पेरिस में आयोजित खाद्य व्यापार सम्मेलन में पंजाब के कृषि उत्पादों को बढ़ावा देकर स्वदेश लौटे मुख्यमंत्री भगवंत मान को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अप्रत्याशित प्रशासनिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। सोमवार रात करीब 11 बजे एयर फ्रांस के विमान से अपनी पत्नी डॉ गुरप्रीत कौर के साथ राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे मुख्यमंत्री को सामान निकासी के दौरान सीमा शुल्क विभाग की जांच से गुजरना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उन्हें हवाई अड्डे पर लगभग तीन घंटे तक रुकना पड़ा, जिसके बाद 50,000 रुपये का चालान जारी किया गया। इस घटनाक्रम ने देश भर में राजनीतिक बहस को जन्म देने के साथ ही यह गंभीर सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या किसी पदस्थ मुख्यमंत्री को हवाई अड्डे पर इस तरह रोका जा सकता है और कानून के समक्ष संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को क्या विशेष अधिकार प्राप्त हैं।
विमानतल पर सामान जांच और जुर्माने का पूरा घटनाक्रम
भगवंत मान पंजाब के कृषि उत्पादों, विशेष रूप से राजमा और काबुली चने के अंतरराष्ट्रीय प्रचार के लिए फ्रांस की यात्रा पर गए थे। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, विमान के उतरने के बाद मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी वीआईपी लाउंज में अपने सामान की प्रतीक्षा कर रहे थे। लगभग दो घंटे तक इंतजार करने के बाद संबंधित अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया कि सीमा शुल्क विभाग ने उनके बैगेज को रोक लिया है। इसके पश्चात मुख्यमंत्री को कस्टम्स बाड़े में ले जाया गया, जहां उनके सामान की भौतिक जांच की गई। इस प्रक्रिया के दौरान मुख्यमंत्री स्वयं लगभग एक घंटे तक वहां उपस्थित रहे।
सामान की जांच के दौरान उसमें जूते, बेल्ट, कपड़े, घड़ियां और आभूषण जैसी व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं पाई गईं। बताया गया कि मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी ने ग्रीन चैनल का उपयोग किया था, जो केवल उन यात्रियों के लिए निर्धारित होता है जिनके पास सीमा शुल्क घोषणा के योग्य कोई सामान नहीं होता। वहीं जिन वस्तुओं पर शुल्क या औपचारिक घोषणा अनिवार्य होती है, उन्हें रेड चैनल के माध्यम से ले जाना आवश्यक होता है। जांच के अंत में अधिकारियों ने 50,000 रुपये का जुर्माना निर्धारित किया। आम आदमी पार्टी की ओर से यह दावा किया गया कि अधिकारियों ने शुरुआत में जाने की अनुमति दे दी थी, लेकिन बाद में कथित दबाव के चलते 50,000 रुपये का चालान काटा गया।
इस जुर्माने की राशि का भुगतान तत्काल प्रभाव से पंजाब सरकार के दो वरिष्ठ अधिकारियों, प्रमुख सचिव रवि भगत और नई दिल्ली स्थित रेजिडेंट कमिश्नर एस करुणा राजू द्वारा किया गया। यह राशि प्राथमिक तौर पर रेजिडेंट कमिश्नर कार्यालय के अग्रिम खाते से दी गई थी, जिसे बाद में स्वयं मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपने निजी स्तर पर प्रतिपूर्ति कर वापस चुका दिया। हालांकि, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका है कि सीमा शुल्क अधिनियम के तहत लगाया गया यह जुर्माना कानूनी रूप से कितना न्यायसंगत था।
राजनीतिक आरोप और विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं
इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी काफी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए इसे एक चुनी हुई सरकार के मुखिया को प्रताड़ित और अपमानित करने की सोची-समझी साजिश करार दिया। पार्टी के नेताओं ने इस घटनाक्रम को केंद्र और पंजाब सरकार के बीच चल रहे पुराने टकरावों से जोड़ा। उन्होंने याद दिलाया कि केंद्र सरकार ने पूर्व में मान की इस फ्रांस यात्रा के लिए राजनीतिक मंजूरी देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद पंजाब सरकार को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। उच्च न्यायालय की अनुमति मिलने के बाद ही मुख्यमंत्री का यह विदेशी दौरा संभव हो पाया था।
इसके साथ ही आम आदमी पार्टी ने पंजाब के रोके गए केंद्रीय फंड और किसानों के आंदोलन के प्रति केंद्र के रवैये को भी इस तरह की प्रशासनिक सख्ती की पृष्ठभूमि बताया। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी की पंजाब इकाई के प्रवक्ता सरचंद सिंह ने हवाई अड्डे के घटनाक्रम से पहले ही मान की फ्रांस यात्रा के औचित्य, सरकारी खजाने पर पड़े खर्च और राज्य को होने वाले वास्तविक लाभों को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। हालांकि, कस्टम विभाग द्वारा की गई जांच और 50,000 रुपये के जुर्माने पर भाजपा का कोई सीधा औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। इस बीच, शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने दावा किया कि मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी से जरूरत से ज्यादा सामान या अघोषित नकदी को लेकर कई घंटों तक पूछताछ की गई और अंततः उनके संवैधानिक पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए ही उन्हें जाने की अनुमति दी गई। हालांकि, केंद्र सरकार के सीधे हस्तक्षेप के इन सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
संवैधानिक प्रावधान और मुख्यमंत्री की कानूनी स्थिति
इस घटना ने यह महत्वपूर्ण कानूनी सवाल खड़ा किया है कि क्या किसी पदस्थ मुख्यमंत्री को हवाई अड्डे पर रोका जा सकता है अथवा गिरफ्तार किया जा सकता है। भारतीय संविधान और देश की कानून प्रणाली में किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं माना गया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता सचिन नायक के अनुसार, किसी भी पदस्थ मुख्यमंत्री को विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए वैध कानूनी आधारों पर रोका या गिरफ्तार किया जा सकता है। हवाई अड्डे पर नियमित सुरक्षा और कस्टम्स जांच के मामले में किसी मुख्यमंत्री को कोई विशेष कानूनी छूट प्राप्त नहीं होती।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 22 मनमानी हिरासत और गिरफ्तारी के खिलाफ सुरक्षात्मक अधिकार तय करता है। इन प्रावधानों के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारणों से अवगत कराना और उसे अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने का अधिकार देना अनिवार्य है। साथ ही, यात्रा के समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार व्यक्ति को नजदीकी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना आवश्यक होता है। हालांकि, हवाई अड्डे पर सामान की जांच के लिए किसी यात्री को रोकना या पूछताछ करना स्वतः कानूनी गिरफ्तारी के दायरे में नहीं आता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आवागमन पर लगाई गई रोक का दायरा क्या था और किस कानूनी अधिकार के तहत कार्रवाई की गई थी।
गिरफ्तारी के नियम और पूर्व के न्यायिक उदाहरण
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 35 में यह स्पष्ट किया गया है कि पुलिस किन विशेष परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है। इसके विपरीत, सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों को अपने संबंधित अधिनियमों के अंतर्गत सामान की तलाशी लेने, यात्रियों को रोकने और अघोषित वस्तुओं पर जब्ती या जुर्माना लगाने के अलग वैधानिक अधिकार दिए गए हैं। अधिवक्ता सचिन नायक का मानना है कि भगवंत मान के मामले में अधिकारियों की कार्रवाई की वैधता इस तथ्य पर निर्भर करती है कि उन्हें हवाई अड्डे पर रोकने का वास्तविक कारण क्या था और क्या इतने लंबे समय तक इंतजार कराने का कोई ठोस प्रशासनिक आधार मौजूद था। यदि कोई वैध कारण नहीं था, तो उस कार्रवाई पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
देश की राजनीति में पदस्थ मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी का इतिहास भी रहा है। इसका प्रमुख उदाहरण 21 मार्च 2024 को देखने को मिला था, जब प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली के तत्कालीन पदस्थ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आबकारी नीति मामले में गिरफ्तार किया था। वह मामला गंभीर वित्तीय जांच और अदालती प्रक्रिया से जुड़ा था, जबकि भगवंत मान का मामला हवाई अड्डे पर सीमा शुल्क नियमों के उल्लंघन की प्रशासनिक जांच से संबंधित है। संक्षेप में, किसी मुख्यमंत्री को सामान्य यात्री की तरह कस्टम नियमों का पालन करना होता है, लेकिन किसी भी प्रकार की रोक कानूनी प्रक्रिया के दायरे में ही होनी चाहिए।



















