दीपावली का पावन पर्व करीब आते ही प्रतापगढ़ समेत देश भर के बाजारों में त्योहारी उत्साह और चहल-पहल चरम पर पहुंच चुकी है। चारों ओर आधुनिक बिजली की झालरें, रंग-बिरंगी मोमबत्तियां और फैंसी सजावटी लाइटें अपनी जगमगाहट बिखेर रही हैं, फिर भी भारतीय सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े पारंपरिक मिट्टी के दीयों का आकर्षण जरा भी फीका नहीं पड़ा है। त्योहार की आहट के साथ ही ग्रामीण इलाकों से लेकर कस्बों और शहरों तक कुम्हारों की बस्तियों में चाक तेजी से घूमने लगे हैं। माटी को सानकर उसे आकार देने, धूप में सुखाने और भट्टी में पकाकर बाजार तक पहुंचाने का काम पूरे जोर-शोर से चल रहा है, जिससे पारंपरिक कारीगरों के चेहरों पर उम्मीद की एक नई चमक देखने को मिल रही है।
साल भर की मेहनत और पूरे परिवार का साझा प्रयास
मिट्टी के बर्तन और दीये गढ़ने वाले कुम्हार समुदाय के लिए यह त्योहार केवल एक धार्मिक उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि उनकी साल भर की जीविका और हुनर को नई पहचान दिलाने का सबसे अहम अवसर होता है। तड़के सुबह से लेकर देर शाम तक परिवार के सभी सदस्य अलग-अलग जिम्मेदारियों में जुटे रहते हैं। कोई गीली मिट्टी को पैरों और हाथों से गूंथकर तैयार करता है, तो कोई चाक की धुरी पर मिट्टी रखकर अपने सधे हाथों से सुंदर दीयों को तराशता है। इसके बाद उन्हें धूप में कतारबद्ध सुखाया जाता है और फिर पकाने की व्यवस्था की जाती है। इस पारंपरिक कार्य में घर के बुजुर्गों के समृद्ध अनुभव के साथ-साथ परिवार के छोटे बच्चे भी अपने माता-पिता के कामों में हाथ बंटाते नजर आते हैं। चाक पर गढ़ा जाने वाला प्रत्येक दीया इन दस्तकारों के पसीने, धैर्य और आने वाले बेहतर कल की उम्मीदों का जीवंत दस्तावेज है।
बाजार में नए डिजाइनों और स्वयं सहायता समूहों की पहल
बदलते दौर में सजावट के तौर-तरीके बदले हैं और घरों में इलेक्ट्रिक लड़ियों व मोमबत्तियों का दखल बढ़ा है, लेकिन जब बात विधिवत पूजा-अर्चना और लोक परंपराओं की आती है, तो मिट्टी के दीयों का कोई अन्य विकल्प अब तक सामने नहीं आया है। समय के साथ तालमेल बिठाते हुए कारीगरों ने भी अपने काम में नयापन लाया है। अब दुकानों पर सामान्य गोल दीयों के अलावा कमल के फूल की बनावट वाले दीपक, भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की बारीक नक्काशी से सजे कलात्मक दीये भी खूब बिक रहे हैं। इसके साथ ही कई इलाकों में सक्रिय महिला स्वयं सहायता समूह भी इन मिट्टी के बर्तनों और दीयों को आकर्षक रंगों व डिजाइनों से सजाकर बाजार में पेश कर रहे हैं, जिससे खरीदारों को पारंपरिक भाव के साथ आधुनिक रूप भी मिल रहा है।
प्रकृति के संरक्षण के साथ स्थानीय कारीगरी को बड़ा सहारा
मिट्टी के दीपकों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो निर्विवाद है ही, साथ ही ये पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से भी सर्वोत्तम विकल्प हैं। शुद्ध प्राकृतिक मिट्टी से निर्मित होने के कारण इनके इस्तेमाल से किसी भी प्रकार का अपशिष्ट या प्रदूषण पैदा नहीं होता और ये अंततः पुनः माटी में ही विलीन हो जाते हैं। त्योहार के पावन मौके पर जब लोग अपने आंगनों, छतों और दरवाजों को मिट्टी के दीयों की लौ से रोशन करते हैं, तो यह महज एक औपचारिकता नहीं होती। यह देश के पारंपरिक हस्तशिल्प को संरक्षण देने और स्थानीय कुम्हारों के आर्थिक संबल को मजबूत करने का एक सीधा व प्रभावी माध्यम साबित होता है।

















