सार्वजनिक धन का सदुपयोग और उसके खर्च की पाई-पाई का पारदर्शी हिसाब रखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राथमिक आवश्यकता है। तिरुवनंतपुरम स्थित केरलम विधानसभा में संसद तथा विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की लोक लेखा समितियों के सभापतियों के दो दिवसीय सम्मेलन का आगाज हुआ। इस महत्वपूर्ण मंच को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सार्वजनिक वित्त प्रबंधन, संसदीय निगरानी और बजटीय अनुशासन को लेकर कई नीतिगत दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि सरकारी खजाने से स्वीकृत होने वाली एक-एक धनराशि उसी खास प्रयोजन पर व्यय होनी चाहिए, जिसके लिए विधायी मंजूरी दी गई है। उन्होंने जोर दिया कि जनता का हर पैसा नागरिकों के योगदान और उनकी उम्मीदों का प्रतीक है, इसलिए इसका प्रबंधन कड़े वित्तीय अनुशासन के मानकों के अनुरूप ही होना चाहिए।
इस उद्घाटन सत्र में संसद की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के सी वेणुगोपाल और वी डी सतीशन समेत कई प्रमुख जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। सम्मेलन में संसदीय समितियों के कार्यक्षेत्र, सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर विचार-विमर्श किया गया।
सिफारिशों का वास्तविक प्रभाव और समितियों की जवाबदेही
लोकसभा अध्यक्ष ने संसदीय समितियों के काम करने के तरीके और उनकी उपादेयता पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि लोक लेखा समितियों द्वारा तैयार की जाने वाली रिपोर्टों और उनकी सिफारिशों का असली मूल्यांकन तभी संभव है, जब उनसे समूची प्रशासनिक प्रणाली में ठोस, सकारात्मक और दीर्घकालिक बदलाव दिखाई दें। यदि जांच के बाद भी पुरानी खामियां और कमियां भविष्य के कामकाज में दोहराई जाती हैं, तो समितियों के व्यापक श्रम का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
उन्होंने कहा कि लोक लेखा समितियां केवल कमियां निकालने वाला मंच नहीं हैं, बल्कि वे यह सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी साधन हैं कि करदाताओं का धन तय लक्ष्यों पर ही लगे। इन समितियों का दायित्व यह देखना है कि सरकारी योजनाओं में शत-प्रतिशत पारदर्शिता बनी रहे। यदि किसी स्तर पर क्रियान्वयन में कोई शिथिलता अथवा विचलन दिखे, तो उस पर तत्काल सुधारात्मक उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
बदलते दौर में क्यों विस्तृत हुआ पीएसी का दायरा
आज के आधुनिक प्रशासनिक परिवेश में लोक लेखा समितियों की भूमिका पहले की तुलना में कई गुना अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। शासन व्यवस्था में अत्याधुनिक डिजिटल प्रौद्योगिकियों का समावेश, विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बढ़ता सार्वजनिक पूंजी निवेश और कई सार्वजनिक-निजी संस्थानों की सहभागिता ने सरकारी कामकाज को व्यापक और जटिल बना दिया है। ऐसे परिवेश में बजटीय आवंटन की निगरानी का काम भी विस्तृत हो चुका है।
ओम बिरला ने रेखांकित किया कि संसद और राज्य विधानमंडलों की भूमिका केवल नीतिगत बहसों में भाग लेने अथवा नए कानून पारित करने तक ही सीमित नहीं मानी जा सकती। विधायी संस्थाओं का यह सर्वोच्च संवैधानिक दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि स्वीकृत बजट तय सीमाओं के भीतर ही खर्च हो और उससे आम जनता को अपेक्षित लाभ जमीनी स्तर पर मिले। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सरकारी धन मूल रूप से जनता का है, इसलिए उसके उपयोग में पूर्ण जवाबदेही बरतना लोकतांत्रिक ढांचे की अनिवार्य शर्त है।
ऑडिट आपत्तियों को केवल भ्रष्टाचार समझना भूल
लेखा परीक्षा के निष्कर्षों को देखने के नजरिए पर बात करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने एक बड़ा भेद स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कैग की रिपोर्टों में दर्ज प्रत्येक वित्तीय आपत्ति अथवा असहमति को सीधे भ्रष्टाचार का मामला मान लेना उचित नहीं है। अक्सर ऐसी आपत्तियां जटिल प्रक्रियागत खामियों, अवांछित या टाले जा सकने वाले खर्चों, परियोजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली अप्रत्याशित देरी, उचित निगरानी तंत्र के अभाव अथवा विभागीय स्तर पर योजना लागू करने की कमजोरियों से उत्पन्न होती हैं।
संसदीय समितियों का प्रमुख कार्य यह होना चाहिए कि वे इन कमियों के मूल कारणों की बारीकी से पहचान करें, प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने में मदद करें और भविष्य के लिए व्यावहारिक सुधारात्मक उपाय सुझाएं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जहां तथ्यों, दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर सरकारी खर्चों का तकनीकी ऑडिट करता है, वहीं लोक लेखा समितियां उन तकनीकी निष्कर्षों को विधायी जवाबदेही, प्रशासनिक सुधार और अनुवर्ती कार्रवाई के दायरे में लाकर उनका परीक्षण करती हैं। इस प्रक्रिया में संबंधित विभागों से जवाब मांगा जाता है और उनके द्वारा उठाए गए कदमों की नियमित समीक्षा की जाती है।
दलीय राजनीति से परे रहकर संस्थागत सुधार की जरूरत
लोक लेखा समितियों की आंतरिक कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते हुए बिरला ने कहा कि यह मंच सामान्य राजनीतिक मतभेदों और वैचारिक सीमाओं से पूरी तरह ऊपर उठकर काम करता है। इन समितियों में विभिन्न दलों के सदस्य एक साथ बैठते हैं और सार्वजनिक वित्त के विवेकपूर्ण उपयोग तथा प्रशासनिक जवाबदेही जैसे गंभीर विषयों पर आम सहमति और निष्पक्ष दृष्टिकोण के साथ विचार करते हैं। यही दलीय तटस्थता इस संसदीय संस्था की सबसे बड़ी ताकत है।
देश के आर्थिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की संपूर्ण अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था तेज गति से विकसित हो रही है। आधारभूत ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, समाज कल्याण और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं में सार्वजनिक निवेश अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। इस विस्तार के चलते अब केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि धन तय नियमों और पास किए गए बजट के अनुसार खर्च हुआ या नहीं। अब सबसे बड़ा जोर इस बात पर होना चाहिए कि उन योजनाओं के जमीनी परिणाम क्या रहे और उनके क्रियान्वयन से आम आदमी के जीवन में कितना गुणवत्तापूर्ण सुधार आया। विकसित भारत के लक्ष्य की सार्थकता इसी बात पर निर्भर है कि विकास के लिए निर्धारित संसाधन समाज के अंतिम पायदान पर खड़े प्रत्येक नागरिक तक निर्बाध पहुंचें।



















