मिर्च की खेती करने वाले किसानों के लिए तीन प्रमुख बीमारियां बड़ी चुनौती बन सकती हैं। लीफ कर्ल वायरस, डंपिंग ऑफ और उकठा रोग के प्रकोप से मिर्च के पौधों का सामान्य विकास रुक जाता है, जिससे पौधों पर फूल और फल बहुत कम बनते हैं और कुल उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। कुलदीप कुमार के अनुसार, समय रहते इन रोगों के शुरुआती लक्षणों की पहचान करना और वैज्ञानिक तरीके से रोकथाम के उपाय अपनाना किसानों के लिए बेहद आवश्यक है।
सफेद मक्खी से फैलने वाला लीफ कर्ल वायरस और उसकी रोकथाम
मिर्च के खेत में लीफ कर्ल वायरस एक अत्यंत गंभीर बीमारी मानी जाती है। यह वायरस मुख्य रूप से रस चूसक कीट सफेद मक्खी के जरिए एक पौधे से दूसरे पौधे में तेजी से फैलता है। जब यह रोग किसी पौधे को अपनी गिरफ्त में लेता है, तो उसकी पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ जाती हैं और उनका आकार किसी उल्टे कटोरे जैसा दिखाई देने लगता है। इसके साथ ही नई पत्तियां आकार में बहुत छोटी रह जाती हैं और पौधों की सामान्य बढ़वार पूरी तरह रुक जाती है।
यदि संक्रमण अधिक गंभीर हो जाए, तो पौधे बौने रह जाते हैं और उन पर फूल या फल आने की स्वाभाविक प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इस रोग से पूरी फसल को बचाने के लिए खेत में जैसे ही कोई संक्रमित पौधा दिखे, उसे फौरन सावधानीपूर्वक जड़ समेत उखाड़कर खेत से काफी दूर फेंक देना चाहिए या नष्ट कर देना चाहिए। इसके अलावा खेत में सफेद मक्खी की सक्रियता पर लगातार निगरानी रखना अनिवार्य है। इसके रासायनिक नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरोपीड की 0.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के अनुपात में मिलाकर छिड़काव करने से सफेद मक्खी का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है।
नर्सरी में डंपिंग ऑफ का खतरा और जल निकासी की व्यवस्था
नर्सरी स्तर पर मिर्च के नन्हे पौधों में डंपिंग ऑफ रोग का प्रकोप सबसे अधिक देखा जाता है। यह समस्या मुख्य रूप से मिट्टी के अंदर मौजूद रोगजनक फफूंद और अत्यधिक नमी या जलभराव की स्थिति के कारण उत्पन्न होती है। इस रोग का हमला होते ही अंकुरण के ठीक बाद पौधे के तने का निचला हिस्सा कमजोर पड़ने लगता है और सड़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप नन्हे पौधे जमीन पर गिर जाते हैं और सूखने लगते हैं, जिससे नर्सरी में स्वस्थ पौधों की संख्या बहुत तेजी से घटने लगती है और मुख्य खेत में रोपाई के लिए जरूरी पौधे तैयार करना कठिन हो जाता है।
डंपिंग ऑफ से बचाव की तैयारी नर्सरी डालते समय ही शुरू कर देनी चाहिए। इसके लिए बीजों का सही तरीके से बीजोपचार करना जरूरी है और नर्सरी की क्यारियों को जमीन की सतह से लगभग 15 सेंटीमीटर ऊंचा उठा कर तैयार करना चाहिए, ताकि बारिश या सिंचाई के बाद पानी आसानी से निकल जाए और क्यारियों में जलभराव बिल्कुल न हो। मिट्टी के उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक फफूंदनाशक का अनुशंसित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है। यदि नर्सरी में पौधों पर बीमारी के लक्षण नजर आने लगें, तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी अथवा मैंकोजेब जैसे असरदार फफूंदनाशकों का छिड़काव करके रोग को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।
उकठा रोग के लक्षण और फसल चक्र से समाधान
खेत में मिर्च की रोपाई के बाद उकठा रोग भी एक गंभीर संकट बन सकता है। इस बीमारी की चपेट में आने पर खेत के हरे-भरे पौधे अचानक मुरझाने लगते हैं और कुछ ही दिनों में पूरी तरह सूख जाते हैं। अगर ऐसे प्रभावित पौधे को जमीन से बाहर उखाड़कर देखा जाए, तो उसकी जड़ों पर काले रंग के धब्बे साफ नजर आते हैं या जड़ें सड़ी हुई पाई जाती हैं। इस फफूंदजनित समस्या से जमीन को बचाने के लिए किसानों को फसल चक्र का सख्ती से पालन करना चाहिए और एक ही खेत में बार-बार मिर्च की फसल नहीं लगानी चाहिए। मिर्च की कटाई के बाद उसी खेत में धनिया या दलहनी फसलों की बुवाई करने से मिट्टी में मौजूद रोग कारकों की रोकथाम में बड़ी मदद मिलती है।
उकठा रोग के रासायनिक नियंत्रण के तौर पर कार्बेंडाजिम की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के घोल में मिलाकर पौधों की जड़ों के पास ड्रेंचिंग या छिड़काव करने से रोग का असर काफी घट जाता है। मिर्च की रोपाई पूरी होने के लगभग एक हफ्ते बाद यह छिड़काव करना सबसे उपयुक्त और प्रभावशाली समय माना जाता है। मिर्च की खेती को हर प्रकार के रोग से सुरक्षित रखने के लिए नर्सरी से लेकर मुख्य खेत तक पानी की निकासी का पुख्ता प्रबंध होना चाहिए, हमेशा प्रमाणित और स्वस्थ बीजों का ही चुनाव करना चाहिए तथा रोपाई के बाद भी खेत का नियमित निरीक्षण करते रहना चाहिए ताकि कोई भी लक्षण दिखते ही फौरन सही दवा का उपयोग किया जा सके।



















