पत्रकार शुभंकर मिश्रा के साथ एक पॉडकास्ट साक्षात्कार के दौरान पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा दी गई कथित प्रतिक्रिया ने संसद हमले के दोषी अफजल गुरु से जुड़े विवाद को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। वर्ष 2001 में लोकतांत्रिक संस्था पर हुए भीषण आतंकी हमले की साजिश में अफजल गुरु को दोषी ठहराया गया था और वर्ष 2013 में उसे फांसी दी गई थी। अंसारी के बयान ने भारतीय राजनीति के उस संवेदनशील पहलू को ताजा कर दिया है, जिस पर विभिन्न राजनीतिक दलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों के विचार लंबे समय से विभाजित रहे हैं।
13 दिसंबर 2001 का संसद हमला और सुरक्षा से जुड़े बुनियादी सवाल
राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में 13 दिसंबर 2001 को हुआ हमला देश के हालिया इतिहास की सबसे गंभीर सुरक्षा घटनाओं में गिना जाता है। जिस वक्त संसद की कार्यवाही चल रही थी, उसी दौरान पांच भारी हथियारों से लैस हमलावरों ने संसद परिसर में घुसकर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी थी। सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई में हमलावरों को मार गिराया, लेकिन इस अप्रत्याशित वारदात ने खुफिया तंत्र की तैयारियों, संसद भवन परिसर की सुरक्षा व्यवस्था और तात्कालिक सरकारी प्रतिक्रिया पर गहरे सवाल खड़े कर दिए थे।
उस दौर में जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने उन दावों का खंडन किया था जिनमें कहा गया था कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री से अफजल गुरु के लिए दया की मांग करने का अनुरोध किया था। हालांकि, वर्ष 2006 में गुलाम नबी आजाद ने स्पष्ट किया था कि वह व्यक्तिगत रूप से किसी को भी मृत्युदंड दिए जाने के खिलाफ हैं।
जांच के साक्ष्य, अदालती फैसले और बचाव पक्ष की आपत्तियां
हमले की साजिश में अफजल गुरु की सक्रिय भूमिका को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कानूनी और तकनीकी साक्ष्यों को अदालत के सामने पेश किया। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2002 में अफजल गुरु को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2003 में इस फैसले को बरकरार रखा और 4 अगस्त 2005 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी निचली अदालतों द्वारा दिए गए मृत्युदंड पर अंतिम मुहर लगा दी।
जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए टेलीफोन रिकॉर्ड से पता चला था कि हमले से ठीक पहले अफजल गुरु और हमलावरों में से एक के बीच संपर्क हुआ था। इसके अतिरिक्त अन्य साक्ष्यों से यह स्थापित हुआ कि हमलावरों द्वारा इस्तेमाल किए गए ठिकानों, आतंकी सामग्री की खरीद और फर्जी पहचान पत्र तथा गृह मंत्रालय के जाली स्टिकर तैयार करने में प्रयुक्त लैपटॉप के तार अफजल गुरु से जुड़े थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सभी कड़ियों और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि साजिश में उसकी संलिप्तता संदेह से परे सिद्ध होती है।
दूसरी तरफ, अफजल गुरु ने आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा / POTA) के तहत दर्ज अपने इकबालिया बयान को चुनौती दी थी और निचली अदालत में अपने कानूनी प्रतिनिधित्व पर गंभीर सवाल उठाए थे। हालांकि शीर्ष अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया कि कमजोर कानूनी सहायता की वजह से ट्रायल निष्पक्ष नहीं रहा। अदालत ने इसी मुकदमे में अन्य आरोपियों के साक्ष्यों का अलग-अलग मूल्यांकन किया, जिसके तहत एसएआर गिलानी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया, जबकि शौकत हुसैन गुरु की सजा घटाकर दस साल की कैद में बदल दी गई। यह कानूनी अंतर रेखांकित करता है कि न्यायपालिका ने प्रत्येक आरोपी के विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्यों की स्वतंत्र पड़ताल की थी।
फांसी की प्रक्रिया, सामूहिक चेतना और उठे विवाद
अफजल गुरु को 9 फरवरी 2013 को फांसी पर लटका दिया गया। इस क्रियान्वयन के बाद मृत्युदंड की प्रासंगिकता, न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और सरकार द्वारा दया याचिका के निपटारे के तौर-तरीकों पर तीखे सवाल उठे। कई कानूनी विश्लेषकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने यह मुद्दा उठाया कि क्या अफजल गुरु को ट्रायल कोर्ट में पर्याप्त और प्रभावी कानूनी सहायता मिली थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में मृत्युदंड की व्याख्या करते हुए समाज की 'सामूहिक चेतना' (कलेक्टिव कॉन्शियस) का उल्लेख किया था। आलोचकों ने इस पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया कि जनता के गुस्से या सार्वजनिक भावनाओं के आधार पर किसी के जीवन या मृत्यु का निर्धारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, फांसी के समर्थकों का दृढ़ मत था कि संसद पर हुआ हमला भारत की संप्रभुता पर सीधा प्रहार था, इसलिए ऐसी जघन्य आतंकी साजिश के लिए मृत्युदंड पूरी तरह उचित था।
इस पूरे मामले में एक बड़ा विवाद यह भी बना कि फांसी से पहले अफजल गुरु के परिजनों को उससे अंतिम मुलाकात का अवसर नहीं दिया गया और न ही उसका पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए परिवार को सौंपा गया। यद्यपि प्रक्रियागत सवालों से यह साबित नहीं होता कि दोषसिद्धि गलत थी, क्योंकि किसी को झूठा फंसाए जाने के दावों के लिए पुख्ता कानूनी साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।
छात्र राजनीति और राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक विभाजन
अफजल गुरु की फांसी और उसकी टाइमिंग को लेकर विभिन्न राजनीतिक खेमों में स्पष्ट वैचारिक मतभेद देखने को मिले। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी / BJP) से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी / ABVP) ने अफजल गुरु की फांसी के विरोध में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों का कड़ा विरोध किया और वहां कथित रूप से लगे देशविरोधी नारों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की।
वहीं, कार्यक्रम आयोजित करने वाले डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (डीएसयू / DSU) के पूर्व सदस्यों ने इस फांसी को 'न्यायिक हत्या' करार दिया था। इसके समानांतर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू / JNUSU) ने विश्वविद्यालय को स्वतंत्र बहस और विमर्श का मंच बताते हुए लोकतांत्रिक दायरे का बचाव किया, हालांकि उसने भी गैर-लोकतांत्रिक नारों की निंदा की। ये विवाद दर्शाते हैं कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, न्याय प्रणाली, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक रुख के टकराव का स्थायी मुद्दा बन गया।
हामिद अंसारी का रुख और पुराने बयानों की गूंज
पॉडकास्ट में हामिद अंसारी द्वारा अफजल गुरु से जुड़े सवाल पर 'आई डोंट नो' (मुझे नहीं पता) कहना इस बात को उजागर करता है कि किसी आतंकी मामले में न्यायिक प्रक्रिया की आलोचना और उसके राजनीतिक प्रभाव के बीच की रेखा कितनी संवेदनशील है। चूंकि अफजल गुरु का मामला कश्मीर, न्याय और मृत्युदंड के व्यापक संदर्भों से जुड़ा है, इसलिए इस पर कोई भी टिप्पणी तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया को जन्म देती है।
पूर्व में भी कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर ने इस फांसी पर सवाल खड़े किए थे। फरवरी 2013 में फांसी दिए जाने के दो साल बाद केरल से सांसद शशि थरूर ने इसे 'गलत और बेहद खराब तरीके से संभाला गया' कदम बताया था। थरूर की यह टिप्पणी इसलिए बेहद अहम मानी गई क्योंकि जिस समय अफजल गुरु को फांसी दी गई थी, उस समय केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए (UPA) की ही सरकार थी। उनका मुख्य विरोध फांसी की प्रक्रियागत गोपनीयता और परिवार के साथ किए गए व्यवहार को लेकर था।
इसके अलावा, जम्मू और कश्मीर में कांग्रेस के पांच विधायकों ने एक साझा बयान पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें फांसी को 'गलती' बताते हुए अफजल गुरु के अवशेष परिवार को सौंपने की मांग की गई थी। उस दौरान यह आरोप भी लगा था कि निर्दलीय विधायक इंजीनियर रशीद ने अपने वोट के बदले कांग्रेस पर अफजल गुरु से जुड़े इस बयान पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया था।
कानूनी पहलुओं पर मानवाधिकार वकील नंदिता हक्सर ने वर्ष 2006 में 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' को दिए एक साक्षात्कार में निचली अदालत के भीतर अफजल गुरु के कानूनी प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता पर सवाल उठाया था। नंदिता हक्सर का तर्क था कि निचली अदालत में अफजल गुरु को अपनी पसंद का वकील चुनने का पूरा अवसर मिलना चाहिए था। इसके साथ ही उन्होंने समग्र रूप से मृत्युदंड की व्यवस्था को समाप्त करने की वकालत करते हुए कहा था कि पहले मृत्युदंड की सजा पर रोक लगाई जानी चाहिए।



















