ग्रामीण क्षेत्रों और डेयरी कारोबार में एक दुधारू गाय या भैंस किसी भी पशुपालक और किसान के परिवार की आजीविका की रीढ़ होती है। पशुपालक दिन-रात मेहनत करके अपने मवेशियों की देखरेख करते हैं ताकि बेहतर दूध उत्पादन से घर की आमदनी सुनिश्चित हो सके। हालांकि, जब कोई दुधारू मवेशी अचानक किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आता है, तो पशुपालक के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। दूध देने वाले पशुओं में होने वाला थनैला रोग ऐसा ही एक कष्टकारी विकार है, जिसका सीधा और घातक असर दूध की मात्रा तथा उसकी गुणवत्ता दोनों पर पड़ता है।
थनैला रोग की गंभीरता और स्थायी नुकसान का जोखिम
अगर समय रहते इस बीमारी की पहचान न की जाए और सही उपचार शुरू न हो, तो मवेशी की शारीरिक स्थिति काफी नाजुक हो सकती है। गंभीर मामलों में पशु के थन के आंतरिक ऊतकों को हमेशा के लिए नुकसान पहुंच जाता है, जिससे वह थन हमेशा के लिए बेकार हो सकता है। ऐसे गंभीर नुकसान से बचने के लिए आवश्यक है कि पशुपालक इसके शुरुआती संकेतों के प्रति पूरी तरह सतर्क रहें और किसी भी तरह की लापरवाही बरते बिना उचित कदम उठाएं।
बीमारी के मुख्य लक्षण और पहचान का तरीका
देवघर के पशु मित्र जयकांत राय का कहना है कि थनैला रोग दुधारू पशुओं के लिए बेहद गंभीर समस्या है। यह विकार मुख्य रूप से गाय और भैंस के अयन और थन में सूजन तथा जीवाणु संक्रमण की वजह से पैदा होता है। संक्रमण बढ़ने पर पशु की दूध देने की क्षमता पर सीधा असर पड़ता है, जिससे दूध का उत्पादन तेजी से घटने लगता है और पशुपालक को तगड़ा आर्थिक झटका लगता है।
दूध दुहते समय पशुपालकों को कुछ खास बदलावों पर लगातार नजर रखनी चाहिए। अगर मवेशी के थन में सूजन दिखे, छूने पर थन असामान्य रूप से गर्म लगे, दूध निकालते समय खून या असामान्य थक्के नजर आएं अथवा दूध के रंग और बनावट में खराबी दिखाई दे, तो इसे कतई नजरअंदाज न करें। इसके अतिरिक्त पशु को तेज बुखार होना, चारे-पानी से मुंह मोड़ लेना और शरीर में भारी सुस्ती रहना भी इस गंभीर संक्रमण के प्रमुख लक्षण हैं।
पशुशाला की स्वच्छता और बचाव के नियम
इस संक्रमण से मवेशियों को सुरक्षित रखने में बाड़े की स्वच्छता और दूध निकालने के सही तौर-तरीकों की अहम भूमिका होती है। दूध दुहने से पहले और बाद में हाथों तथा पशु के थनों की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए। इसके अलावा, मवेशी के बैठने का स्थान पूरी तरह सूखा और साफ-सुथरा होना चाहिए ताकि फर्श की गंदगी से संक्रमण थनों तक न पहुंचे। यदि किसी पशु के दूध में कोई भी असामान्य लक्षण दिख रहा हो, तो बिना उचित जांच के उस दूध का सेवन या बिक्री बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
राहत दिलाने वाले पारंपरिक घरेलू उपाय
जयकांत राय के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में पशुपालक कई असरदार देसी तरीकों से भी इसका उपचार करते हैं। गर्म पानी में फिटकरी मिलाकर थन की सिकाई करना बेहद लाभकारी माना जाता है। इसके उपरांत थन पर एलोवेरा और हल्दी का ताजा लेप लगाया जाता है। इसके साथ ही पशु को हर दो घंटे के अंतराल पर नींबू का रस, काली मिर्च का पाउडर और देसी घी का मिश्रण बनाकर खिलाना चाहिए। लगातार एक सप्ताह तक यह देसी नुस्खा अपनाने से पशु को संक्रमण से राहत मिलने की पूरी संभावना रहती है।



















