने के दौरान पेशेवर महिलाओं को बार-बार ऐसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है जहां उनकी क्षमता के बजाय उनके लिंग और पारिवारिक निर्णयों को निशाना बनाया जाता है। जब एक पेशेवर महिला ने बच्चे पैदा करने की इच्छा जाहिर की, तो एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह कहकर खारिज कर दिया कि वह माता-पिता बनने के लिहाज से बहुत सख्त या भावनाहीन नजर आती हैं। कुछ वर्षों बाद जब वह एक अन्य कार्यालय में गर्भावस्था की स्थिति में थीं, तो एक नियोक्ता ने यहां तक अनुचित टिप्पणी कर दी कि इतनी गंभीर महिला अपने बच्चे को अलमारी में बंद रखेगी।
इतना ही नहीं, वेतन के मामले में भी खुला भेदभाव देखने को मिला, जहां एक नियोक्ता ने पूर्ववर्ती पुरुष सहयोगी की तुलना में बेहद कम वेतन देने की कोशिश की और इसके पीछे तर्क दिया कि महिला सहकर्मी उम्र में छोटी हैं और उनमें अधिकार या प्रभाव की कमी है। महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने के नाम पर चलाए जाने वाले कार्यक्रमों की वास्तविकता भी कई बार विरोधाभासी रही, जहां उभरती महिला अधिकारियों के लिए तैयार किए गए आंतरिक कार्यक्रमों का संचालन पूरी तरह पुरुष प्रबंधकों के हाथों में सौंप दिया गया।
नेतृत्व में सफलता और श्रेय छीनने की संस्कृति
शीर्ष पदों पर पहुंचने के बाद भी महिला अधिकारियों की मेहनत और उपलब्धियों का श्रेय दूसरों के खाते में डालने की प्रवृत्ति आम रही है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान एक प्रमुख विचार मंच के पुरुष नेता ने वर्तमान महिला प्रमुख के कार्यकाल की सफलताओं का पूरा श्रेय पूर्व पुरुष संपादक को दे दिया। इसके अलावा वर्ष 2024 के चुनाव के बाद मतभेदों के चलते संस्थान के एक सह-संस्थापक ने संपादकीय सामग्री पर नाराजगी जताते हुए ईमेल के जरिए बेहद आपत्तिजनक और हिंसक रूपक वाली टिप्पणी तक कर दी थी।
सार्वजनिक अभिलेखों में भी महिलाओं की ऐतिहासिक उपलब्धियों को नजरअंदाज करने के मामले सामने आए। वर्ष 2023 में एक वैश्विक संपादकीय निदेशक की नियुक्ति पर द न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें उन्हें प्रकाशन चलाने वाली पहली महिला करार दिया गया था। हालांकि बाद में सुधार जारी करते हुए स्पष्ट करना पड़ा कि कैटरीना हेरॉन ने वास्तव में वर्ष 1997 से 2001 तक इस प्रमुख प्रकाशन का संचालन किया था। यह घटना दिखाती है कि संस्थागत इतिहास में भी अग्रणी महिलाओं के योगदान को कितनी आसानी से भुला दिया जाता है।
लैंगिक पूर्वाग्रहों के मानसिक और व्यावहारिक दुष्प्रभाव
लगातार मिलने वाले लैंगिक पूर्वाग्रहों और दबावों का महिलाओं के आत्मविश्वास और पेशेवर निर्णयों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। कई बार महिलाएं यह सोचने पर मजबूर हो जाती हैं कि उन्हें कोई पद उनकी योग्यता के कारण मिला है या फिर किसी तय कोटे को पूरा करने के लिए चुना गया है। निरंतर खुद पर संदेह करना और हर बात पर माफी मांगने की आदत विकसित होना इसके सामान्य परिणाम हैं। कार्यस्थल पर किसी का अनुचित ध्यान आकर्षित न हो, इसके लिए कई वर्षों तक जानबूझकर साधारण या लापरवाह ढंग से कपड़े पहनने जैसी रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं।
कार्यस्थल पर पुरुषों जैसा सम्मान पाने के लिए कई बार महिलाओं को अपनी स्वाभाविक कार्यशैली छोड़कर ज्यादा आक्रामक, तेज और कम संवेदनशील बनने का दबाव महसूस होता है। हालांकि जब मुख्यधारा की श्वेत महिलाओं को इस स्तर के तनाव और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो अश्वेत, समलैंगिक या ट्रांसजेंडर महिलाओं के लिए यह संघर्ष कहीं अधिक विकट और बहुस्तरीय हो जाता है।
सिलिकॉन वैली में पुरुष प्रधान सत्ता और वर्तमान परिदृश्य
सैन फ्रांसिस्को में तकनीकी और वैज्ञानिक जगत में महिलाओं की प्रगति की धीमी रफ्तार को रेखांकित करने के लिए एक विशेष महिला केंद्रित संस्करण की योजना पर चर्चा शुरू हुई। वर्ष 2026 में पूरे एक अंक को महिलाओं के मुद्दों पर केंद्रित करने का विचार कई लोगों को अनावश्यक लग सकता है, क्योंकि तकनीकी दुनिया में कई लोग यह मानने लगे हैं कि लैंगिक असमानता अब कोई वास्तविक मुद्दा नहीं रह गई है।
हालाँकि वर्तमान राजनीतिक और कॉर्पोरेट परिदृश्य इस दावे को खारिज करता है। व्हाइट हाउस में सत्ता के शीर्ष पर यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्ति की मौजूदगी और तकनीकी कंपनियों के प्रमुख सलाहकारों में लगभग पूरी तरह पुरुषों का दबदबा इस बात का संकेत है कि शक्ति संतुलन में अब भी गहरा असंतुलन है। सिलिकॉन वैली में महिलाओं के पास पद जरूर हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश अब भी शीर्ष पुरुष नेतृत्व के निर्णयों के अधीन काम करती हैं। जब मार्क जुकरबर्ग अपने कर्मचारियों में मर्दाना ऊर्जा की कमी पर चिंता व्यक्त करते हैं, पीट हेगसेथ सेना के बहुत अधिक जनाना होने की बात कहते हैं, और एलन मस्क के नेतृत्व में डीओजीई की कटौती का सबसे बड़ा असर अश्वेत महिला सिविल सेवकों पर पड़ता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था से महिलाओं की प्रभावी मौजूदगी को ही मिटाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे माहौल में अगली पीढ़ी के लिए अधिक सुरक्षित, निष्पक्ष और सम्मानजनक कार्यस्थल तैयार करना एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।



















