पड़ोसी देश पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समूहों के बुनियादी अधिकारों पर लगातार दबाव बना हुआ है, जहां अब अंतिम विदाई के मानवीय अधिकार भी विवाद के घेरे में आ रहे हैं. पंजाब प्रांत के पचनंद क्षेत्र में एक अहमदी महिला के निधन के बाद शोक संतप्त परिजनों को धार्मिक रीति से अंतिम प्रार्थना करने से रोक दिया गया. स्थानीय स्तर पर धर्मगुरुओं के कड़े विरोध और आपत्तियों के चलते परिवार अपनी मृत परिजन को शांतिपूर्वक दफनाने की जगह तलाशने के लिए भी मजबूर दिखा.
दफन करने की प्रक्रिया के दौरान मौके पर पहुंचे अहमदी समुदाय के लोगों को मजहबी रीति-रिवाजों का पालन करने से साफ मना कर दिया गया. विरोध जता रहे धर्मगुरुओं ने वहां मौजूद लोगों को विदा होने पर मजबूर किया और बाद में इसे अपनी जीत बताते हुए जश्न भी मनाया. यह पूरा वाकया दर्शाता है कि किस प्रकार धार्मिक मतभेद दैनिक जीवन से आगे बढ़कर शोक और विदाई के सबसे नाजुक पलों को भी कड़वाहट में बदल रहे हैं.
अंतिम संस्कार में रुकावटों का पुराना सिलसिला
अहमदी नागरिकों को अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के दौरान बाधाओं का सामना करना कोई नई बात नहीं है. सितंबर 2025 में पंजाब के सियालकोट जिले के अंतर्गत पीरो चक गांव में 55 वर्षीय कुदसिया तबस्सुम के निधन पर भी ऐसा ही संकट खड़ा हुआ था. तेहरीक-ए-लबबैक पाकिस्तान (टीएलपी) के समर्थकों और कट्टरपंथी समूहों ने स्थानीय कब्रिस्तान में उनकी अंत्येष्टि का जोरदार विरोध किया था. उस समय स्थिति गंभीर होने पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल को दखल देना पड़ा था, जिसके बाद किसी अन्य अहमदी कब्रिस्तान में ले जाकर पार्थिव देह को दफनाया जा सका.
इसी तरह सिंध प्रांत के बादीन जिले में भी जून 2026 के दौरान ऐसा ही एक मामला दर्ज किया गया था. वहां भी स्थानीय धर्मगुरुओं के दबाव के चलते प्रशासनिक अमले ने समुदाय के लोगों को अंतिम नमाज और प्रार्थनाएं अदा करने से रोकने का प्रयास किया था. इस प्रकार की लगातार होने वाली घटनाएं साफ करती हैं कि यह भेदभाव किसी एक कस्बे तक सीमित न होकर पूरे देश में सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर जड़ें जमा चुका है.
संवैधानिक प्रावधान और कानूनी पाबंदियों का ढांचा
इस पूरे सामाजिक अलगाव का एक बड़ा कारण पाकिस्तान का कानूनी इतिहास रहा है. देश की संसद ने साल 1974 में दूसरे संविधान संशोधन को पारित करके अहमदी समुदाय को कानूनी रूप से गैर-मुस्लिम की श्रेणी में डाल दिया था. इसके एक दशक बाद जनरल जिया-उल-हक के शासनकाल में 1984 का अध्यादेश XX लागू किया गया, जिसने उनके नागरिक और धार्मिक अधिकारों को और अधिक सीमित कर दिया.
इस अध्यादेश के तहत अहमदी समुदाय के किसी भी व्यक्ति के खुद को मुस्लिम कहने, इस्लामी अभिवादन अथवा धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल करने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया. इस कानूनी व्यवस्था ने कट्टरपंथी तत्वों को समुदाय के धार्मिक प्रतीकों, प्रार्थना स्थलों और यहां तक कि कब्रिस्तानों पर सवाल उठाने का हथियार मुहैया कराया.
वैश्विक मंचों पर जताई गई गहरी चिंता
पाकिस्तान में अहमदी समुदाय की स्थिति को लेकर वैश्विक स्तर पर भी लगातार आवाजें उठती रही हैं. 7 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने समुदाय के खिलाफ होने वाले सामाजिक हमलों, कानूनी पाबंदियों और हिंसा की घटनाओं पर गंभीर चिंता जाहिर की थी. विशेषज्ञों ने स्पष्ट शब्दों में इस्लामाबाद से आग्रह किया था कि वह अपने सभी नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की हिफाजत करे और कानून के दायरे में सभी के साथ बराबरी का बर्ताव सुनिश्चित करे.
पचनंद में हाल ही में सामने आया यह मामला उसी लंबी फेहरिस्त की एक नई कड़ी है, जिसमें प्रार्थना स्थलों पर हमले, कब्रों को नुकसान पहुंचाना, धार्मिक कृत्यों पर कानूनी रोक और अंतिम क्रियाकर्म में व्यवधान डालना शामिल रहा है. अपनी पहचान और आस्था की वजह से यह समुदाय लगातार सामाजिक बहिष्कार और असहज हालातों का सामना करने को विवश है.



















