सांस की पुरानी बीमारी यानी दमे की तकलीफ झेल रहे लोगों के लिए खान-पान से जुड़ा एक पारंपरिक उपाय काफी मददगार साबित हो सकता है. कोडरमा जिले के आयुष चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. प्रभात कुमार ने फेफड़ों की सेहत सुधारने के लिए रोजमर्रा के आहार में बकरी का दूध शामिल करने की सलाह दी है. इस घरेलू नुस्खे को नियमित तौर पर अपनाने से श्वसन मार्ग की परेशानियों में उल्लेखनीय आराम मिल सकता है, क्योंकि ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में यह प्राकृतिक विकल्प बहुत सरलता से मिल जाता है.
सेवन का सही नियम और समय सीमा
अस्थमा से जूझ रहे लोगों के लिए इसके इस्तेमाल का तरीका समझाते हुए डॉ. प्रभात कुमार ने कहा कि मरीजों को सुबह और शाम दोनों समय एक-एक कप बकरी का दूध गर्म करके पीना चाहिए. उन्होंने इस उपाय को करीब 90 दिनों तक लगातार जारी रखने की हिदायत दी है, ताकि श्वसन प्रणाली को इसका पूरा लाभ मिल सके. नियमित दिनचर्या बनाकर गर्म दूध पीने से फेफड़ों में जमाव कम होने लगता है और सांस लेना आसान महसूस होता है.
चल रही अंग्रेजी दवाएं और इनहेलर बंद न करें
आयुष चिकित्सा पदाधिकारी ने मरीजों को खास सतर्कता बरतने को कहा है कि यदि उनका पहले से कोई एलोपैथिक इलाज या इनहेलर चल रहा है, तो उसे अपनी मर्जी से बिल्कुल न रोकें. डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाओं को नियमित रूप से लेते रहना जरूरी है. घरेलू नुस्खे केवल अतिरिक्त सहयोग के लिए होते हैं, इसलिए मुख्य चिकित्सा परामर्श की अनदेखी करना सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.
श्वसन नली की सूजन घटाने और कफ रोकने में मददगार
अस्थमा वस्तुतः सांस की नलियों से जुड़ी एक लंबे समय तक चलने वाली समस्या है, जिसके कारण मरीज को सांस लेने में भारी दिक्कत, सीने में जकड़न, लगातार खांसी और सांस फूलने जैसी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है. डॉ. प्रभात कुमार के मुताबिक, बकरी का दूध फेफड़ों के भीतर कफ को अधिक मात्रा में बनने से रोकता है और सांस की नलियों में आई सूजन को धीरे-धीरे कम करता है. इसके अलावा यह बेहद सुपाच्य होता है, जिससे मरीज के पाचन तंत्र पर कोई अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता. साथ ही मरीजों को बाहरी धूल, धुएं और प्रदूषण से खुद को बचाकर रखने की भी सलाह दी गई है.


















