खेती-किसानी को लेकर आम तौर पर यही धारणा रहती है कि यह केवल घाटे और अनिश्चितताओं का जरिया है, लेकिन झारखंड के देवघर जिले के एक किसान ने इस सोच को पूरी तरह बदलकर रख दिया है. बिना किसी भारी पूंजी निवेश या बड़े व्यावसायिक सेटअप के, इस किसान ने अपनी पारंपरिक जमीन पर आधुनिक बाजार समझ का इस्तेमाल करते हुए परिवार की आजीविका को मजबूत बनाया है. छह एकड़ जमीन पर तरह-तरह की नकदी सब्जियों की पैदावार कर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो किसानी से भी सम्मानजनक मुनाफा कमाया जा सकता है.
बाजार की मांग और बहुफसली मॉडल की रणनीति
यह सफल कहानी देवघर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले गोपीडीह गांव के निवासी किसान अंबिका कुशवाहा की है. अंबिका कुशवाहा के पास लगभग 6 एकड़ कृषि भूमि उपलब्ध है. उन्होंने पारंपरिक एकल फसल प्रणाली में फंसने के बजाय अपने खेतों को बहुफसली व्यवस्था में बदल दिया. वर्तमान में उनके खेतों में एक साथ छह अलग-अलग प्रकार की सब्जियां तैयार हो रही हैं, जिनमें फूलगोभी, गाजर, हरी धनिया और मिर्च जैसी प्रमुख फसलें शामिल हैं. मौसमी बदलावों और स्थानीय मंडियों में मांग के चक्र को ध्यान में रखकर उन्होंने फसलों का चुनाव किया है.
एक ही तरह की उपज पर आश्रित न रहने की इस रणनीति से किसान को कई व्यावहारिक फायदे मिलते हैं. जब खेत में कई तरह की फसलें एक साथ तैयार होती हैं, तो किसान के पास अलग-अलग समय पर मंडियों में माल पहुंचाने का अवसर रहता है. इसके अलावा अगर कभी किसी एक सब्जी के दाम बाजार में अचानक गिर भी जाएं, तो दूसरी फसल से होने वाला मुनाफा नुकसान की भरपाई कर देता है. इस तरह उनका जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है और नियमित नकद प्रवाह बना रहता है.
लागत और मुनाफे का वित्तीय संतुलन
अंबिका कुशवाहा की इस खेती का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका वित्तीय प्रबंधन है. अपनी 6 एकड़ जमीन पर छह प्रकार की सब्जियों की पूरी खेती तैयार करने में उनका कुल खर्च लगभग 2 लाख रुपये के आसपास आता है. इस निवेश के जरिए वे संबंधित सीजन में लगभग 04 लाख रुपये तक की सकल कमाई हासिल करने में सफल रहते हैं. लागत निकालने के बाद भी किसान के पास अपनी मेहनत का संतोषजनक लाभ बच जाता है.
सब्जी उत्पादन में मौसम के मिजाज, सिंचाई की व्यवस्था, उत्तम किस्म के बीज, खाद और कीटनाशकों के समय पर प्रयोग की बड़ी भूमिका होती है. साथ ही स्थानीय थोक मंडी में मिलने वाले दैनिक भाव भी आय को तय करते हैं. इन तमाम प्राकृतिक और बाजार संबंधी चुनौतियों के बावजूद संतुलित योजना के दम पर उन्होंने अपनी कृषि आय को सुरक्षित किया है, जो इलाके के अन्य काश्तकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है.
पारिवारिक श्रम और सामूहिक भागीदारी की मिसाल
इस पूरे कृषि कार्य की सफलता के पीछे किसान के पूरे परिवार का संगठित श्रम जुड़ा हुआ है. पूरा परिवार अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह खेती पर ही निर्भर है, इसलिए सभी सदस्य सक्रिय रूप से जिम्मेदारियां निभाते हैं. खेतों की जुताई और क्यारियां तैयार करने से लेकर पौधों की दैनिक देखभाल, नियमित सिंचाई और परिपक्व सब्जियों की तुड़ाई तक के सारे काम परिवार के लोग मिलकर पूरा करते हैं.
पारिवारिक भागीदारी के चलते बाहरी मजदूरों पर होने वाले अतिरिक्त खर्च में बचत होती है और फसलों की गुणवत्ता पर व्यक्तिगत नजर बनी रहती है. अंबिका कुशवाहा का साफ मानना है कि यदि कोई भी किसान बाजार की नब्ज और मांग को बारीकी से परखे और केवल एक ही फसल पर जुआ खेलने से बचे, तो सीमित पूंजी के बावजूद किसानी से बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है.

















