जम्मू एवं कश्मीर में 1990 के दशक के दौरान जब घाटी में आतंकवाद का प्रभाव तेजी से बढ़ा, तब व्यापक पैमाने पर कश्मीरी पंडितों को अपने घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ा था। इस कठिन उथल पुथल के बीच घाटी के अनगिनत मंदिरों में दैनिक पूजा अर्चना अचानक थम गई और वे परिसर वीरान पड़ गए। ठीक उसी संकट के दौर में बडगाम जिले के चरार-ए-शरीफ क्षेत्र के निवासी जहूर अहमद दार ने इन लावारिस पड़े धार्मिक स्थलों के संरक्षण का व्यक्तिगत बीड़ा उठाया। नेशनल सोशलिस्ट लीग ऑफ इंडिया से जुड़े जहूर अहमद दार ने उस दौर से लेकर बाद के वर्षों तक कश्मीर के 111 से ज्यादा मंदिरों की लगातार देखभाल की और सांप्रदायिक सद्भाव की एक अनोखी मिसाल कायम की।
घाटी के वीरान मंदिरों को संभालने का साहसिक फैसला
1990 के दशक की शुरुआत में जब कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ, तब कश्मीर के प्राचीन तथा ऐतिहासिक परिसरों की देखरेख करने वाला कोई भी स्थानीय संरक्षक मौजूद नहीं था। नियमित रखरखाव के अभाव में समय बीतने के साथ करीब 75 फीसदी मंदिर पूरी तरह जर्जर और खंडहरनुमा स्थिति में पहुंचने लगे थे। ऐसी विकट परिस्थितियों में जहूर अहमद दार ने आगे आकर इन खाली पड़ी धरोहरों को नुकसान से बचाने का फैसला किया। उस समय घाटी का माहौल इतना तनावपूर्ण था कि लोगों को यह अंदाजा तक नहीं था कि इन सूने पड़े मंदिरों की आंतरिक सुरक्षा और सफाई का काम पर्दे के पीछे कौन कर रहा है।
मंदिरों की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने के लिए जहूर अहमद दार को लगातार विभिन्न जिलों का सघन दौरा करना पड़ता था। चाहे वह दक्षिण कश्मीर का अनंतनाग हो, उत्तरी सीमा का हंदवाड़ा इलाका हो या मध्य कश्मीर का कोई अन्य दूरदराज कस्बा, वे हर जगह स्वयं पहुंचते थे। इस पूरे अभियान के दौरान उन्होंने श्रीनगर में स्थित प्रसिद्ध ज्येष्ठा देवी मंदिर, राजभवन के निकट स्थित धार्मिक स्थल और हंदवाड़ा के ऐतिहासिक भद्रकाली मंदिर की नियमित निगरानी और देखभाल सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका निभाई।
एम.के. पंडिता के साथ साझी जिम्मेदारी और निगरानी
इस जोखिम भरे मिशन में जहूर अहमद दार अकेले नहीं थे, बल्कि उन्हें पंडित समुदाय से आने वाले अपने सहयोगी एम.के. पंडिता का सक्रिय साथ मिला। एम.के. पंडिता स्वयं अनेक मंदिरों की देखरेख की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और एक स्थानीय ट्रस्ट के प्रभारी भी थे। उस दौर में दोनों साथियों ने मिलकर एक मजबूत साझा मोर्चा तैयार किया, जिसमें एम.के. पंडिता पंडित समुदाय की ओर से तथा जहूर अहमद दार मुस्लिम समुदाय की नुमाइंदगी करते हुए साझा धार्मिक स्थलों की हिफाजत कर रहे थे।
दोनों साथी मिलकर अलग अलग क्षेत्रों में जाकर मंदिरों के बुनियादी ढांचे, चारदीवारी और आंतरिक सुरक्षा का नियमित मुआयना करते थे। संवेदनशील इलाकों में किसी भी धार्मिक ढांचे को असामाजिक तत्वों द्वारा कोई नुकसान न पहुंचाया जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए उन्हें लगातार एक जिले से दूसरे जिले में आवाजाही करनी पड़ती थी। जहां आवश्यकता होती थी, वहां एम.के. पंडिता भी जहूर के साथ दौरों पर जाते थे, हालांकि अधिकांश कार्य जहूर अहमद दार ने अपनी व्यक्तिगत पहल और भागदौड़ के बल पर पूरा किया।
कड़े पहरे और जान के खतरे के बीच गुप्त आवाजाही
नब्बे के दशक में घाटी में व्याप्त अनिश्चितता और हिंसा के माहौल में किसी मंदिर परिसर में जाना जान जोखिम में डालने के बराबर था। जहूर अहमद दार ने उस भयावह दौर को याद करते हुए स्पष्ट किया कि उस समय उन्हें भी गहरे डर और आशंका का सामना करना पड़ता था। अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी इस विशेष गतिविधि की भनक किसी भी बाहरी व्यक्ति या पड़ोसी को नहीं लगने दी।
वे हमेशा अत्यंत सतर्कता के साथ चुपचाप इन मंदिरों में जाते थे। श्रीनगर, बडगाम, पुलवामा या हंदवाड़ा के किसी मंदिर की ओर निकलते समय यदि कोई परिचित उनसे रास्ते में पूछ बैठता था कि वे कहां जा रहे हैं, तो वे केवल सामान्य काम का बहाना बनाकर बात टाल दिया करते थे। उन्हें लगातार यह अंदेशा बना रहता था कि यदि चरमपंथियों या शरारती तत्वों को उनकी इस गतिविधि की जानकारी मिल गई, तो उनका पीछा किया जा सकता है या उन पर जानलेवा हमला हो सकता है। इसी वजह से वर्षों तक उन्होंने मंदिरों की निगरानी का यह पूरा सिलसिला पूरी तरह गोपनीय रखा।
शीतल नाथ मंदिर और 36 साल बाद लौटी रौनक
जहूर अहमद दार ने श्रीनगर के लगभग सभी प्रमुख इलाकों में सुबह और शाम के समय मंदिरों का दौरा किया। वे लाल चौक, हब्बा कदल और शहर के अन्य अंदरूनी हिस्सों में स्थित धार्मिक स्थलों की स्थिति देखने नियमित रूप से जाते रहे। इन्हीं में श्रीनगर का ऐतिहासिक शीतल नाथ मंदिर भी शामिल था, जिसकी रक्षा और देखभाल उन्होंने 1990 के दशक में अत्यंत समर्पण के साथ की थी।
वर्तमान समय में जब कश्मीर की स्थिति में क्रमिक सुधार हुआ, तब शीतल नाथ मंदिर का विधिवत प्रबंधन संबंधित समुदाय और न्यास के प्रतिनिधियों को सौंप दिया गया। हाल के समय में इसी शीतल नाथ मंदिर में पूरे 36 साल के लंबे अंतराल के बाद दोबारा पूजा की घंटियां गूंजीं और कश्मीरी पंडितों ने भव्य हवन पूजन का आयोजन किया। जहूर अहमद दार उस बदलाव को देखकर अत्यंत भावुक और प्रसन्न हुए कि जिन परिसरों में कभी केवल सन्नाटा, धूल और वीरान खंडहर दिखाई देते थे, वहां आज हरे भरे बगीचे, खिले हुए फूल और मंत्रोच्चार की गूंज लौट आई है।
आध्यात्मिक शांति और साझा कश्मीरी विरासत
जब जहूर अहमद दार से यह पूछा गया कि लगातार बने रहने वाले खौफ के बीच उन्हें इतने लंबे समय तक इस काम को जारी रखने का संबल कहां से मिला, तो उन्होंने इसे ईश्वर की असीम अनुकंपा बताया। उनका मानना है कि इस कठिन दायित्व को निभाने के लिए ऊपर वाले ने ही उन्हें चुना और हर कदम पर उनका मार्गदर्शन किया। वे एक ओर जहां अपनी स्थानीय दरगाहों और इबादतगाहों में हाजिरी लगाते थे, वहीं दूसरी ओर मंदिरों की स्वच्छता और सुरक्षा का ध्यान रखकर उन्हें वैसी ही आंतरिक आध्यात्मिक तृप्ति का अनुभव होता था।
जहूर अहमद दार के अनुसार, हर इंसान की सोच अलग हो सकती है, लेकिन हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई की पहचान से ऊपर उठकर मानवता और सभी पूजा स्थलों की पवित्रता सर्वोपरि है। उनका मानना है कि समाज में हर किसी को किसी खास मानवीय उद्देश्य के साथ भेजा जाता है और उन्होंने अपने इस दायित्व को ईश्वर की इच्छा मानकर चुपचाप निभाया। उनका यह अनथक प्रयास कश्मीर की उस साझी विरासत और पारंपरिक भाईचारे की जीती जागती तस्वीर पेश करता है, जो तमाम विपरीत झंझावातों के बावजूद घाटी के लोगों के दिलों में आज भी जिंदा है।























