श्रीनगर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के 17 विधायकों के एक निजी ठिकाने पर इकट्ठा होने के बाद जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। हालांकि पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष शौकत मीर ने आगे आकर इन सभी चर्चाओं पर विराम लगा दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि पार्टी में किसी भी प्रकार का कोई विद्रोह या असंतोष नहीं पनप रहा है। यह पूरी बैठक केवल सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा थी, जिसे सोशल मीडिया पर बेवजह तूल दिया गया।
विधायकों की एकजुटता और सामने आईं प्रमुख मांगें
इस निजी बैठक में मौजूद 17 जनप्रतिनिधियों के बीच कुछ खास मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें एक सलाहकार को पद से हटाने, चार कैबिनेट मंत्रियों के मंत्रालयों में फेरबदल करने तथा संगठन के भीतर एक अंदरूनी जांच बिठाने जैसे विषय शामिल थे। इन मांगों को लेकर उठे सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए अंतरिम अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि इसे आलाकमान के खिलाफ किसी भी तरह की जंग या चुनौती नहीं माना जाना चाहिए।
शौकत मीर ने बताया कि यह पूरा संवाद पूरी तरह से लोकतांत्रिक मर्यादाओं के तहत हुआ। पार्टी के साथी आने वाले समय की मुश्किलों और अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं पर शांतिपूर्ण ढंग से बात करने के लिए साथ बैठे थे। बातचीत के दौरान किसी भी विधायक ने अपनी ही सरकार या पार्टी संगठन के विरुद्ध एक भी तीखा शब्द नहीं कहा। उनका मकसद सिर्फ इतना था कि वे अपनी बातें वरिष्ठ सदस्यों के जरिए मुख्य नेतृत्व तक पहुंचा सकें।
वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और संगठन में असंतोष की बात
पार्टी में असंतुष्ट चल रहे प्रमुख चेहरों का उल्लेख करते हुए शौकत मीर ने माजिद लरावी, अब्दुल रहीम वीरी और नजीर अहमद गुरेजी जैसे वरिष्ठ नेताओं के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि ये सभी नेता संगठन की मजबूत रीढ़ हैं और इनका समर्पण हमेशा से दल के काम आया है। पार्टी नेतृत्व अपने सभी विधायकों की आकांक्षाओं और जनभावनाओं को भली-भांति समझता है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य की जरूरतों को देखते हुए सांगठनिक स्तर पर या राजनीतिक ढांचे में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं। किसी भी जिंदा राजनीतिक दल में विभिन्न मुद्दों पर अलग राय होना स्वाभाविक है, लेकिन इसे गुटबाजी या विद्रोह का नाम देना पूरी तरह से गलत है।
सीमित मंत्री पद और मंत्रिमंडल विस्तार की चुनौतियां
मंत्रिमंडल में जगह न मिलने के कारण विधायकों में पनपी मायूसी पर शौकत मीर ने खुलकर बात की। उन्होंने माना कि कई बार चुनाव जीत चुके वरिष्ठ नेताओं का मंत्री बनने की उम्मीद रखना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने कानूनी और प्रशासनिक सीमाएं हैं, क्योंकि मंत्रिपरिषद में कुल मिलाकर केवल 8 पद ही उपलब्ध हैं। इसी मजबूरी के कारण शुरुआत में केवल पांच मंत्रियों को ही शपथ दिलाई जा सकी।
मीर ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा लौटाने का जो वादा कर चुकी है, उसे जल्द पूरा करेगी। जैसे ही राज्य का दर्जा बहाल होगा, कैबिनेट के आकार की सीमा भी बढ़ जाएगी, जिससे अधिक विधायकों को शासन में सीधे तौर पर भागीदारी दी जा सकेगी। उन्होंने जोर दिया कि किसी भी दल के अंदरूनी मतभेदों को चारदीवारी के भीतर बैठकर ही सुलझाया जाता है।
























