राजस्थान के मेवाड़ अंचल की पहाड़ियों और जंगलों में कुदरती रूप से पैदा होने वाला सीताफल अब अपनी मिठास के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीण आर्थिकी को भी नई रफ्तार दे रहा है। एक दौर था जब आदिवासी समाज के लोग जंगलों से इस मौसमी फल को तोड़कर केवल आस-पास की स्थानीय मंडियों और हाट-बाजारों में बेहद मामूली दामों पर बेच दिया करते थे। वक्त के साथ इस तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है और अब यह पारंपरिक फल देश के महानगरों से निकलकर सात समंदर पार दुबई, अमेरिका और सऊदी अरब जैसे मुल्कों में अपनी मजबूत पहचान दर्ज करा रहा है। सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि इस फल के बढ़ते वाणिज्यिक दायरे ने इलाके की आदिवासी महिलाओं के सामने आजीविका और सम्मानजनक कमाई के नए दरवाजे खोल दिए हैं।
पारंपरिक पहचान से निकलकर मूल्य संवर्धन की ओर बढ़ता दायरा
मेवाड़ की भौगोलिक बनावट और आबोहवा सीताफल की उपज के लिए हमेशा से अनुकूल रही है। यहां के वन्य क्षेत्रों, पथरीली पहाड़ियों और खेतों की मेड़ों के किनारे प्राकृतिक रूप से सीताफल के अनगिनत पेड़ मौजूद हैं। शुरुआत में ग्रामीण और आदिवासी परिवार सिर्फ फल को तोड़कर कच्चा ही बाजार में बेचने पर निर्भर थे, जिससे फल के जल्दी खराब होने का डर बना रहता था और वाजिब मुनाफा भी नहीं मिल पाता था।
बाजार में बढ़ती मांग के मद्देनजर अब इसके प्रसंस्करण पर खास ध्यान दिया जा रहा है। सीताफल से कई तरह के मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिससे इसकी उपयोगिता और बाजार मूल्य दोनों में भारी इजाफा दर्ज हुआ है। खाने-पीने के शौकीनों के बीच सीताफल से तैयार होने वाली रबड़ी, आइसक्रीम और फ्रेश क्रीम बेहद लोकप्रिय हो रही हैं। इसके साथ ही बेकरी उद्योग भी इस फल के विशिष्ट स्वाद को भुनाने में पीछे नहीं है। बेकरी कारोबारी सीताफल के पल्प का इस्तेमाल करके स्वादिष्ट केक, बिस्किट और कई अन्य कन्फेक्शनरी उत्पाद तैयार कर रहे हैं, जिससे यह मौसमी फल अब साल भर विभिन्न रूपों में उपभोग के लिए उपलब्ध रहने लगा है।
प्रसंस्करण इकाइयों से बदली आदिवासी महिलाओं की जिंदगी
सीताफल के इस व्यावसायिक रूपांतरण का सबसे सकारात्मक असर वनांचल में रहने वाली आदिवासी महिलाओं के जीवन स्तर पर पड़ा है। पहले महिलाएं जंगलों और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों में जाकर फल चुनती थीं और सिर पर टोकरा रखकर नजदीकी बाजारों तक पैदल सफर करती थीं। अब कई इलाकों में स्थापित की गई आधुनिक प्रोसेसिंग यूनिट्स के माध्यम से उन्हें सीधे संगठित काम से जोड़ दिया गया है।
इन इकाइयों में सीताफल के संग्रहण, ग्रेडिंग, पल्प निकालने, उसकी स्वच्छता जांचने और पैकेजिंग से लेकर नए व्यंजन तैयार करने का पूरा जिम्मा महिलाओं के हाथों में है। अपने ही गांव और कस्बे के पास सुरक्षित काम मिलने से महिलाओं का पलायन रुका है और वे अपने परिवारों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मुख्य भूमिका निभा रही हैं। घर की दहलीज से बाहर निकलकर आर्थिक भागीदारी निभाने से उनके भीतर गजब का आत्मविश्वास देखने को मिल रहा है।
व्यवस्थित खेती और चित्तौड़गढ़ में नई पहल का आगाज
लगातार बढ़ रहे कारोबारी अवसरों को देखते हुए अब सीताफल को मात्र जंगलों में उगने वाले फल तक सीमित न रखकर व्यवस्थित खेती के रूप में भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। उदयपुर के नजदीकी ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक रूप से पाए जाने वाले इन पेड़ों को अब वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित तरीके से बड़े बाजारों से जोड़ने की कोशिशें जारी हैं।
उदयपुर के साथ-साथ चित्तौड़गढ़ में भी सीताफल प्रसंस्करण से जुड़ी एक नई इकाई की शुरुआत की गई है। इस नई यूनिट के जरिए स्थानीय महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार मुहैया कराया जा रहा है, ताकि फल से अधिक से अधिक आधुनिक उत्पाद बनाए जा सकें। कभी मौसम का एक साधारण और उपेक्षित माना जाने वाला फल आज अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमक रहा है, जिसने मेवाड़ की जैव विविधता को विश्व पटल पर स्थापित करने के साथ ही स्थानीय श्रम को एक नई प्रतिष्ठा प्रदान की है।

















