झारखंड के पलामू जिले में ग्रामीण स्तर पर रोजगार को विस्तार देने और किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने की दिशा में खाद्य प्रसंस्करण एक प्रभावी जरिया बन रहा है। केंद्र सरकार की ओर से संचालित प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना, जिसे संक्षेप में पीएमएफएमई कहा जाता है, किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से वित्तीय और तकनीकी मदद मुहैया करा रही है। परंपरागत तौर पर किसान अपनी सरसों की फसल कटाई के तुरंत बाद कच्चे रूप में बाजार में बेच देते हैं। इसके विपरीत, यदि गांव या कस्बे में ही तेल निष्कर्षण की आधुनिक इकाई लगा ली जाए, तो तैयार खाद्य तेल बेचकर मुनाफा काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है। योजना के प्रावधानों के अनुसार पात्र प्रसंस्करण इकाइयों को नियमों के तहत वित्तीय सहायता, बैंक ऋण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है।
पीएमएफएमई योजना के तहत वित्तीय मदद और सब्सिडी के नियम
पलामू जिले के प्रखंड उद्यमी समन्वयक अरविंद कुमार के अनुसार, केंद्र सरकार की यह पहल खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र से जुड़े सूक्ष्म उद्यमों को नई शुरुआत देने या पहले से चल रही इकाइयों को उन्नत बनाने के लिए तैयार की गई है। इस कार्यक्रम के दायरे में केवल तेल मिल ही नहीं, बल्कि आटा चक्की और अन्य खाद्य उत्पाद तैयार करने वाली इकाइयां भी आती हैं। योजना के नियमों के मुताबिक पात्र व्यक्तिगत सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को प्रोजेक्ट की पात्र लागत पर 35 प्रतिशत की दर से क्रेडिट-लिंक्ड पूंजी सब्सिडी प्रदान की जाती है। इस वित्तीय लाभ को पाने के लिए जरूरी है कि आवेदक निर्धारित दिशानिर्देशों के तहत आवेदन करे और संबंधित बैंक से परियोजना ऋण की औपचारिक स्वीकृति हासिल करे। बैंक की मंजूरी और कागजी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही सब्सिडी का लाभ अंतिम रूप से मिलता है।
कच्चे तिलहन की तुलना में प्रसंस्कृत तेल की बिक्री से बेहतर मुनाफा
अरविंद कुमार का कहना है कि फसल को सीधे आढ़तियों या व्यापारियों को सौंपने के बजाय प्रसंस्करण का मार्ग चुनना आर्थिक रूप से अधिक व्यावहारिक साबित हो सकता है। बाजार में सामान्य तौर पर कच्ची सरसों 60 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बिकती है। इसके मुकाबले, जब उसी सरसों की पेराई कर तेल निकाला जाता है, तो खुदरा बाजार में शुद्ध सरसों तेल की कीमत 200 से 250 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाती है। कच्चे माल को सीधे न बेचकर उसका अंतिम उत्पाद तैयार करने से किसानों को मिलने वाले मुनाफे का दायरा काफी बढ़ जाता है। इस तरह का मूल्य संवर्धन न केवल उत्पादक को बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा देता है, बल्कि गांव में ही अतिरिक्त आमदनी का स्थायी स्रोत भी खड़ा करता है।
आधुनिक पेराई तकनीक और गुणवत्ता बनाए रखने की प्रक्रिया
प्रसंस्करण के क्षेत्र में नई तकनीक के इस्तेमाल से काम की गति और तेल की शुद्धता दोनों में सुधार हुआ है। पलामू जिले में प्रिंसी शाह की तेल प्रोसेसिंग यूनिट इसका एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। इस इकाई में स्थापित मशीन की पेराई क्षमता लगभग 120 किलोग्राम सरसों प्रति घंटे दर्ज की गई है। इस यूनिट में नियमित रूप से प्रतिदिन करीब 3 से 4 क्विंटल सरसों की पेराई का काम संपन्न किया जाता है। तेल निष्कर्षण की प्रक्रिया सीधे शुरू नहीं की जाती, बल्कि उससे पहले दानों की समुचित सफाई की जाती है। सफाई के बाद सरसों को अच्छी तरह सुखाया जाता है और उसकी नमी की जांच की जाती है। नमी का स्तर मानक के अनुसार तय होने के बाद ही पेराई की जाती है, ताकि निकलने वाले तेल की गुणवत्ता और शुद्धता पूरी तरह बरकरार रहे।
इकाई लगाने से पहले व्यावहारिक पहलुओं का आकलन
अरविंद कुमार ने बताया कि पलामू के जो भी किसान या ग्रामीण युवा अपनी तेल मिल शुरू करने में रुचि रखते हैं, वे उद्योग विभाग के संबंधित कार्यालय अथवा अपने प्रखंड उद्यमी समन्वयक से सीधा संपर्क साध सकते हैं। वहां से योजना की पात्रता शर्तों, संभावित प्रोजेक्ट लागत, बैंक लोन की रूपरेखा और सब्सिडी हासिल करने के पूरे क्रम की विस्तृत जानकारी ली जा सकती है। हालांकि, मिल लगाने का निर्णय लेने से पूर्व स्थानीय बाजार में तेल की मांग, मशीन की कार्यक्षमता, बिजली पर होने वाले नियमित खर्च और कच्चे माल के तौर पर सरसों की निरंतर उपलब्धता का ठोस आकलन करना बेहद जरूरी है। सटीक व्यावसायिक योजना और बाजार की मजबूत समझ के साथ खेती को प्रसंस्करण से जोड़कर किसान अपनी नियमित आय को नई ऊंचाई दे सकते हैं।





















