देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित करने की कवायद अब नीतिगत चर्चाओं से आगे बढ़कर संसदीय मंथन के महत्वपूर्ण दौर में प्रवेश कर चुकी है। संसद की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी 'एक देश, एक चुनाव' की रूपरेखा की व्यावहारिक संभावनाओं की बारीकी से पड़ताल कर रही है। अब तक इस समिति की 25 बैठकें आयोजित हो चुकी हैं, जबकि 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जमीनी स्तर पर प्रारंभिक विचार-विमर्श का काम पूरा किया जा चुका है। विचार यह बन रहा है कि वर्ष 2029 के आम चुनावों के साथ उन राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी करा लिए जाएं जो इसके लिए अपनी सहमति व्यक्त करेंगे।
समिति की कमान संभाल रहे भारतीय जनता पार्टी के सांसद पीपी चौधरी के अनुसार यदि संसद संबंधित विधेयक को पारित कर देती है, तो वर्ष 2029 से इस व्यवस्था को लागू करने में कोई प्रशासनिक बाधा नहीं आएगी। निर्वाचन आयोग का रुख भी इस संदर्भ में सकारात्मक माना जा रहा है, जिसका मानना है कि यदि 2028 तक कानूनी आधार तैयार हो जाए तो छह महीने के भीतर सभी तकनीकी और संगठनात्मक तैयारियां पूरी की जा सकती हैं। हालांकि, चुनावी प्रक्रियाओं के संचालन का लंबा अनुभव रखने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी इस समयसीमा को अत्यधिक संक्षिप्त मानते हैं। उनका स्पष्ट मत है कि इतने व्यापक स्तर पर मतदान कराने के लिए कम से कम दो से तीन साल के व्यवस्थित समय की दरकार होगी, क्योंकि बिना किसी जादुई छड़ी के इतने कम समय में मशीनरी तैयार करना संभव नहीं है।
41 सदस्यीय संसदीय समिति की कार्यप्रणाली और सर्वसम्मति का प्रयास
इस ऐतिहासिक सुधार की पड़ताल कर रही संयुक्त संसदीय समिति में कुल 41 सदस्य शामिल हैं। इनमें 27 सदस्य लोकसभा से, 12 सदस्य राज्यसभा से और दो विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में जुड़े हैं। समिति अपनी रिपोर्ट कब सौंपेगी, इस सवाल पर पीपी चौधरी का कहना है कि इसके लिए कोई निश्चित या बंधी-बंधाई समयसीमा तय नहीं की गई है। जब तक समिति के सभी सदस्यों के बीच व्यापक चर्चा नहीं हो जाती और किसी ठोस मसौदे पर आम सहमति नहीं बन जाती, तब तक अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की जाएगी।
समिति का जोर इस बात पर है कि देश के संघीय ढांचे के हर हिस्से की राय को दस्तावेज में जगह दी जाए। यही वजह है कि समिति जब भी किसी राज्य का दौरा करती है, तो वहां के लिए पहले से एक विस्तृत और सुनियोजित एजेंडा तैयार किया जाता है। प्रत्येक दौरे के दौरान कम से कम 500 प्रमुख लोगों और प्रतिनिधियों से सीधे संवाद का लक्ष्य रखा जाता है, ताकि समाज के हर वर्ग की चिंताओं को समझा जा सके। जिन हितधारकों को चर्चा के लिए आमंत्रित किया जाता है, उन्हें बातचीत के विषय और प्रारूप के बारे में काफी पहले सूचित कर दिया जाता है ताकि विमर्श तथ्यपरक हो सके।
इन संवाद बैठकों में राज्यों के संवैधानिक प्रमुख यानी राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री और विभिन्न दलों के विधायक शामिल होते हैं। इसके साथ ही विपक्षी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, पद्म भूषण जैसे राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत गणमान्य व्यक्तियों और मीडिया जगत के वरिष्ठ पत्रकारों से भी विचार जाने जा रहे हैं। नागरिक समाज के प्रबुद्ध नागरिकों और देश के प्रमुख व्यापारिक संगठनों जैसे फिक्की और एसोचैम के प्रतिनिधियों को भी चर्चा में शामिल किया गया है ताकि आर्थिक पहलुओं की जमीनी हकीकत सामने आ सके।
सहमति वाले राज्यों के लिए 2029 और शेष के लिए 2034 का द्वि-चरणीय मॉडल
संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने व्यवस्था को लागू करने के लिए एक व्यावहारिक फॉर्मूले का संकेत दिया है। उनका कहना है कि इस समय समिति यह आकलन कर रही है कि कौन से राज्य अपनी मर्जी से साथ आने को तैयार हैं और किन राज्यों को इस पर आपत्तियां हैं। जो राज्य अपनी सहमति देंगे, उनकी विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त करके उन्हें 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ दिया जाएगा। इसके बाद जो राज्य इस पहले चरण में शामिल नहीं होंगे, उन्हें 2034 के अगले चक्र में इस व्यवस्था के दायरे में लाया जाएगा, जहां उन्हें नियमों के तहत एक साथ चुनाव प्रणाली को अपनाना होगा।
चौधरी का तर्क है कि इस पूरी समस्या का वास्तविक समाधान राज्य सरकारों के रुख में ही निहित है। यदि राज्य सरकारें सहमत हो जाती हैं, तो 2029 में ही लोकसभा और कई राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं। इस समय देश के 22 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी या उसके सहयोगी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की सरकारें हैं। ऐसे में इन 22 राज्यों का समर्थन हासिल करना अपेक्षाकृत सरल माना जा रहा है, लेकिन गैर-एनडीए शासित बाकी राज्यों को राजी करना एक बड़ी राजनीतिक और कानूनी चुनौती बना हुआ है। इसी कारण यह विकल्प खुला रखा गया है कि एनडीए शासित राज्यों से 2029 में शुरुआत की जाए और शेष राज्यों को 2034 के चुनाव चक्र में पूरी तरह शामिल किया जाए।
पहाड़ी राज्य उत्तराखंड ने इस पहल का पुरजोर समर्थन किया है। राज्य सरकार का पक्ष है कि अलग-अलग समय पर चुनाव कराने से पर्वतीय इलाकों में प्रशासनिक और सुरक्षा तंत्र पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। उत्तराखंड के कई सुदूरवर्ती गांवों तक पोलिंग पार्टियों को पहुंचने में दो से तीन दिन की कठिन पैदल यात्रा करनी पड़ती है और वापसी में भी उतना ही समय लगता है। ऐसे में बार-बार चुनाव होने से भारी संसाधन खर्च होते हैं, जबकि दोनों चुनाव एक साथ कराने से इन विषम भौगोलिक परिस्थितियों में बड़ी राहत मिलेगी।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं: कहीं खुला समर्थन तो कहीं कड़ा विरोध
विभिन्न राज्यों और प्रमुख व्यापारिक निकायों के साथ हुए संवाद में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। गुजरात की सरकार के साथ-साथ उद्योग जगत की प्रतिनिधि संस्थाओं सीआईआई और एसोचैम ने एक साथ चुनाव कराने के विचार का पूरी तरह स्वागत किया है। इसके अलावा महाराष्ट्र, हरियाणा और गोवा से भी सकारात्मक सुझाव सामने आए हैं।
कांग्रेस शासित राज्यों की बात करें तो हिमाचल प्रदेश सरकार ने समिति के समक्ष कोई कड़ा नकारात्मक रुख नहीं अपनाया, जबकि आम आदमी पार्टी शासित पंजाब ने भी कोई बड़ा विरोध दर्ज नहीं कराया। केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में भी प्रक्रिया शांतिपूर्ण रही। हालांकि, कांग्रेस शासित कर्नाटक ने इस प्रस्ताव का तीखा विरोध किया है। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इस पूरी पहल को राजनीतिक रूप से प्रेरित करार देते हुए कहा कि यह व्यवस्था देश के संघीय ढांचे और राज्यों की स्वायत्तता को गंभीर नुकसान पहुंचाएगी।
शिक्षा जगत की ओर से इस प्रस्ताव के पक्ष में सबसे मजबूत दलीलें सामने आई हैं। पीपी चौधरी का कहना है कि बार-बार होने वाले चुनावों से स्कूलों की पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों के साथ-साथ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को लगातार मतदाता सूची पुनरीक्षण, बूथ प्रबंधन और चुनाव ड्यूटी में तैनात कर दिया जाता है। यदि एक साथ चुनाव होते हैं, तो इन कर्मियों को बार-बार अपने मुख्य शिक्षण कार्य से अलग नहीं होना पड़ेगा। हालांकि कर्नाटक सरकार ने इस पर कहा कि उनके पास चुनाव प्रबंधन के लिए समर्पित कर्मचारी तंत्र मौजूद है। फिर भी कई राज्यों के शिक्षण संस्थानों ने दर्ज कराया कि स्कूलों को बार-बार मतदान केंद्र बनाने और शिक्षकों को तैनात करने से शैक्षणिक कैलेंडर पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है।
समिति के समक्ष उठे छह बुनियादी संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल
संयुक्त संसदीय समिति के सामने विचार-विमर्श के दौरान छह ऐसे गंभीर सवाल और आपत्तियां रखी गई हैं, जिन पर संविधान विशेषज्ञों की राय ली जा रही है
- संवैधानिक वैधता का प्रश्न: क्या यह प्रस्तावित विधेयक भारतीय संविधान के मूल ढांचे के अनुरूप है, या यह संविधान के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है?
- संघीय व्यवस्था पर प्रभाव: क्या राज्यों की स्वायत्तता और उनकी अलग राजनीतिक पहचान को एक केंद्रीय चुनावी चक्र में बांधना भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है?
- आर्थिक लाभ और हानियां: बार-बार चुनाव कराने के मुकाबले एक साथ चुनाव कराने से देश की समग्र अर्थव्यवस्था और स्थानीय बाजारों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
- कार्यकाल का सामंजस्य: जब विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के मौजूदा कार्यकाल अलग-अलग वर्षों और महीनों में समाप्त हो रहे हैं, तो उन्हें बिना जबरन भंग किए एक साथ कैसे लाया जाएगा?
- त्रिशंकु जनादेश और अविश्वास प्रस्ताव: यदि चुनाव के बाद किसी राज्य में सरकार अल्पमत में आ जाए, मध्यावधि में गिर जाए या अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए, तो क्या शेष कार्यकाल के लिए फिर से चुनाव होंगे या वैकल्पिक व्यवस्था बनेगी?
- निर्वाचन आयोग के अधिकार: क्या इस प्रस्तावित नए कानून के जरिए निर्वाचन आयोग को अत्यधिक और असाधारण शक्तियां सौंपी जा रही हैं?
आर्थिक अध्ययन: 7 लाख करोड़ रुपये का लाभ और जीडीपी में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि
एक साथ चुनाव कराने के आर्थिक पहलुओं का विश्लेषण करते हुए पीपी चौधरी ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया। उस समिति के कार्य के दौरान जाने-माने अर्थशास्त्री एनके सिंह और प्राची मिश्रा ने एक विस्तृत शोध पत्र तैयार किया था। इस अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया था कि यदि देश में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू कर दी जाती है, तो भारत की विकास दर यानी जीडीपी में 1.6 प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि दर्ज की जा सकती है।
इस आर्थिक शोध के अनुसार, चुनावी निरंतरता समाप्त होने से देश की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर लगभग 7 लाख करोड़ रुपये का लाभ मिल सकता है। चौधरी का कहना है कि यह 7 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा वह प्रत्यक्ष लाभ है जिसकी गणना आर्थिक मानकों पर सीधे की जा सकती है। इसके अतिरिक्त कई ऐसे अप्रत्यक्ष फायदे भी हैं जिनका मूल्य केवल आंकड़ों में नहीं आंका जा सकता, जैसे प्रशासनिक स्थिरता, नीतिगत निर्णयों में तेजी और व्यापारिक अनिश्चितता का खत्म होना।
कार्यकाल के बीच में सरकार गिरने की आशंका से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय मॉडलों का अध्ययन भी किया जा रहा है। इसमें जर्मनी की रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव प्रणाली का उदाहरण सामने आया है, जिसके तहत यदि किसी चांसलर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित होता है, तो उसी समय संसद को नए चांसलर का चुनाव भी करना होता है ताकि सरकार शेष कार्यकाल तक सुचारू रूप से चल सके। हालांकि यह भी रेखांकित किया गया कि न तो जर्मनी में और न ही जापान में पूरी तरह से 'एक देश, एक चुनाव' का मॉडल लागू है।
प्रशासनिक तैयारी: आयोग का 6 महीने का दावा बनाम कुरैशी का दो से तीन साल का आकलन
चुनाव कराने की व्यावहारिक तैयारी को लेकर दो बिल्कुल विपरीत दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। पीपी चौधरी के मुताबिक, निर्वाचन आयोग ने समिति को आश्वस्त किया है कि भारत में 1952 से 1967 तक चारों आम चुनाव और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही सफलतापूर्वक आयोजित होते रहे हैं। जब उस दौर में मतपत्रों के जरिए एक साथ मतदान कराया जा सकता था, तो आज जब हमारे पास इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम जैसी आधुनिक तकनीक उपलब्ध है, तब ऐसा करना और भी सुगम है। आयोग का कहना है कि यदि 2028 तक कानून बन जाता है, तो आवश्यक अतिरिक्त ईवीएम और लॉजिस्टिक्स जुटाने के लिए महज छह महीने का समय पर्याप्त होगा।
कांग्रेस की सहमति को लेकर पूछे जाने पर चौधरी ने कहा कि समिति के सभी सदस्य देशहित को सर्वोपरि रखकर मंथन कर रहे हैं। उनका मानना है कि कोई भी जिम्मेदार राजनीतिक दल देश के व्यापक हितों के खिलाफ नहीं जाएगा और कांग्रेस को भी यह तय करना होगा कि वह राष्ट्रहित में इस सुधार का समर्थन करती है या केवल राजनीतिक विरोध की खातिर इसके खिलाफ खड़ी होती है।
संसदीय समिति की अब तक हुई 25 बैठकों में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी की सक्रिय भागीदारी रही है। चौधरी ने बताया कि प्रियंका गांधी कई महत्वपूर्ण बैठकों में उपस्थित रही हैं और उन्होंने पूरी सक्रियता के साथ अधिकारियों और विशेषज्ञों से तीखे सवाल पूछे हैं। हालांकि उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि समिति की कार्यवाही अत्यंत गोपनीय होती है, इसलिए वह इसे सार्वजनिक मंचों पर नहीं उठा रहीं, लेकिन वे 'एक देश, एक चुनाव' के विचार का कड़ा विरोध करती हैं। उनका मानना है कि यह कदम भारतीय जनता पार्टी द्वारा लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की कोशिश है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी दोहराया है कि इस व्यवस्था को थोपना लोकतंत्र और संघवाद की मूल भावना को खत्म करने जैसा होगा।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने इस पूरी प्रशासनिक तैयारी पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। कुरैशी का कहना है कि वर्तमान समय में देश भर में लगभग 50 लाख ईवीएम उपलब्ध हैं। यदि स्थानीय निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ आयोजित किए जाते हैं, तो आयोग को वर्तमान संख्या से तीन गुना अधिक यानी लगभग 1.5 करोड़ मशीनों की आवश्यकता होगी। इतनी भारी संख्या में मशीनों का निर्माण, उनका परीक्षण और वीवीपैट यूनिट्स की व्यवस्था करना कोई मामूली काम नहीं है।
कुरैशी ने आयोग के छह महीने के दावे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एक पूर्व चुनाव आयुक्त होने के नाते वे जानते हैं कि सामान्य परिस्थितियों में केवल एक नियमित चुनाव की तैयारी पूरी करने में ही छह महीने का समय लग जाता है। यदि आयोग के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है, तो जमीनी स्तर पर इतनी विशाल मशीनरी, सुरक्षा बलों की आवाजाही और प्रशासनिक समन्वय को जमीन पर उतारने में कम से कम दो से तीन साल का वक्त लगना तय है।
2027 से 2031 के बीच राज्यों के चुनावी चक्र का कैलेंडर
देश के विभिन्न राज्यों में विधानसभाओं का मौजूदा कार्यकाल इस प्रकार है, जिससे यह समझा जा सकता है कि एक साथ चुनाव कराने के लिए किन-किन राज्यों के समय को समायोजित करना होगा
- 2027 में प्रस्तावित चुनाव: उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात, मणिपुर, पंजाब और हिमाचल प्रदेश।
- 2028 में प्रस्तावित चुनाव: मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम।
- 2029 में प्रस्तावित चुनाव: महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर (जिनका कार्यकाल स्वाभाविक रूप से लोकसभा के साथ पूरा होगा)।
- 2031 में प्रस्तावित चुनाव: पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी।
आम जनता के जीवन पर पड़ने वाले 5 प्रत्यक्ष प्रभाव
इस पूरी व्यवस्था के लागू होने से आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन, सरकारी कामकाज और विकास परियोजनाओं पर कई महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकते हैं
पहला, आचार संहिता के कारण रुकने वाले विकास कार्यों में भारी कमी आएगी। जब भी कोई चुनाव घोषित होता है, आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है जिसके कारण सरकारें नई जनकल्याणकारी योजनाओं की घोषणा नहीं कर पातीं और चालू निर्माण कार्य भी ठहर जाते हैं। एक साथ चुनाव होने से साल दर साल लगने वाले इस नीतिगत ठहराव से देश को मुक्ति मिल सकती है।
दूसरा, शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ड्यूटी के तनाव से राहत मिलेगी। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2019 के आम चुनावों में लगभग 70 लाख कर्मचारियों को चुनावी कार्य में लगाया गया था। हर साल होने वाले विधानसभा और निकाय चुनावों के चलते सरकारी दफ्तरों का सामान्य कामकाज और स्कूलों की पढ़ाई ठप पड़ जाती है, जो एक साथ चुनाव होने से काफी हद तक सुरक्षित रह सकेगी।
तीसरा, रोजी-रोटी के लिए दूसरे शहरों में रहने वाले प्रवासी कामगारों को मतदान के लिए बार-बार अपने गृह क्षेत्र लौटने की आवश्यकता नहीं होगी। कई चुनावों के चलते उनका आने-जाने का खर्च बढ़ता है और कई दिनों की दिहाड़ी का नुकसान होता है। एक ही बार मतदान होने से उनका समय और पैसा दोनों बचेंगे।
चौथा, राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक मशीनरी का ध्यान लगातार चुनाव प्रचार में व्यस्त रहने के बजाय सुशासन, नीति निर्माण और विकास योजनाओं के धरातल पर क्रियान्वयन पर केंद्रित रहेगा।
पांचवां, सार्वजनिक धन और सुरक्षा बलों के खर्च में अभूतपूर्व बचत होगी। बार-बार अर्धसैनिक बलों की आवाजाही, परिवहन, मतदान केंद्रों की सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स पर खर्च होने वाला अरबों रुपया बच सकेगा, जिसका उपयोग स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और जनकल्याण के अन्य आवश्यक क्षेत्रों में किया जा सकता है।


















