झारखंड के पलामू जिले में पारंपरिक शिल्पकला से जुड़े ग्रामीण कारीगरों के जीवन में आधुनिक उपकरणों के आगमन से बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। माटी कला बोर्ड की पहल के तहत पारंपरिक कुम्हारों को तकनीक से लैस किया जा रहा है, जिससे उनकी शारीरिक मशक्कत में भारी कमी आई है और उत्पादों की क्षमता में तेज इजाफा हुआ है। खासकर दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों के समय, जब पारंपरिक मिट्टी के दीयों की मांग अपने चरम पर होती है, इन नई मशीनों की बदौलत ग्रामीण कारीगर स्थानीय और शहरी दोनों बाजारों की जरूरतों को तेजी से पूरा कर पा रहे हैं।
लकड़ी के डंडे वाले चाक से लेकर मोटर चालित तकनीक तक का सफर
पलामू जिले के लेस्लीगंज क्षेत्र के रहने वाले कृष्ण प्रजापति पिछले करीब छह वर्षों से मिट्टी के दीये, पारंपरिक घड़े और विभिन्न प्रकार के सजावटी सामान तैयार करने के काम में लगे हुए हैं। शुरुआती वर्षों में उनका यह काम बेहद थकाऊ और धीमी गति वाला था। वे मिट्टी के बर्तन और दीये गढ़ने के लिए लकड़ी के डंडे की सहायता से पारंपरिक चाक को हाथ से घुमाते थे। इस पुराने ढर्रे पर काम करने में चाक की रफ्तार काफी धीमी रहती थी और उसे निरंतर गतिमान बनाए रखने के लिए अत्यधिक शारीरिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती थी। एक बार पूरी ताकत से चाक घुमाने के बाद मुश्किल से 10 से 12 पीस ही तैयार हो पाते थे। सारा काम अकेले अपने बलबूते पर करने के कारण दिनभर में बहुत कम उत्पादन हो पाता था और समय की भी भारी बर्बादी होती थी।
माटी कला बोर्ड की 90 प्रतिशत सब्सिडी योजना से मिली नई रफ्तार
करीब एक वर्ष पहले सरकारी स्तर पर संचालित माटी कला बोर्ड की योजना का लाभ कृष्ण प्रजापति को मिला। इस योजना के अंतर्गत उन्हें कुल लागत पर 90 प्रतिशत के भारी अनुदान के साथ आधुनिक मोटर चालित चाक और मिट्टी मिलाने वाली पग मिल मशीन उपलब्ध कराई गई। इन दो आधुनिक मशीनों के कार्यशाला में आते ही उनके काम करने की पूरी कार्यप्रणाली ही बदल गई। पहले जहां मिट्टी को गूंधने और तैयार करने के लिए हाथों और पैरों से घंटों मशक्कत करनी पड़ती थी, वहीं अब पग मिल मशीन की सहायता से मिट्टी को एक समान और उत्तम गुणवत्ता में मिलाने का काम बेहद कम समय में पूरा हो जाता है। इसके बाद बिजली से चलने वाले मोटर चालित चाक पर बिना किसी शारीरिक थकावट के एक समान रफ्तार से मिट्टी को अलग-अलग रूप और आकार दिए जा रहे हैं।
दीयों के निर्माण की प्रक्रिया और बाजार में बिक्री
मिट्टी के उत्पादों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आज भी अपनी पारंपरिक गरिमा बनाए हुए है। पग मिल में तैयार मिट्टी को मोटर चालित चाक पर तराशने के बाद, गढ़े गए सभी दीयों और बर्तनों को धूप में एक से दो दिनों तक अच्छी तरह सुखाया जाता है। इसके बाद इन सूखे उत्पादों को लकड़ी जलाकर पारंपरिक आग की भट्ठी में पकाया जाता है। इस पूरी निर्माण प्रक्रिया में भले ही समय और धैर्य की आवश्यकता होती है, लेकिन मशीनों के सहयोग से टूटन कम हुई है और फिनिशिंग में जबर्दस्त सुधार आया है। कृष्ण प्रजापति वर्तमान समय में 100 रुपये में 100 मिट्टी के दीये बेच रहे हैं। उनके बनाए गए उत्पादों की आपूर्ति सिर्फ लेस्लीगंज के आसपास के ग्रामीण बाजारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मेदिनीनगर (डालटनगंज) के प्रमुख थोक और खुदरा बाजारों में भी इनके उत्पादों की भारी खपत हो रही है।
मासिक आय 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंची
तकनीक के समावेश से कारीगरों की आर्थिक स्थिति में भी ठोस सुधार दर्ज किया गया है। कृष्ण प्रजापति बताते हैं कि नियमित कामकाज से अब वे महीने में करीब 30 से 40 हजार रुपये तक की कमाई आसानी से कर लेते हैं। त्योहारी मौसम में दीयों की अत्यधिक मांग होने से उनका कारोबार और अधिक फल-फूल रहा है। आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता ने न केवल ग्रामीण कारीगरों की उत्पादकता और आय को बढ़ाया है, बल्कि युवाओं को अपनी पारंपरिक विरासत और मिट्टी कला को सम्मानजनक आजीविका के रूप में अपनाने की नई प्रेरणा भी दी है।



















