झारखंड के रामगढ़ इलाके की रहने वाली सोनी ने अपनी रचनात्मक सोच और लगन से धान की सूखी डंडियों को बेहद खूबसूरत कलाकृतियों में बदल दिया है। घर के नाजुक आर्थिक हालात से जूझते हुए उन्होंने जिस हुनर को अपनाया, वह आज उनके परिवार के भरण पोषण का सबसे बड़ा संबल बन चुका है। धान के छोटे-छोटे तिनकों से उकेरी गई उनकी पेंटिंग्स को न सिर्फ आम लोग पसंद कर रहे हैं, बल्कि सरकारी मंचों पर भी इन कृतियों की भारी मांग देखने को मिल रही है।
संकट के दौर में हुनर बना कारोबार
सोनी के परिवार में उनकी मां, बहन और भाभी हैं, जिनकी पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। जब जीवन में आर्थिक चुनौतियां बढ़ीं, तब उन्होंने अपने पुराने शौक को एक मुकम्मल व्यवसाय में तब्दील करने का फैसला लिया। चार साल पहले शुरू हुआ यह सफर आज इस मुकाम पर पहुंच चुका है कि राज्य सरकार भी विभिन्न आयोजनों के लिए थोक में इन कलाकृतियों के ऑर्डर देती है। इससे उन्हें सम्मानजनक आमदनी मिल रही है और वह अपने पूरे परिवार का खर्च आत्मविश्वास के साथ उठा रही हैं।
स्केच से चिपकाने तक की जटिल प्रक्रिया
धान की डंडियों से तस्वीर तैयार करने की तकनीक बेहद बारीक और धैर्य से भरी है। सोनी बताती हैं कि वह किसी भी चित्र को शुरू करने से पहले कागज पर एक स्पष्ट और सटीक स्केच तैयार करती हैं। इसके बाद धान की सूखी डंडियों को माप के हिसाब से बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। फिर गोंद के सहारे इन टुकड़ों को एक-एक करके स्केच पर सलीके से चिपकाया जाता है। इस विधा का कोई औपचारिक प्रशिक्षण उन्होंने नहीं लिया, बल्कि पिछले 4 वर्षों के निरंतर अभ्यास से उन्होंने खुद ही इस कौशल को निखारा है।
पारंपरिक धरोहर और देवताओं की कृतियां
उनकी कलाकृतियों में मुख्य रूप से भगवान गणेश, राम मंदिर, मां सरना और भगवान बिरसा मुंडा के भव्य रूप देखने को मिलते हैं। स्थानीय संस्कृति और मान्यताओं से जुड़ी इन कृतियों की मांग इतनी अधिक है कि कई बार वह सारे ऑर्डर्स समय पर पूरे भी नहीं कर पाती हैं। ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडे ने भी पूर्व में एक अच्छी खासी कीमत देकर उनसे एक पेंटिंग खरीदी थी। इसके अतिरिक्त जिन लोगों को इस कला के बारे में पता चलता है, वे सीधे सोनी के घर पहुंचकर अपनी पसंद की कलाकृतियां खरीद रहे हैं।
झारखंड की समृद्ध माटी और प्राकृतिक कला
सोनी का कहना है कि झारखंड में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, जबकि स्थानीय सांस्कृतिक धरोहर को कला के माध्यम से उस स्तर पर प्रदर्शित नहीं किया जाता। इसी सोच ने उन्हें धान की डंडियों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया ताकि पूरी तरह से प्राकृतिक और इको-फ्रेंडली तरीके से राज्य की संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सके। बिना किसी कृत्रिम रंग या रसायन के तैयार होने वाली यह कलाकृति पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ राज्य की मिट्टी की सुगंध और पहचान को भी बयां करती है।

















